क्या गुजरात प्रतिबद्ध न्यायपालिका की दिशा में अग्रसर है? प्रतिबद्ध न्यायपालिका का मुहावरा इन्द्रागांधी के युग में देश में तेजी से गूंजा था। यह उस दौर की बात है जब वर्ग शत्रुओं के सफाये मंे जुटी सोवियत संघ, चीन और वारसा ब्लाॅक के देशों की सर्वहारा सरकारों के संदर्भ में प्रतिबद्ध सेना, प्रतिबद्ध नौकरशाही और प्रतिबद्ध न्याय पालिका की मांग बहुत प्रासंगिक हो गयी थी। ये सरकारे शोषण की परम्परागत व्यवस्थाओं और समाज में नीचे से ऊपर तक के सत्ता केन्द्रों को बदलनें में जुटी थी। परिवर्तन की इस लहर में सारी दुनिया की सरकारें आप्लावित हो रही थी। भारत में इन्दिरा सरकार भी अपने दायरें में उक्त सरकारों की अनुकृति बनने के लिए बेताब थी। उसके लिए रूढिवादी रूख वाली परम्परागत न्याय पालिका को दुरूस्त करना लाजिमी था ताकि परिवर्तन की राह में न्याय पालिका रोडा अटकाने से विरत हो सके। खास तौर से सम्पत्ति के अधिकार और भूमि सुधारों को लेकर तब सरकार व न्याय पालिका के बीच टकराव की स्थिति बनी। अन्ततोगत्वा न्याय पालिका समर्पण के लिए मजबूर हुयी। उसने संसद की सर्वोच्चता को मानकर अपनी दोयम स्थिति कबूल कर ली।
आज कौन सी ऐसी स्थितियां है जिनके कारण प्रतिबद्ध न्याय पालिका की मांग की जाये। हो सकता है कि मोदी सरनेम मानहानि मामले में विपक्ष के बडे नेता राहुल गांधी के साथ गुजरात की अदालतों द्वारा असाधारण कठोरता दिखाने, इसके पहले बिलकीस बानों सामूहिक रेप मामले के आभयुक्तों की समय से पहले रिहाई में गुजरात के न्यायिक तंत्र का सहयोग और अब नरोदाग्राम मामले के पूर्व मंत्री माया कोडरानी व बाबू बजरंगी जैसे अभियुक्तों को जो वीभत्स नरौदा पाटिया दंगा मामले में दोषी करार दिये जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट की दया से बाहर निकले है, अहमदाबाद की सेशन कोर्ट से दोष मुक्ति जैसे इस दौर में आये फैसलों का टेंड सिर्फ एक संयोग हो। इसी तरह शीर्ष अदालत के सवर्ण गरीबों को नौकरियों में आरक्षण दिये जाने, राफेल विमान के संदिग्ध सौदे और पैगासिस स्पाई वेयर से सम्बन्धित याचिकाओं में रहम के रूख का आभास सिर्फ भ्रम हो। पर इन्दिरा गांधी अपने फैसलों में न्याय पालिका का अनुकूल रूख हासिल करने में उतनी सफल नहीं हो पायी थी जितनी वर्तमान सरकार है यह एक सच्चाई है।
2002 में गोधरा काण्ड और उसके बाद हुए दंगे भारतीय राजनीति का टर्निंग प्वाइन्ट है। गोधरा काण्ड को लेकर तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव द्वारा गठित यूसी बनर्जी आयोग की रिपोर्ट जिसे बाद में नानावती आयोग ने खारिज कर दिया था एक अलग विषय है लेकिन न गोधरा काण्ड होता न इसके बाद गुजरात में दंगे होते तो बाद में नरेन्द्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति के केन्द्र में स्थापित होने की स्थिति भी नहीं बन पाती। नरेन्द्र मोदी के साथ दुर्घटना में अवसर के अजब संयोग जुडे है। फिर चाहे वह पहले के गोधरा काण्ड का हवाला लिया जाये चाहे 2019 के लोक सभा चुनाव के समय नरेन्द्र मोदी की सरकार के खिलाफ बने माहौल का पुलवामा काण्ड और उसके जबाव में की गयी बालाकोट एयर स्ट्राइक के चलते बाजी पलट जाना हो। ऐसे अबूझ सवाल इतिहास में समय समय पर उभरे है जिनका जबाव कई बार कभी नहीं मिल पाता।







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