राम सदाचरण की प्रेरणा मूर्ति, भारतीय संस्कृति का आधार

जालौन-उरई । राम हमारी संस्कृति के प्रतीक हैं और सदाचरणों के लिए प्रेरणा मूर्ति भी। यह बात ज्वालागंज स्थित साप्ताहिक रामकथा के आयोजन में साध्वी समाहिता दीदी ने उपस्थित महिलाओं और पुरूषों को संबोधित करते हुए कही। 

नगर के ज्वालागंज स्थित श्रीलक्ष्मी नारायण मंदिर पर 7 दिवसीय संगीतमयी रामकथा महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। रामकथा वाचक साध्वी समाहिता दीदी ने रामकथा के तीसरे दिन उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि जिस प्रकार से एक मनुष्य जब रोगी होता है तो चिकित्सक की खोज करता है और जिस चिकित्सक से उसे लाभ होता है, वह उसी को मानने लगता है। ठीक इसी प्रकार ईश्वर को प्राप्त करने के लिए चार प्रकार हैं। ज्ञान, भक्ति, कर्म और शरणागति। भले ही चारों में भिन्नता हो लेकिन लक्ष्य एक ही है। वह है ईश्वर की प्राप्ति। उन्होंने बताया कि प्रभु श्रीराम ना किसी वंश के प्रतीक हैं और न किसी संप्रदाय के। अयोध्या के लोग राम के आचरण पर रीझे थे तो मिथिला व जनकपुर के लोग राम का चलना, बोलना और हंसना देखकर ही प्रसन्न हो गए थे। इसलिए कहा जा सकता है प्रभु श्रीराम पूरी भारतीय संस्कृति के ही प्रतीक हैं। उन्होंने अपने सदाचरणों से लोगों के हृइय में स्थान बनाया है। यही कारण है कि उन्हें मर्यादा पुरूषोत्तम का भी संबोधन दिया गया है। इस मौके पर अनुराग बहरे, गोपालजी, दशरथ, सुमित, नारायण, कैलाश, सियाराम, दीपिका, सरोज, कमला देवी, समुद्री देवी, जय देवी, विनीता, रश्मि, अनीता, उर्मिला, आदि ने कथा का श्रवण किया।

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