चर्चित समाजवादी नेता शरद यादव का पिछले दिनों 75 वर्ष की उम्र में बीमारी के बाद देहावसान हो गया। इसके कारण समाजवादी राजनीति का भारत में इतिहास , सामाजिक न्याय की राजनीति, धर्मनिरपेक्षता के लिये प्रतिबद्धता आदि मुददे देश के प्रबुद्ध लोगों को फिर याद आ गये हैं। चर्चा इस बात की होनी चाहिये कि इन मुददों के प्रति कितने लोगों में केवल रूमानी खिचाव था और कितनों में इनको तार्किक अंजाम तक पहुंचाने की सचमुच तडप थी। समाजवादियों को सत्ता में आने का अवसर मिला तो वे अपने को इतना मजबूत क्यों न कर सके कि उनके एजेण्डे के अनुरूप भारत बनता जिस तरह आरएसएस ने अपने राजनीतिक उपकरणों का वर्चस्व दो कदम आगे एक कदम पीछे की नीति के जरिये बढाते हुये अपनी सत्ता का चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापित करके दिखाया और आज अपने एजेण्डे के अनुरूप भारत की तस्वीर को गढ देने में कोई कसर नहीं छोड रहा है।
देश में समाजवादी राजनीति परवर्तीकाल में लोहियावादी राजनीति के बतौर आगे बढी सत्ता में जिसके प्रतिनिधि मुलायम सिंह , लालू प्रसाद यादव , शरद यादव , रामविलास पासवान, जार्ज फर्नान्डीज आदि नेता माने जाते हैंै। मधु लिमये , चम्पा लिमये, मधु दण्डवते, प्रमिला दण्डवते, जनेश्वर मिश्र , मोहन सिंह इत्यादि पुरोधा भी लोहियावाद के वंश वृक्ष में शुमार रहे हैं। समाजवाद और लोहियावाद का मुख्य लक्ष्य आर्थिक और सामाजिक गैर बराबरी को खत्म करके मानवता की विचारधारा के अनुरूप प्रगतिशील और शुचितापूर्ण व्यवस्था का निर्माण करना था लेकिन अवसर मिलने पर उक्त नेताओं में से कितने नेता ऐसे थे जिन्होंने ईमानदारी से व्यवस्था का ऐसा नक्शा गढने की कोशिश दिखाई हो और अगर वे अपने समय पर इससे मुकरे तो इसकी वजह क्या रही यह सवाल पडताल मांगता है।
लोहियावादियों को पहला मौका मिला जब 1977 में कांग्रेस को केन्द्रीय सत्ता से बेदखल कर जनता पार्टी के रूप में उन्हें सत्ता में पहुंचने का अवसर मिला हालांकि जनता पार्टी में उस समय जनसंघ भी विलीन हुआ था इसलिये उसकी विचार धारा और वर्ग सत्ता का भी दखल था लेकिन समाजवादी सपनांे का भारत कैसा होता है इसकी झलक लोहियावादियों को दिखानी चाहिये थी। लोहिया कहते थे कि व्यवस्था बदलने के लिये जिनको समाज में सबसे पीछे रखा गया उनको नेतृत्व व पदों में सबसे आगे किया जाये यानी दलितों को सर्वप्रथम वरीयता दी जाये, इसके मध्य जातियों का ख्याल किया जाये और कुछ दशकों के लिये सवर्ण बिना पद के सेवा की भावना से काम करने की भावना बनायें । जनता पार्टी में प्रधानमंत्री चुनने की बारी आने पर समाजवादियों ने जो किया उसे लोहिया जी के इन सिद्धान्तों की कसौटी पर परखा जाये तो उन्हें फेल घोषित करना पडेगा। इस दौरान प्रधानमंत्री पद के लिये कुशल और अनुभवी प्रशासक के रूप में प्रमाणिक दलित नेता जगजीवनराम का नाम सबसे आगे था लेकिन एक दलित सर्वोच्च कार्यकारी पद को हासिल कैसे करे यह मानसिकता मुख्य रूप से लोहियावादियों में उभरी जिनकी अगुवाई उस समय तक चैधरी चरण सिंह कर रहे थे और उनकी दावेदारी खत्म करने के लिये मोरारजी देसाई जैसे जड नेता को गले लगा लिया गया। यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसा जनसंघ घटक के दुराग्रह के कारण करना पडा । अगर ऐसा होता तो जनता पार्टी के बिखरने के बाद जनसंघियों द्वारा बनायी गयी भारतीय जनता पार्टी ने पहला चुनाव प्रधानमंत्री पद के लिये जगजीवनराम को प्रोजेक्ट करके नहीं लडा होता । मधु लिमये जो जनता दल के कार्यकाल में बहुत क्रांतिकारिता दिखाते रहे थे उन्होंने भी अपने मन के चोर के कारण प्रभावी स्थिति में होते हुये भी उस समय जगजीवनराम के नाम के लिये कोई उत्साह दिखाने की जरूरत नहीं समझी थी ।
जनता दल तो मुख्य रूप से लोहियावादियों का ही अवतार था जिसने वीपी सिंह का चेहरा इस कारण उधार लिया था क्योंकि कांग्रेस की भूतो न भविष्यतो वाले बहुमत की सरकार के खिलाफ उनके अभियान के कारण ही प्रबल जनमत संगठित होने का अवसर आया था इसलिये उन्हें परे करके सरकार बदल नहीं सकती थी। उनके चेहरे पर जनता दल बनाना और चुनाव मैदान मंे उतरना सबकी मजबूरी थी इसलिये कोई उस समय चन्द्रशेखर की हठधर्मिता को भाव देने को भाव देने को तैयार नहीं हो सकता था। बहरहाल जनता दल केन्द्र के अलावा कई राज्यों में भी सत्ता के द्वार पर पहुंच गया तो सबसे पहले उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री तय हुआ जिसमें मुलायम सिंह बाजी मार ले गये। इसके बाद बिहार में मुख्यमंत्री का नाम निश्चित किया जाना चाहिये था जिसके लिये पर्यवेक्षक के रूप में मुलायम सिंह यादव और शरद यादव भेजे गये। उन्हें लोहिया का अनुयायी होने के चलते बिहार के दलित नेता रामसुन्दर दास का नाम ओके कर देना चाहिये था लेकिन दोनो अंधे जातिवाद के चलते लोहिया का सबक भुला बैठे और अपनी ही बिरादरी का मुख्यमंत्री यहां भी पदस्थ कराने के लिये उन्होने लालू प्रसाद यादव का समर्थन कर दिया। यह ध्यान रखा जाना चाहिये कि पहले से लोहियावादी न होने के बाबजूद सामाजिक न्याय के प्रति आग्रह का परिचय देते हुये उन्होने रामसुन्दरदास के नाम का ही संकेत दिया था पर उनकी नहीं चली यह बात इतिहास में सुरक्षित है।
लेकिन बाद में भी वीपी सिंह ने सामाजिक न्याय के लिये अपनी प्रतिबद्धता को जारी रखा। इसी कारण एक ओर मण्डल आयोग की रिपोर्ट लागू की गयी दूसरी ओर उन्होंने बाबा साहब अम्बेडकर को मरणोपरांत भारत रत्न भी घोषित किया। उनकी ही पे्ररणा से अनुसूचित जाति , जनजाति सासंदो का फोरम बना ताकि राजनीतिक प्लेटफार्म पर दलितों की स्थिति मजबूत हो सके । बाद में लालू प्रसाद यादव उनके सबसे बडे सिपहसलार बने लेकिन आखिरी समय में उन्हंे वीपी सिंह से इसलिये चिढ हो गयी थी क्योंकि वे दलित प्रधानमंत्री बनाने की वकालत करने लगे थे और रामविलास पासवान का चेहरा इसमें आगे रखने लगे थे जो लालू को बर्दास्त नहीं था। सामाजिक न्याय के नाम पर केवल अपनी जाति के वर्चस्व को कायम करने वाले भले ही वंचित वर्ग से हों उन्हें लोहियावादी नहीं कहा जा सकता और इसमंे लोहिया जी के तथाकथित अनुयायी बहुत कच्चे साबित हुये । मुलायम सिह ने तो बसपा से गठबंधन तोडने के बाद दलितों को अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोडी थी, यहां तक कि बाबा साहब अम्बेडकर को गद्दार तक कह दिया था । अखिलेश मुख्यमंत्री बनने पर मुलायम सिंह ने उनसे पहला काम प्रमोटेड दलित अधिकारियों को रिवर्ट कराने का किया था। जहां तक लालू की बात है उन्होने एक बार अपना प्रदेश अध्यक्ष दलित नेता को बनाया लेकिन सार्वजनिक तौर पर वे उसकी विदूषक छवि पेश करते रहे, उनका मजाक उडाते रहे । शरद यादव का भी दलितों के लिये संघर्ष करने का कोई रिकार्ड नहीं है।
जहां तक समाजवादी आर्थिक नीतियों की बात है तो जार्ज फर्नान्डीज को जनता पार्टी सरकार में उद्योग मंत्री बनाया गया था उस समय उन्होने मजदूरों की सेवा की थी या उद्योग पतियों की इसकी पडताल होनी चाहिये। ध्यान रखने वालो को याद होगा कि जार्ज पर उस समय केरल के रबड उद्योग पतियों को नाजायज लाभ देने के लिये उनसे करोडो रूपये वसूलने का आरोप लगा था । बाद में यह भी प्रमाणित हुआ कि उन्होने फ्रांस और अमेरिका से उपकृत होने में संकोच नहीं किया । चंद्रशेखर जिनकी मजबूती समाजवादी विचार धारा के लिये प्रतिबद्धता के बजाय ठाकुरवाद के नाते थी प्रधानमंत्री बनने की हविश पूरी करने के लिये अम्बानी की शरण में चले गये थे जिन्होने खरीदकर उनको समर्थन के लिये सांसद दिये थे। अपनी पार्टी के कोषाध्यक्ष बनाने के लिये उन्हें विचार धारा की बजाय उद्योगपति कमल मोरारका का नाम सूझा । अपना वित्तमंत्री उन्होने समाजवादी नेता की बजाय दक्षिणपंथी आइडियोलाॅग डा0 सुब्रमण्यम दिखायी दिये। मुलायम सिह ने डाला सीमेंट फैक्ट्री को डालमिया को बेचकर इसका विरोध कर रहे मजदूरों पर गोलिया चलवा दी थी लेकिन समाजवाद की इस दुर्दशा के विरोध में मधु लिमये का स्वर कभी नहीं फूटा। कुछ लोगो के लिये समाजवाद का मतलब गिरोह था जो उस गिरोह में रहे वे स्याह सफेद कुछ भी करें उन्हें समाजवादी का प्रमाणपत्र देते रहे जबकि समाजवाद केे उसूलों पर काफी हद तक चलने वाले उन्हंे इसलिये स्वीकार नहीं थे क्यांेकि उनकी पृष्ठ भूमि समाजवादी पार्टियों की नहीं थी। विश्वनाथ प्रताप सिंह इसी मानसिकता के शिकार हुये और चन्द्रशेखर और मुलायम सिंह इत्यादि को गिरोहबंदी की मानसिकता के चलते उनका समर्थन मिलता रहा जिनमें मधु लिमये का नाम सबसे ऊपर है। छोटे लोहिया कहे जाने वाले जनेश्वर मिश्र भी इनमें थे जिन्होने लोहिया के वंशवाद विरोध को लजाते हुये अखिलेश की राजनीति में लांचिंग के समय उन्हें हरी झण्डी दिखाने का काम किया था। सही बात यह है कि यह देश का सौभाग्य होता अगर समाजवादी माॅडल के अनुरूप देश की व्यवस्था का नक्शा गढा गया होता पर इसके नेताओं की कथनी और करनी में अन्तर था । आरएसएस में अपने वैचारिक लक्ष्य को लेकर कभी कोई बेईमानी नहीं रही इसलिये उसे आखिर में अपने अनुरूप भारत तैयार करने का अवसर मिल गया । अब लोग देखे, परखें कि ऐसा भारत उनके कितने हित में है।







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