कर्नाटक में नई विधानसभा के चुनाव के लिए 10मई को होने वाले मतदान में अब सप्ताह या दिन नहीं घण्टे मात्र बचे हैं। चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आतिशी डायलाॅगबाजी और 26 कि0मी0 लम्बे रोड शो से जाहिर है कि कर्नाटक में राजनीतिक हवा का रूख पलटने के लिए उन्होंने किस कदर अपनी  पूरी ताकत झोंकी। नरेन्द्र मोदी की छवि अभी तक ब्रहा्रास्त्र की रही है जिसका इस्तेमाल करके कितने भी प्रतिकूल चुनाव के नतीजे को आखिर में अपने पक्ष में करने में भाजपा को प्रायः कामयाबी मिलती रही है। इसलिए वे भाजपा के आत्म विश्वास के प्रतीक के रूप मंे स्थापित हो चुके है। लेकिन उनके ताबडतोड अभियान के बाद सी-वोटर का जो कर्नाटक विधान सभा चुनाव के सम्बन्ध में आखिरी सर्वे आया है वह बताता है कि भाजपा का यह अमोघ अस्त्र अब भोथरा हो गया लगता है। नरेन्द्र मोदी का जादू अब चुकता सा जान पड रहा है।


कर्नाटक के चुनाव की हवा शुरू से ही भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर भाजपा के खिलाफ बनी हुयी थी लेकिन कांग्रेस ने कई ऐसी गम्भीर चूके कर डाली जिससे लगा कि अन्त-अन्त तक जीती बाजी उसके हाथ से फिसल जाने वाली है। कांग्रेस के नेताओं की जुबान पहले भी जरा सी फिसली कि प्रधानमंत्री ने उनकी बात पकड कर ऐसा मारक वाक् कौशल रचा जिससे वह धराशायी हो गयी। फिर चाहे मणिशंकर अय्यर के अंग्रेजी में कहे गये शब्दों की नीच के रूप में व्याख्या कर उस पर प्रधानमंत्री का खेलना रहा हो या फिर राहुल गांधी के चैकीदार चोर के नारे को उनके द्वारा लपक कर अपने हर कार्यकर्ता और वोटर में चैकीदार अस्मिता को जगाते हुए उसका दोहन कर लेना हो। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के जहरीले सांप के मुहावरे के इस्तेमाल को भी उन्होंने इसी तरह ट्रविस्ट करना चाहा जबकि खरगे सफाई दे चुके थे कि उन्होंने इसका इस्तेमाल व्यक्तिगत रूप से प्रधानमंत्री पर नहीं उनकी पार्टी की विभाजनकारी नीतियों के लिए किया था फिर भी प्रधानमंत्री इसे मुद्दा बनाकर सहानुभूति कार्ड खेलने का प्रयास करते रहे। लोगोें ने भी माना कि खरगे का यह जुमला शोभनीय नहीं था लेकिन अब जाहिर हो चुका है कि इसके कारण वे असल बात से भटके नहीं। इसके बाद कांग्रेस ने उन्हें एक बडा हथियार बजरंग दल पर सरकार में आने के बाद प्रतिबन्ध लगाने का वायदा अपने चुनावी घोषणा पत्र में करके दे दिया। इसे लेकर तो प्रधानमंत्री ने इन्तहा ही कर दी। उन्होंने इसे इस तरह प्रचारित किया जैसे कांगे्रस ने किसी संगठन पर प्रतिबन्ध की बात नहीं, भगवान बजरंगवली को नकारने की हिमाकत कर डाली हो। बुद्धिजीवियों ने दुहाई दी कि इस तरह के कुतर्क का मतलब है कि अगर बजरंगी नाम का कोई आदमी चोरी करते हुए पकडा जाये तो उसे छोडना पडेगा क्योंकि अन्यथा यह भगवान बजरंगवली के निरादर के पाप का भागी बना देगा।


पर धरातल पर यह मुद्दा असर तो दिखा ही रहा था। लोग बजरंग दल पर प्रतिबन्ध लगाने के कांग्रेस द्वारा जाहिर किये गये इरादे पर नाखुशी जाहिर कर रहे थे। कांग्रेस के शुभ चिंतक भी कह रहे थे कि उसने इसमें सूक्षबूक्ष नहीं दिखायी। जब हिन्दू भावनाएं देशभर में इतना जोर मार रही है तो कांग्रेस को वक्त की नजाकत का ध्यान रखना चाहिए था और बजरंग दल पर प्रतिबन्ध लगाने न लगाने की चर्चा ही नहीं करनी चाहिए थी। भले ही यह होता कि इससे पीपुल्स फ्रंट आॅफ इंडिया पर प्रतिबन्ध के वायदे को भी उसे गोल करना पडता। प्रधानमंत्री ने तिल का ताड बनाते हुए नारा दिया कि भाजपा के प्रत्याशी जय बजरंगवली का घोष करते हुए नामंाकन करने जाये। चुनाव आयोग से इसकी शिकायत की गयी। कहा गया कि धर्म के नाम पर वोट मांगने के कारण बाला साहब देवरस का मताधिकार रद्द किये जाने की नजीर को ध्यान में लाते हुए चुनाव आयोग को इसे लेकर मौजूदा प्रधानमंत्री के खिलाफ भी ऐसी ही कार्यवाही करनी चाहिए पर सब जानते है कि चुनाव आयोग की दशा इस समय क्या है। प्रधानमंत्री पर बडी कार्यवाही तो दूर सांकेतिक कार्यवाही करने तक का बूता अब उसमें नहीं रह गया हैं।


लब्बोलुआब यह कि बीच में यह जान पड गया था कि कांग्रेस की किस्मत खुद उसके कारनामों की वजह से फूट गयी है। सी-वोटर का अन्तिम सर्वे के पहले का सर्वे कुछ इस तरह का इशारा भी दे रहा था। कांग्रेस खेमे में इसके चलते घबराहट भी पैदा हो गयी थी। पर ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री कविता के क्षेत्र में चलने वाली समस्या पूर्ति की तरह की अदाएं अपनाते है बजाय मौलिक चर्चा करने के। उनकी पार्टी और सरकार को लेकर जो गम्भीर संदेह उपजाये जाते है उन पर उनका कोई जबाव न देना अब लोगों में उबाल लाने लगा है। राजा के दैवीय अधिकार के सिद्धान्त को लोगों के मन में बैठाने की उनकी चेष्टाएंे निष्फल होने लगी है। लोग उनके द्वारा अपने को हर जबावदेही से परे मानने की धारणा अब पचा नहीं पा रहे हैं। इसलिए कर्नाटक में भाजपा की सरकार मंे व्याप्त भ्रष्टाचार पर उनके द्वारा अंकुश न लगाने का कोई प्रयास न किये जाने को लेकर उन्हें सबक सिखाने के लिए इस कदर उद्यत हो गये है कि कांग्रेस की नासमझी को उन्होंने नजर अंदाज करने का फैसला कर लिया है। सी-वोटर के सर्वे अधिकांशतया सत्यता के निकट साबित हुए है। इसलिए सी-वोटर के सर्वे को लोगों द्वारा चुनाव नतीजों के पूर्वाभास के रूप में लिया जाना स्वाभाविक ही है।


भाजपा और प्रधानमंत्री को अगर सी-वोटर का सर्वे सही साबित होता है तो आगे के लिए गम्भीरता से लेना होगा। उनके पास कई सकारात्मक उपलब्धियां है जिनकी दम पर वे प्रतिद्वन्दियों पर भारी पडते है। फिर उन्हें निकृष्ट हथकंडे अपनाने की क्या जरूरत है। उन्हें इस बात की भी क्या जरूरत है कि चुनाव जीतने के तकाजे की खातिर उनसे सार्वजनिक जीवन में शुचिता को पुर्नस्थापित करने की जो अपेक्षा की जाती है उससे वे मुकर जायें। सरसरी तौर पर बृजभूषण सिंह पर महिला पहलवानों के यौन शोषण के आरोप विश्वसनीय प्र्रतीत हो रहे हो तो वे 2-3 सीटों के लिए उनके बचाव का अधम कृत्य क्यों करें। चुनाव को अपनी साख की दम पर जीतने का आत्म विश्वास वे क्यों पैदा नहीं कर पा रहे। उन्हें क्यों लगता है कि चुनाव प्रचार में अन्धाधुन्ध पैसा बहाये बिना कार्य सिद्धि नहीं हो सकती। इसलिए अदानी का दामन पकडे रहना उन्हें जरूरी है भले ही इसे लेकर उनसे कितने भी सवाल क्यों न किये जाये। लोग उम्मीद करते है कि मोदी जी जिस तरह की दिलेरी विश्व नेताओं के सामने भारत की धाक ऊंची करने के लिए दिखाते है वैसी ही दिलेरी वे सार्वजनिक जीवन में हावी न्यस्त स्वार्थों से लोहा लेेने में भी दिखाये। 

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