उत्तर प्रदेश में अपराध नियन्त्रण के लिए वर्तमान सरकार द्वारा अपनाई जा रही एनकाउन्टर नीति प्रमुख मुद्दा बनी हुयी है। विद्वान विधिवेत्ता, मानवाधिकार समर्थक और विपक्ष के नेता इस पर चाहे जितनी नाक भौ सिकोडे लेकिन जनता कुल मिलाकर इसे पसंद कर रही है और इसके लिए फिलहाल तो योगी सरकार के पराक्रम को महिमा मंडित किया जा रहा है लेकिन इस दुधारी नीति का अल्टीमेट नतीजा क्या होगा इस पर विचार करना होगा।
कानून के शासन में न्यायिक तन्त्र जब कारगर तरीके से काम करने में विफल हो जाता है तो एनकाउन्टर नीति जैसी विसंगति को जन समर्थन मिलने लगता है। बिहार में भी जब माफिया और दुर्दान्त अपराधी न्यायिक तन्त्र से दण्डित न हो पाने के कारण समाज में स्वीकृति पा रहे थे, जाति धर्म के नायक के रूप में प्रतिष्ठित हो रहे थे और विधान मण्डलों में सुशोभित होकर कानून निर्माता बनकर कानून के राज का मखौल बना रहे थे तब वहां भी बडे संक्रमण काल की स्थिति थी। लोकतन्त्र का डरावना फलित देखकर लोग इस सिस्टम के गाये जाने वाले गीतों से वितृष्णा करने लगे थे। ऐसे में वहां कानून के शासन की वास्तविक तौर पर स्थापना के नाम पर सत्ता परिवर्तन हुआ। लालू सरकार को प्रतिस्थापित कर नीतिश कुमार सत्ता में आये तो उनके सामने भी कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने का एजेन्डा सर्वाेपरि था जिसके लिए विकल्प खुले थे कि वे अदालतों से न्याय कराने की अनुकूल स्थितियां बनाये या ठोको नीति का एलान कर दे। यह भी सही है कि नीतिश के लिए ठोको नीति का रास्ता सुगम नहीं था। तो उन्होंने न्यायिक तन्त्र के कारगर इस्तेमाल के रास्ते का अनुसरण किया जिसमें एनकाउन्टर नीति जैसी धमाकेदार नाटकीयता भले ही न रही हो लेकिन उनकी नीति भी सटीक साबित हुयी। बिहार में बिना मारधाड के मााफियाओं को पस्त कर दिया गया था क्योंकि नीतिश बाबू की सरकार के अदालतों से दुर्दान्तो को सजा दिलाने की नेकनीयती कामयाब रही थी।
इस लिहाज से देखे तो उत्तर प्रदेश में धार्मिक दृष्टि वाले मुख्यमंत्री पाक साफ तरीकों से अपराधियों की नाक में नकेल डालने के रास्ते की ओर प्रवृत्त नहीं हो पाये तो क्या इसे उनकी विफलता के रूप में देखा जाना चाहिए। इस यक्ष प्रश्न का उत्तर काल पुरूष से प्राप्त करने के लिए भविष्य का इंतजार करना होगा। पर ठोको नीति का यहां का मामला पहली बार नहीं है। उत्तर प्रदेश में जब वीपी सिंह मुख्यमंत्री बने तो डकैतों द्वारा सामूहिक हत्याओं के युग का सूत्रपात करके उनके सामने ऐसी चुनौती पेश कर दी गयी कि उस समय हडबडाहट में उन्होंने भी डकैतों के खिलाफ मुठभेड का विशेष अभियान चलाने की छूट अपनी पुलिस को दे डाली। इसके नतीजे गोर करने लायक है। इस नीति से डकैतों के आतंक का तो अंत हुआ नहीं पुलिस को अंधा धुंध खून बहाने का चस्का लग गया जिसे लेकर मुलायम सिंह जैसे नेताओं ने कोमल कवि हृदय और बेदाग मुख्यमंत्री की छवि को क्रूर और राक्षसी चेहरे में बदलने में कसर नहीं छोडी थी। जालौन जिले के आटा थाने में हुआ एक काण्ड नजीर है कि उस समय पुलिस ने किस तरह लालच के लिए सरकार की एनकाउन्टर नीति को खूनी तांडव का खेल बना दिया था। आटा में जिन चार लोगों को पुलिस ने डकैत बनाकर ढेर किया था वे सीधे साधे किसान थे जिनसे जायदाद का झगडा करने वाले उनके रिस्तेदारों ने ही पुलिस को रूपये चढाकर मुठभेड की पटकथा लिखवायी थी। वे टैªक्टर खरीदने के लिए निकले थे जिसका रूपया पुलिस ने छीन लिया और उन्हें मौत के घाट उतार दिया। बात खुलने पर पुलिस के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ। लेकिन जांच हुयी तो पुलिस वाले बरी हो गये और जिस नरभक्षी एसओ ने यह काण्ड किया था वह तरक्की पाता हुआ सीओ पद से रिटायर हुआ। हालांकि योगी सरकार फिलहाल ठोको नीति में लोक के बीच बदनामी से बची हुयी है। मामला चाहे विकास दुबे के एनकाउन्टर का हो या अतीक के लडके असद के एनकाउन्टर का । लोग कह रहे है कि ऐसे दुष्टो का यह अंत धर्म के तकाजे के अनुरूप है फिर भले ही कैसे भी किया गया हो। लेकिन अगर पुलिस की निगहबानी न की गयी और उसे एनकाउन्टर उन्माद के रास्ते पर बढने दिया गया तो अर्थ का अनर्थ हो जायेगा। इसीलिए हमने एनकाउन्टर नीति को दुधारी कहा है। कई जिलों में इस मामले में ककडी चोर को फांसी की सजा देने की नीति पर पुलिस के चलने की झलक दिखायी देने लगी है। साधारण अपराध में भी पुलिस शासन में अपने नम्बर बढाने के लिए एनकाउन्टर के नुस्खे को अपना रही है जो गौरतलब है। अगर इस ओर आंखे मंूद कर रहा गया तो ठोको नीति का विरोध करने वालों की दलीलों से लोगों के सहमत होने लगने के बीज न पडने लगे। क्या योगी सरकार के पास निष्कपट के साथ-साथ निर्भीक सलाहकार है और नहीं है तो उसे इनका बन्दोबस्त करना चाहिए।







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