कालपी- उरई | ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व की कालपी नगरी के चैयरमेन का खिताब हासिल कर अरविन्द यादव ने न केवल इतिहास रच डाला बल्कि प्रदेश की दूसरे नंबर की पार्टी सपा के लिए खतरे की ऐसी घंटी बजा दी है जिससे इस दल के कर्ताधर्ताओं की रातों की नींद उड़ गयी है |
यादव समाज को समाजवादी पार्टी का पेटेंट माना जाता है इस मुगालते में गर्दिश के दौर से उबरने के लिए सपा ने यादवों की कीमत पर अन्य वर्गों को साधने के लिए कमंद फेकनी चाही जिसे ले कर यादवों में विद्रोह की आंच सुलग उठी | अरविन्द यादव ने सही मौके पर कालपी से अपनी दावेदारी का एलान कर अपनी बिरादरी की दुखती रग पर जिस ढंग से हाथ रखा उसके चलते उनके पक्ष में ध्रुवीकरण का ककहरा लिखा जाने लगा | इस बीच भाजपा से स्थानीय स्तर पर बिदके वैश्य समाज को भी अपनी पार्टी को सबक सिखाने के लिए संबल की तलाश थी | आहिस्ते से अरविन्द ने उनके रोष को भी अपने आगोश में धर समेटा | उनके मिलनसार स्वभाव से प्रभावित अन्य बिरादरी के लोग भी उनकी मजबूती भांप उनकी ओर मुखातिब हो गए और इस तरह उनकी जीत के समीकरण रच गए जिसकी इबारत न सपा पढ़ सकी न तथाकथित मुख्यधारा के दूसरे और दल | कालपी में अरबिन्द यादव को 5830, बसपा के दीवान अतीक सिद्धीकी को 5739, भाजपा के रमेश तिवारी को 4885 और सपा के कमर अहमद को 3391 मत मिले।
अरविन्द यादव ने सपा के कोर वोटरों को जो आवाज दी उससे पूरा जिला संक्रमित हुआ जिसे पार्टी नेतृत्व अंक नहीं पाया | जिला मुख्यालय की सीट पर सपा की दयनीय स्थिति इसकी गवाह है | यहाँ सपा उम्मीदवार कुसुमारानी को सिर्फ 7333 मत मिले हैं जिससे जाहिर है कि वे केवल अपनी बिरादरी तक जा सिमटी | जिसका कारण सपा के कोर वोटर का उनसे छिटकना रहा नतीजतन उन्हें न केवल यादव वोटरों से महरूम होना पडा बल्कि उनकी सक्रियता से उनके पक्ष में बनने वाले माहौल की वजह से सभी वर्गों के वोटों की जो ताकत उन्हें मिलनी थी उससे भी उन्हें हाथ धोना पडा | पिछले चुनाव में ज्ञानेंद्र निरंजन को मिले मतों जितने वोट भी उन्हें न मिल पाना आखिर क्या कहानी कहता है |
कालपी और उरई ही नहीं अन्य नगर निकायों में भी सपा के कोर वोटरों के मुंह मोड़ने से उसकी जो दुर्गति हुई वह विश्लेषण का विषय है |







Leave a comment