पंचनद: चंबल विद्यापीठ परिवार द्वारा हिम्मतपुर ग्राउंड पर कराए जा रहे ‘पंचनद क्रिकेट चैंपियनशिप’ के छठवें दिन हमीरपुरा और पुरवा टीमों के बीच भिंडत हुई। हमीरपुरा टीम ने टाॅस जीतकर गेंदबाजी का फैसला किया। बल्लेबाजी करते हुए पुरवा टीम निर्धारित 12 ओवर में से 9.1 ओवर में 61 रन बनाकर आल आउट हो गयी।
जवाब में उतरी हमीरपुरा टीम 7 ओवर में 3 विकेट के नुकसान 62 रन बनाकर जीत हासिल की। हमीरपुरा टीम के साहिल ने सर्वाधिक 16 रन बनाए। वहीं सिद्धार्थ 2 विकेट लेने के साथ नाबाद 12 रन बनाकर मैन आफ द मैच रहे।
पांच नदियों के महासंगम के नजदीक यह चैंपियनशिप 1857 के क्रांतिवीरों की स्मृति में हो रही है। जिसमें जालौन, औरैया, इटावा और भिंड के खिलाड़ी हिस्सा ले रहे हैं। हर दिन की तरह मैच की शुरुआत से पहले वीरांगना ममतामयी रानी तेजाबाई को नमन किया गया। इस दौरान पंचनद क्रिकेट चैंपियनशिप के संस्थापक लेखक डॉ. शाह आलम राना ने स्वतंत्रता संग्राम में जालौन की रानी का उल्लेख करते हुए बताया कि फिरंगी सरकार ने जालौन की रानी तेजाबाई के अवयस्क पुत्र को गद्दी से अपदस्थ करके अंग्रेजी राज्य के निष्ठावान चाकर केसो राव को जालौन की राज्य-व्यवस्था सौंप दी थी। रानी तेजाबाई क्रांति के पूर्व से ही जालौन की अपनी खोई हुई गद्दी को पुनः प्राप्त करने की तैयारियाँ कर रही थीं। उनका क्षेत्र और आसपास के सभी क्रांतिवीरों से जीवंत संपर्क बना हुआ था। कानपुर में जैसे ही क्रांति की ज्वाला धधकी और बाद में झांसी पर क्रांतिकारियों का अधिकार हुआ, उसी समय क्षेत्र के क्रांतिवीरों के सहयोग से, मुख्य रूप से तात्या टोपे के संरक्षण में रानी तेजाबाई और उनके अवयस्क पुत्र का जालौन की गद्दी पर अधिकार हो गया। एक विश्वस्त क्रांति योद्धा विश्वास राव को रानी ने केसो राव के स्थान पर अपने राज्य का प्रबंधक बना दिया। क्रांति के राष्ट्रीय नेता नाना साहब का नेतृत्व स्वीकार कर लिया गया और क्रांति के सहयोग के लिए तात्या टोपे को तीन लाख रूपया भेंट कर दिया गया। उसी समय से रानी तेजाबाई 12 महीनों तक लगातार जालौन की गद्दी पर काबिज बनी रहीं। उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई की भाँति क्रांतिकारी संघर्ष में सशस्त्र भाग तो नहीं लिया लेकिन विद्रोहियों का हर प्रकार से साथ अवश्य दिया था। जालौन से गुजरने वाली क्रांतिकारी सेनाओं को रसद सामग्री की व्यवस्था करना, सैनिकों की पुरानी टूटी तलवारों और भालों की जगह लुहारों से बनवाकर नई तलवारें और अन्यान्य शस्त्र देना उनकी प्राथमिकता थी। जिन सैनिकों पर जूते और ड्रेस नहीं होती थी, रानी उनकी भी व्यवस्था करतीं और विद्रोही सैनिकों को आर्थिक संकट की दशा में तथा उनकी अनुपस्थिति में उनके घरवालों की आर्थिक मदद भी करती थीं। एक हद तक वे क्रांतिकारी सैनिकों की ममतामयी माँ बन गई थी। किंतु कौंच और कालपी की लड़ाई में क्रांतिकारियों के पराजित हो जाने के बाद अंग्रेज सेना ने ह्यूरोज के नेतृत्व में जालौन पर अधिकार कर लिया। तब तात्या टोपे और अंचल के क्रांतिकारी योद्धा रानी तेजाबाई और उनके अवयस्क पुत्र को पंचनदे पर स्थित सेंगर राजा के जगम्मनपुर के किले में ले आए। अप्रैल 1859 तक जगम्मनपुर का यह किला क्रांतिकारियों का दुर्ग बना रहा।







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