पंचनद: चंबल विद्यापीठ परिवार द्वारा हिम्मतपुर ग्राउंड पर कराए जा रहे ‘पंचनद क्रिकेट चैंपियनशिप’ के चौथे दिन कर्तलापुर और गुढ़ा की टीमों के बीच अबतक का सबसे रोमांचक मुकाबला हुआ। कर्तलापुर टीम ने टॉस जीतकर बल्लेबाजी करते हुए 12 ओवर में 9 विकेट के नुकसान से 75 रन बनाए। कर्तलापुर टीम के प्रियांशु ने सर्वाधिक 21 रन बनाये और 2 विकेट भी लिए।
जवाब में उतरी गुढ़ा टीम ने सधी शुरुआत की। कड़ी टक्कर के बीच मुकाबला आखिरी ओवर तक खिंचा और दर्शक आखिरी तक सांस रोके बैठे रहे। आखिरकार 11.4 ओवर में 9 विकेट के नुकसान गुढ़ा की टीम 70 रन पर सिमट गयी। गुढ़ा टीम के प्रशांत ने 12 रन बनाने के साथ 3 विकेट झटके। कर्तलापुर टीम के प्रियांशु मैन आफ द मैच रहे। एम्पायर की भूमिका सुरजीत और आशीष ने और स्कोर बोर्ड लिखने की भूमिका अवनीश निषाद ने निभाई। इस अवसर पर कृष्ण नारायण शुक्ला, विनोद सिंह, सतेंद्र सिंह राठौर, कमल प्रताप सिंह सेंगर आदि मौजूद रहे।
यह चैंपियनशिप 1857 के क्रांतिवीरों की स्मृति में हो रही है। हर दिन की तरह मैच की शुरुआत से पहले क्रांतिकारियों को नमन किया गया। इस दौरान लेखक डॉ. शाह आलम राना ने क्रांतिवीर रामरतन को याद करते हुए बताया कि 1857 की जनक्रान्ति का बिगुल बजने के समय दलेलनगर इटावा जिले का एक परगना था। उसी परगने के ग्राम भटपुरा के निवासी थे क्रांतिवीर रामरतन जिन्होंने पंचनद क्षेत्र के रणबांकुरों का मजबूत संगठन बनाकर क्षेत्र से ब्रिटिश शासन का नामोनिशान मिटाने का सशस्त्र युद्ध प्रारम्भ किया था। जो लोग क्रान्ति से विश्वासघात करके अंग्रेजों का साथ दे रहे थे, उनके खिलाफ वीर योद्धा रामरतन के मन में तीखी घृणा थी।
1857 में ग्राम भटपुरा के जमींदार बिहारी लाल और जसराम थे जिनके अन्याय और क्रूरता से जनता त्रस्त थी । वीर रामरतन ने अपने सहयोद्धाओं को ग्राम भटपुरा के ब्रिटिश राजभक्त जनशत्रु जमींदार बिहारी लाल और जसराम पर आक्रमण किया, उन्हें हराकर गांव से खदेड़ दिया और उनके मकानों, अनाज भण्डारों और उनकी कृषि जायदाद पर कब्जा करके ग्राम भटपुरा का जमीदार स्वयं को घोषित कर दिया। वीर रामरतन ने ग्राम भटपुरा और आसपास के क्षेत्र से ब्रिटिश राज्य की समाप्ति की घोषणा कर दी। राजस्व अधिकार अपने हाथ में ले लिये।
मध्य जून 1858 में पकड़े जाने पर ए ओ ह्यूम ने स्पेशल कमिश्नर की हैसियत से दाण्डिक प्रकरण क्रमांक 23 शासन बनाम रामरतन की सुनवाई की थी। ह्यूम ने आरोपी रामरतन की क्रान्ति में भूमिका को अति गंभीर मानते हुए प्रकरण में आए साक्ष्य पर भरोसा कर रामरतन को हथकड़ी-बेड़ी सहित 5 वर्ष का दिनांक 29 जनवरी 1858 को सश्रम कठोर कारावास का दण्ड देकर उनकी सारी सम्पत्ति राजसात किए जाने का निर्देश दिया था। राजसात की गई जायदाद को नीलामी के द्वारा बेचकर प्राप्त धन से बिहारी लाल और जसराम को क्षति देने और बचे धन को सरकारी कोष में जमा किए जाने का आदेश दिया था।







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