पंचनद: चंबल विद्यापीठ परिवार द्वारा हिम्मतपुर ग्राउंड पर चल रहे ‘पंचनद क्रिकेट चैंपियनशिप’ के दसवें दिन क्वार्टर फाइनल के दो मैच खेले गए। पहली पाली में माधोगढ़ और जुहीखा टीमों के बीच क्वार्टर फाइनल मुकाबला हुआ। जुहीखा टीम ने टाॅस जीतकर गेंदबाजी करने का फैसला लिया। बल्लेबाजी करते हुए जुहीखा ने निर्धारित 12 ओवर में से 10.3 ओवर में 40 रन बनाकर ढेर हो गयी। जवाब में उतरी माधोगढ़ टीम ने 5.1 ओवर में 3 विकेट के नुकसान से जीती। माधोगढ़ टीम के खिलाडी यशवेंद्र सिंह ने 15 रन बनाने के साथ 3 विकेट लेकर मैन आफ द मैच रहे।
दूसरी पाली में रुपापुर और बटपुरा टीमों के बीच क्वार्टर फाइनल भिडंत हुई। बल्लेबाजी करते हुए रुपापुर टीम ने निर्धारित 12 ओवर में 8 विकेट के नुकसान से 97 रन बनाये। रुपापुर टीम के खिलाडी ऐवरन सिंह ने सर्वाधिक 32 रन बनाये।
जवाब में बटपुरा टीम ने 10.1 ओवर में 4 विकेट के नुकसान से जीत गयी। बटपुरा टीम के खिलाडी सुधांशु ने 36 रन बनाने के साथ 3 विकेट लेकर मैन आफ द मैच रहे।
पांच नदियों के महासंगम के नजदीक यह चैंपियनशिप 1857 के क्रांतिवीरों की स्मृति में हो रही है। जिसमें जालौन, औरैया, इटावा और भिंड के खिलाडियों ने हिस्सा लिया है। इस दौरान चंबल अंचल के महान क्रांतियोद्धा और विद्रोही सैनिक गंगा सिंह को नमन किया गया। पंचनद क्रिकेट चैंपियनशिप के संस्थापक डॉ. शाह आलम राना ने बताया कि विद्रोही सैनिक गंगा सिंह का जन्म यमुना-चंबल के दोआबा क्षेत्र में इटावा जिले के ग्राम कुंदौल में हुआ था। 1857 के स्वातंत्र्य समर में खासकर दोआब में उनकी प्रमुख भूमिका रही। इसके पहले वे अंग्रेजी सेना में थे। क्रांति से पूर्व ही गंगा सिंह को ब्रिटिश अधिकारियों ने बिना मुकदमा चलाए और बिना आरोप लगाए 12 महीनों तक इटावा की जेल में बंद करके रखा था। अंग्रेजी राज्य में ठगी और डकैती विभाग पृथक से होता था। उसी के द्वारा इनको जेल मे नजरबंद करके रखा गया था। इनकी सैन्य टुकड़ी में इन्हीं के गांव के सैनिक पंडित नंद किशोर और ठाकुर थान सिंह भी थे। इन्हें भी क्रांति के प्रारंभ में बिना मुकदमें के 12 महीनों तक जेल में बंद करके रखा गया था।
निश्चित तिथि से पूर्व ही क्रांति की ज्वाला भड़क उठने से 22-23 मई की दरम्यानी रात में बाहर के विदोहियों और अंदर के कैदियों ने मिलकर इटावा की जेल तोड़ दी। ह्यूम तो पहले ही ऐहतियातन अंग्रेज महिलाओं, बच्चों को, खजाने सहित आगरा भिजवा दिया था। शेष खजाना विद्रोहियों ने लूट लिया। बचे खुचे अंग्रेज अफसर ओर यूरोपियन नागरिक जो इटावा नगर में रह गए थे, बिना उनके जीवन को हानि पहुँचाए तत्काल इटावा छोड़कर भाग जाने के लिए कह दिया। इस तरह स्थानीय क्रांतिकारियों ने 23 मई 1857 को इटावा को स्वतंत्र घोषित कर दिया। स्त्रियों के कपड़े पहनकर नाटकीय ढंग से एओ ह्यूम अपने विश्वस्त चपरासी गयादीन की सहायता से इटावा छोड़कर आगरा जिले के एक गांव बढपुरा भाग गया था।
जेल से फरार होकर गंगा सिंह अपने गांव के ठाकुर थान सिंह और पंडित नंदकिशोर के साथ विद्रोही सैनिकों की एक टुकड़ी लेकर चंबल क्षेत्र में आ गए और आगरा जिले के पूर्वी भाग में स्थित बाह-पिनाहट से लेकर पंचनद क्षेत्र में उन्होंने अन्य क्रांतिकारी शक्तियों से मिलकर एक जुझारू मोर्चा बना लिया।
ब्रिटिश सरकार की नजर में वे इतने खतरनाक क्रांतिकारी थे कि 7 फरवरी 1858 में अनन्तराम (महेवा) के युद्ध के बाद उनकी गिरफ्तारी के लिए 5000 हजार का इनाम घोषित कर दिया गया। पर वे 1858 के बसंत और गर्मी के समय में अनंतराम, अजीतमल आदि क्षेत्रों में अंग्रेजी फौज के खिलाफ लगातार लड़ते रहे। ह्यूम ने इटावा जिले की क्रांति का उन्हें मुख्य नेता बताते हुए लिखा था कि-अंग्रेजी सेना के खिलाफ विद्रोहियों से जितने युद्ध हुए उन सभी युद्धों में क्रांति के कमांडर इन चीफ की भूमिका में गंगा सिंह ही रहे। ह्यूम गंगा सिंह से इतना नाराज था कि उसने भावावेश में सरकार को लिखा था कि यदि गंगा सिंह मेरी पकड़ में आ जाए तो मैं बिना मुकदमा चलाए, पकड़ते ही उसका वध कर दूँगा।







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