
उरई। पूर्व सैनिकों के अस्पताल में सीमा जैसी ही स्थितियां हैं। इलाज के लिए यहां पूर्व सैनिक और उनका परिवार जान हथेली पर रखकर रहता है। 100 वर्ष से अधिक पुरानी इमारत में स्थित होने से इसकी हालत बेहद जर्जर है और कभी भी कोई अनहोनी हो सकती है। सेना के साथ लोगों की भावनायें जुड़ी रहती हैं। यह जानने के बावजूद पाॅलि-क्लीनिक के लिए नई इमारत के निर्माण में सहयोग की गुजारिश लेकर पहुंचे पूर्व सैनिकों के साथ जनप्रतिनिधियों ने लगभग दुत्कारने जैसा व्यवहार किया। जिसकी ठेस चर्चा में उनकी जुबान पर आये बिना नहीं रहती है।
बाल-बाल बचे इलाज कर रहे डाक्टर
सेना के प्रति लोगों की श्रद्धा को देखते हुए सरकार भी इनसे जुड़े मुद्दों को निपटाने के लिए पलक पावड़े बिछाकर तत्पर रहती है लेकिन लगता नहीं है कि जिले के जन प्रतिनिधियों को इससे कोई सरोकार हो। पूर्व सैनिकों के पाॅलि-क्लीनिक का संचालन यहां चुर्खी रोड स्थित सैनिक कल्याण के दफ्तर के पोर्सन में हो रहा है। यह भवन इतना जीर्ण-शीर्ण है कि एक बार इसकी सीलिंग से पपड़ी का बड़ा टुकड़ा मरीजों को देख रहे डाक्टर पर टूट कर गिर पड़ा जिससे उनकी हालत खराब हो गई। बरसात के मौसम में पूरी छत गिर जाने का अंदेशा मंडराने लगता है। प्रदेश की राजधानी में प्रतिवर्ष मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में सिविल मिलिट्री लाइजन कान्फ्रेस होती है। 2018 में 20 मार्च को हुए इस सम्मेलन में पाॅलि-क्लीनिक के मुद्दे पर चर्चा आने पर मुख्यमंत्री ने उरई सहित कई स्थानों पर इसके लिए निशुल्क भूमि उपलब्ध कराने के आदेश राज्य के अधिकारियों को जारी किये थे तो जिले के पूर्व सैनिकों को उम्मीद बंधी थी। लेकिन अगले वर्ष 2019 में 28 जून को जब यह सम्मेलन हुआ तो इसमें उरई का उल्लेख पता नहीं कैसे गायब हो गया।

पूर्व सैनिक भी न बच सके जनप्रतिनिधियों के गुरूर से
बेचैन पूर्व सैनिकों ने अध्यक्ष सीपी तिवारी और जगदीश गुप्ता के नेतृत्व में सांसद और विधायकों से सम्पर्क किया ताकि उनकी ओर से मुख्यमंत्री को इसके निदान के लिए चिट्ठी लिखवाई जा सके। पर जनप्रतिनिधियों द्वारा सहयोग करना तो दूर पूर्व सैनिकों के साथ बेहद रूखा व्यवहार किया गया जिससे वे अभी तक आहत हैं। भूतपूर्व सैनिक संगठन के जिलाध्यक्ष सीपी तिवारी ने बताया कि इस अस्पताल में पूर्व सैनिक और उनके परिवार के अलावा युद्ध में शहीद सैनिकों की विधवायें भी इलाज के लिए आती हैं जिससे इसका महत्व समझा जा सकता है। पर मदांध जनप्रतिनिधियों ने इस पर कोई गौर नहीं किया। नई इमारत बन जाने पर कैंटीन का संचालन भी उरई में शुरू हो जायेगा। अभी पूर्व सैनिकों को कैंटीन से सामान लेने के लिए बुढ़ापे में झांसी जाना पड़ता है जिसमें हजार डेढ़ हजार रूपये खर्च हो जाते हैं।
धरना देकर जनप्रतिनिधियों को बेनकाब करने का अल्टीमेटम
वयोवृद्ध पूर्व सैनिक जगदीश गुप्ता इस मुद्दे को रखते हुए जन प्रतिनिधियों के अशोभनीय व्यवहार पर गुस्से से फटने लगते हैं। उनका कहना है कि कोरोना की वजह से हम धैर्य धारण कर रहे हैं। स्थिति में सुधार होते ही पूर्व सैनिक और उनके परिवार कलेक्ट्रेट में धरने पर बैठकर जन प्रतिनिधियों को बेनकाब करेंगे।
रिटायर्ड मेजर जनरल ने सीएम को लिखा पत्र
उधर पूर्व सैनिकों के संयुक्त मोर्चे के सलाहकार और सेवानिवृत्त मेजर जनरल सतवीर सिंह ने प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर उरई में सैनिक अस्पताल ईसीएचएस के लिए जमीन आवंटित करने की मांग की है। उन्होंने मुख्यमंत्री को याद दिलाया कि आपने पूर्व सैनिकों के अस्पताल के लिए निशुल्क जमीन उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया था। इस संबंध में आवश्यक कागजात भी उन्होंने पत्र के साथ संलग्न किये और उनसे इस मामले में व्यक्तिगत रूचि लेने का आग्रह किया। देखना है कि सेना के बड़े अफसर के पत्र को मुख्यमंत्री सचिवालय में कितनी गंभीरता से लिया जाता है।







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