क्या बाबा साहब अम्बेडकर को संविधान रचना का श्रेय देना सचमुच है तुष्टिकरण की कवायद



सत्तारूढ पार्टी की निगाह भटकाव के शिकार नजर आ रहे दलित वोटरों पर है जिनके लिए बाबा साहब अम्बेडकर की अभ्यर्थना में कोई कसर नहीं छोडी जा रही है। दूसरी ओर उसके सरकार में आ जाने से जिस वर्ग सत्ता को देश भर में हावी हो जाने के का मौका मिल गया है उसे महात्मा गांधी की तरह ही बाबा साहब अम्बेडकर भी कदापि मन्जूर नहीं है। उन्हें लेकर इस वर्ग सत्ता की दुर्भावनायें फुफकार मार रही है जिनका शमन करना सत्तारूढ पार्टी के नेतृत्व के लिए बहुत बडी समस्या है।
इस मामले में यह वर्ग सत्ता संघ प्रमुख मोहन भागवत के अर्दब में भी नहीं आ रही है। वह भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के दलितों पर मोहपाश फेकने की सारी मेहनत पर पानी फेरने को उतारू है। अम्बेडकर के प्रति उसकी घृणा का यह आलम है कि उन्हें संविधान निर्माता कहे जाने को लेकर उसके मुंह से लगभग गालियां निकलती है जिनका इजहार फेसबुक आदि सोशल मीडिया के प्लेटफार्मों पर नजर आता है।
क्या बाबा साहब अम्बेडकर का वास्तव में संविधान की रचना में कोई बहुत बडा योगदान नहीं है। जब यह कहा जाता है कि वे संविधान तैयार करने के मामले में मसौदा समिति के अध्यक्ष होने के अलावा कुछ नहीं थे तो ऐसा लगता है कि वे समझ नहीं पा रहे है कि मसौदे का अर्थ क्या है। क्या वे संक्षिप्त प्रस्तावना को मसौदा समझने की गलतफहमी पाले हुए है।
उन्हें संविधान के निर्माण की प्रक्रिया समझनी चाहिए। संविधान सभा में व्यापक चर्चा के बाद जिन प्रस्तावों पर आमराय बनी उन्हें संविधान में शामिल करने के लिए व्यवस्थित मसौदा तैयार करने का काम अत्यन्त श्रम साध्य था। मसौदा समिति में बाबा साहब अम्बेडकर को मिलाकर 08 सदस्य थे। लेकिन उनके अलावा सारे सदस्य किसी न किसी वजह से मसौदा तैयार करने में उनके साथ कोई योगदान कर पाने में विफल रहे। इस तरह भारतीय संविधान जो दुनिया का सबसे वृहद संविधान है उसका मसौदा तैयार करने का सारा बोझा बाबा साहब को उठाना पडा। इसमें 22 भागों में 08 अनुसूचियों के तहत 395 अनुच्छेद लिखे हुए है। हालाकि अब बढ़कर इसमें 25 भाग और 12 अनुसूचिया व 470 अनुच्छेेद हो चुके है।
मसौदा तैयार करने से मतलब स्टेनोगीरी नहीं थी। बाबा साहब ने प्रत्येक प्रस्ताव पर प्रभावी हस्तक्षेप किया। उदाहरण के तौर पर जब यह बात सामने आयी कि अगर नागरिक के मौलिक अधिकार का हनन किया जा रहा हो तो वह कहा गुहार लगाने जाये। संविधान सभा के अन्य सदस्य इस विचार में थे कि सरकारी एजेन्सिया इसके उपचार के लिए कार्यवाही करेंगी। डा0 अम्बेडकर ने कहा कि यह काम सरकार के भरोसे नहीं छोडा जा सकता। इसके लिए नागरिक को सीधे उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का अधिकार दिया जाना चाहिए। अन्त में संविधान सभा की इसी पर रजामंदी हुयी। इस तरह संविधान के लगभग प्रत्येक अनुच्छेद के अस्तित्व के पीछे बाबा साहब की सुस्पष्ट और निरपेक्ष अवधारणा को देखा जा सकता है।
हालांकि कई जगह बाबा साहब को संविधान सभा के हठधर्मी सदस्यों के रवैये के चलते अपने कदम वापिस खीचने पडे। उदाहरण के तौर पर वे चाहते थे कि अगर हिन्दी को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिया जा रहा है तो उसे व्यवहारिक रूप से इसे सम्भव बनाने के लिए तत्काल फैसला लिया जाये न कि अभी 15 वर्ष तक अंगे्रजी को ही बनाये रखने की मोहलत देने का कोई औचित्य है। लेकिन उनकी नहीं चल सकी और देखा जा रहा है कि इस कारण अग्रंेजी का देश के सरकारी कामकाज में वर्चस्व अनन्त कालीन साबित हो रहा है।
यह भी कहा जा रहा है कि उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लडाई लडने में कोई भूमिका नहीं निभाई। दूसरे शब्दों में यह साबित किया जा रहा है कि वे अंग्रेजों के पिटठू थे और राष्ट्रवादी भावनाओं से उनकी दूरी रही। इस मामले को अपनी जगह अम्बेडकर को रखकर सोचा जाये तो स्थिति स्पष्ट हो जायेगी। उन्हें बडा सरकारी ओहदा मिल जाने के बावजूद अछूत होने के कारण रहने के लिए कहीं घर नहीं मिल पाया था। अगर जैसे तैसे घर की जुगाड हुयी भी तो यह पता चलते ही कि वे अछूत है लोग उन्हें मारने के लिए तैयार हो गये। इसलिए वे चाहते थे कि जब देश आजाद हो तो यह आजादी दलितों  के हिस्से में भी आनी चाहिए जो दूषित सामाजिक व्यवस्था जारी रहने पर देश की तथाकथित आजादी के बाद भी गुलामों से ज्यादा बदतर जिन्दगी जीने को मजबूर रहेगे। लेकिन जब भगत सिंह को फांसी हुयी तो एक अखबार में उनके द्वारा लिखा जो सम्पादकीय प्रकाशित हुआ था उसमें उन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी को बलिदान निरूपित किया था। लिखा था कि यह फांसी किसी अपराध के कारण नहीं अपितु ब्रिटिश सरकार ने अपने देश के कटर वर्ग के तुष्टीकरण के लिए दी है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश भक्तों को लेकर उनकी भावनायें कितनी प्रखर रही। अगर वे देश भक्त नहीं होते तो धर्म परिवर्तन के समय उनके सामने कई ऐसे प्रलोभन आये जिनके लिए लालच दिखाकर वे ऐसा कोई फैसला ले सकते थे जिससे देश की एकता और अखण्डता को प्रभावित करने वाली स्थितियां उत्पन्न हो जाती। पर उन्होने ऐसा नहीं किया। देश को निरापद रखने के लिए ही उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार किया।
सबसे बडी बात यह है कि आयातित षडयन्त्रकारी विचारों के झासे में शोषित, वंचित वर्ग का बुद्धिजीवी समाज यह कह रहा था कि जाति समस्या बाहर से आये आर्यो द्वारा यहां के मूल लोगों के गमन के लिए अस्तित्व में लायी गयी है डा0 अम्बेडकर ने इसके विपरीत कहा कि जाति व्यवस्था तब बनी जब आर्य, द्रविण, सीपीयन्स, मंगौल आदि में रोटी-बेटी के सम्बन्ध हो चुके थे और समाज में नस्ल का कोई अन्तर नहीं रह गया था। साथ ही अम्बेडकर ने कहा कि जाति व्यवस्था के निष्ठुर प्रावधान किसी एक मनु द्वारा एक ही बार में नहीं बनाये गये। क्रूर व्यवस्थायें हजारों वर्ष में तमाम कारणों से एक के बाद एक तैयार हुयी। इस तरह नस्ल के आधार पर क्षति ग्रस्त की जा रही देश की सामाजिक एकता को पुष्ट करने के लिए उन्होंने अपने विचारों से बडा योगदान किया।
लेखन में उनकी अकादमिक ईमानदारी की बेमिसाल झलक देखने को मिलती है। जो भारतीय विद्वानों में दुर्लभ है। वे महान और मौलिक चिन्तक थे जिनके साहित्य का धैर्य पूर्वक अध्ययन किया जाना चाहिए। उनके बारे में उन्हें बिना पढे और अच्छी तरह जाने बगैर इकतरफा राय बनाना अपराध है। 

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