कोरोना आपदा या राजनैतिक अवसर ? – रविन्द्र पटेल

अचानक भारतीय मीडिया में कोरोना की आपदा को जिस तरह से दिखाया जा रहा है उससे यह सवाल जरूर उठता है कि यह आपदा जिसको पूरी दुनिया बीते 3 सालों से झेल रही है 5 दिनों से भारतीय मीडिया इतना अधिक महत्व क्यो देने लगी है।

 अगर यह आपदा इतनी बड़ी है तो क्या चीन जो कि सबसे अधिक प्रभावित है वहाँ से आने वाले हवाई जहाजों को रोका गया है जबाब है अभी तक नहीं आप कह सकते है आपदा का स्वरूप अभी इतना बड़ा नहीं है।

      इस वक़्त भारत जोड़ो यात्रा लेकर चल रहे राहुल गाँधी जिनको 24 दिसंबर को दिल्ली पहुँचना है क्या इससे कोई सम्बन्ध है?

         राहुल गांधी की जिस तरह से भारत जोड़ो आंदोलन को जनसमर्थन मिल रहा है राहुल गाँधी ने जो मुद्दे महंगाई, वेरोजगारी, किसानों के मुद्दे, देश के पूर्व रिजर्व बैंक गवर्नर रघुराम राजन के साथ आर्थिक मुद्दे उठाये उनपर अब लोगों का ध्यान जाने लगा है यह यात्रा दिल्ली देश की राजधानी पहुँचने पर मीडिया की कवरेज की मजबूरी के कारण और भी व्यापक रूप लेगी जो की मौजूदा सरकार के लिये परेशानी का कारण बन सकता है। 

               दूसरा कारण इस यात्रा को कश्मीर तक जाना है जिसके बारे में भारतीय मीडिया ने बात करना बंद कर दिया है जो कि अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षण करने का इस भारत जोड़ो यात्रा का बहुत बड़ा कारण बन सकता है जो कि वर्तमान सत्ता की सबसे बड़ी सफलता धारा 370 को खत्म करने के ऊपर सवाल उठा सकती है कि इससे कश्मीर के हालात में क्या अंतर आया उसकी जमीनी हकीकत देश के सामने रख सकती है।

        वर्तमान सत्ता की कोशिश कोरोना के लिये तब्लीगी जमात से लेकर एक वर्ग विशेष को जिम्मेदार बताने के बाद इस भारत जोड़ो यात्रा को और राहुल गाँधी को बनाने की कोशिश तो नही है?

          भारत में अभी तक लगभग 75% लोगो को वैक्सीन लग चुकी है कोरोना की तीसरी लहर का असर यूरोप और अमेरिका की तुलना में बहुत कम था जब वैक्सीन लगवाने वालों का प्रतिशत भी बहुत कम था। कोरोना एक खतरा है इस बात से इनकार नही किया जा सकता है पर यह आपदा राजनैतिक अवसर की तरह इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है ?

             बंगाल के चुनाव के वक़्त 2 लाख नए कोरोना के केस आ रहे थे पर राजनैतिक पार्टिया अपनी रैलियों में लाखों लोगों को संबोधित कर रहे थे। इस खतरे को देखते हुये भारत जोड़ो यात्रा में लाखों लोगों के शामिल होने से  कोरोना के खतरे के बढ़ने की आशंका से इनकार और इसकी इजाजत किसी को नही दी जा सकती पर व्यापक दृष्टिकोण से चीजो को समझने की अवश्यकता है।

               देश के वर्तमान आर्धिक कठिन हालात, चीन से सीमा विवाद, महँगाई, बेरोजगारी सहित लोगों के सामने खड़ी जीवन की सिरसा के मुँह की तरह चुनौतियों से राजनैतिक पार्टियों का कितना सरोकार है इस पर चिंतन बिना पूर्वाग्रह के करना हर भारतीय का फर्ज है नही तो आपके जीवन मे कुछ नही बदलेगा।

              क्यो कि सत्ताधारी पार्टी आपदा को राजनैतिक अवसरों में बदलने में माहिर है और राहुल गाँधी राजनैतिक अवसरों को आपदा में पर सवाल यह है देश और नागरिकों के सरोकारों का क्या 

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