पंचनद: चंबल विद्यापीठ परिवार द्वारा हिम्मतपुर ग्राउंड पर चल रहे ‘पंचनद क्रिकेट चैंपियनशिप’ के बारहवें दिन सेमी फाइनल के दो मैच खेले गए। पहली पाली में बेनीपुरा और कंधावली टीमों के बीच मुकाबला हुआ। कंधावली टीम ने टाॅस जीतकर बल्लेबाजी करते हुए निर्धारित 12 ओवर में 8 विकेट के नुकसान से 96 रन बनाये। कंधावली टीम के लालू ने 34 रन बनाये वहीं विवेक ने 3 विकेट झटके। 

जवाब में उतरी बेनीपुरा टीम लक्ष्य का पीछा करते हुए 10.3 ओवर में 5 विकेट के नुकसान से जीत गयी। बेनीपुरा टीम के खिलाडी मानवेंद्र ने 32 रन बनाये वहीं शोएब ने 3 विकेट लिए। मानवेंद्र मैन आफ द मैच रहे। 

दूसरी पाली में खोड़न और बटपुरा टीमों के बीच भिडंत हुई। बटपुरा टीम ने टाॅस जीतकर गेंदबाजी का फैसला लिया। बल्लेबाजी करते हुए खोड़न टीम 11.3 ओवर में 86 रन बनाकर ढेर हो गयी। खोड़न टीम के खिलाडी दीपू रैना ने 23 रन बनाये वहीं अभय ने 4 विकेट लिए। जवाब में उतरी बटपुरा टीम 11.5 ओवर में 9 विकेट के नुकसान से जीत हासिल की। बटपुरा टीम के खिलाडी विकास और मान सिंह 3-3 विकेट झटके। बटपुरा टीम के खिलाडी अखिल सर्वाधिक 33 रन बनाकर मैन आफ द मैच रहे। 

पांच नदियों के महासंगम के नजदीक यह चैंपियनशिप 1857 के क्रांतिवीरों की स्मृति में हो रही है। जिसमें जालौन, औरैया, इटावा और भिंड के खिलाडियों ने हिस्सा लिया है। इस दौरान चंबल अंचल के महान क्रांतिकारी बलदेव सिंह लोधी को नमन किया गया। पंचनद क्रिकेट चैंपियनशिप के संस्थापक डॉ. शाह आलम राना ने कहा कि 

क्रांतियोद्धा बलदेव सिंह लोधी इटावा जिले के ग्राम पृथीरामपुर के निवासी थे। उनके गांव के आसपास के अनेकों गांवों में लोधी राजपूत जाति के लोगों का बाहुल्य था। 1857 की क्रान्ति का प्रारम्भ होते ही बलदेव सिंह ने अपने समाज के सैकड़ों रणबाकुरों को जागृत, संगठित ओर हथियारबंद किया था। उनका दूर-दूर तक व्यापक प्रभाव था। ग्राम शोरेपुर (अजीतमल) के वीर डूंगर और चुन्नी लोधी उनके बहादुर सहयोद्धा थे। डूंगर और चुन्नी जून, जुलाई और अगस्त 1857 तक क्रान्तियुद्ध में बहुत सक्रिय रहे, उनके आसपास के संपूर्ण क्षेत्र में फिरंगियों के राज्य का कोई नामो निशान नहीं रह गया था। 

अप्रैल 1858 में अजीतमल क्षेत्र में जब अंग्रेजी राज फिर कायम हुआ ‘तब एक दिन अंग्रेज अधिकारी ने रसद की तलाश में ग्राम शोरेपुर में दो चपरासियों को भेजा, डूंगर और चुन्नी ने उनसे कहा कि “कलेक्टर भाग गया है और तुम रसद मांगने आए हो। डूंगर और चुन्नी ने गांव वालों से कहा कि उन्हें रसद दो। जिस पर गांव वालों ने उनकी पिटाई कर भगा दिया। डूंगर और चुन्नी  के साथ सदैव 20 से लेकर 100 क्रान्तियोद्धा रहते थे। बलदेव सिंह और उनके क्रान्ति योद्धाओं ने अपने क्षेत्र के हर उस व्यक्त को दण्ड दिया था जो अंग्रेजों का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष साथ देते थे। उन्होंने अहमदपुर, रतनपुर, किरपालपुर, दाऊपुर, कांकेरपुर पर कब्जा कर लिया था और बिदारी के अंग्रेज भक्त डालचंद्र से हुए एक युद्ध में डालचन्द्र के तीन सैनिक मार डाले थे। 

पृथीरामपुर और ईशरीपुर क्रान्तिकारियों के मजबूत गढ़ थे जहाँ का प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी अपवाद के अंग्रेजी राज के खिलाफ मजबूती से खड़ा था। 

वीर योद्धा डूंगर और चुन्नी के बंदी बनाए जाने पर स्पेशल कमिश्नर की हैसियत से एओ ह्यूम ने केस नं 3 शासन बनाम डूंगर और चुन्नी का विवरण दिया है, उन दोनों पर डकैतों (विद्रोहियों) के बड़े गैंग का नेता होने, अनेकों लूटपाट और डकेैतियों की वारदात ने शामिल रहने, हत्याएँ करने, आगजनी की जून, जुलाई और अगस्त 1857 की असंख्य घटनाएं करने का आरोपित किया था। ह्यूम इन दोनों क्रान्तिवीरों को अनुकरणीय सजा देना चाहता था, किन्तु मुकद्दमे की सुनवाई के दौरान ब्रिटिश शासन ने आदेश देकर उस प्रकरण को सत्र न्यायालय मैनपुरी को अंतरित कर देने का आदेश दिया था। 

अजीतमल क्षेत्र के रामनगर शाहपुरा और रजपुरा गांवों भी गूजर बाहुल्य थे, उन गांवों के सभी लोग 1857 क्रान्ति में बढ़चढ़कर भाग लिया था। गांवों के सभी वीर चुन्नी, डूंगर, बलदेव सिंह, मारून सिंह और रूप सिंह सेंगर के अंग्रेजी फौजों के खिलाफ अभियानों में सक्रिय भागीदारी करते थे। 12 जुलाई 1858 को जब क्रान्तिकारी सेना के साथ रूप सिंह सेंगर रामनगर में अपना सैन्य पड़ाव डाले थे तब क्रान्तिकारी सेना और अंग्रेजी सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ था। इस युद्ध में 20 क्रान्तिकारी सैनिक शहीद हुए थे। क्रान्ति के दमन के बाद ग्राम शाहपुर के क्रान्ति वीर चौधरी सीताराम को कालापानी की सजा का दण्ड देकर उनकी सारी सम्पत्ति जप्त कर ली गई थी। 

22 दिसम्बर 1858 को मैनपुरी के सत्र न्यायालय ने वीर योद्धा बलदेव सिंह लोधी को मृत्यु दण्ड देकर उनहें फांसी पर लटका दिया गया था। वीर योद्धा डूंगर और चुन्नी को कालापानी की सजा देकर उन्हें पोर्टब्लेयर (अंडमान) भेजा गया था |

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