गत् 28मई को नई संसद का एतिहासिक उद्घाटन विवादों के बीच हुआ लेकिन इसमें ज्यादा चर्चा अध्यक्ष के आसन के पास सैंगोल स्थापित करने की रही। सैंगोल को लेकर व्यापक बुद्धि विलास किया गया। तमाम किवदन्तियांे में कितनी सच्चाई है और कितनी कल्पना यह एक अलग बहस का विषय हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि इसकी स्थापना संसद और सरकार के कार्य संचालन में क्या गुणात्मक प्रभाव डालेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में अब यह बहुत अच्छी तरह स्थापित हो चुका है कि वे अच्छे ईवेन्ट मैनेजर है। हर प्रसंग की नाटकीय प्रस्तुति में उन्हें महारत हासिल है जिसमें रहस्य रोमांच का जबरदस्त पुट वे पैदा कर देते है। सैंगोल की संसद में स्थापना के दौरान भी उन्होंने इसमें कोई कसर नहीं छोडी। इसकी पूरी विषय वस्तु का उन्होंने जमकर महिमा मंडन किया और सार्वजनिक रूप से सैंगोल के उनके दण्डवत प्रणाम ने मुग्ध जनमानस को तरल भावुकता में सराबोर कर दिया। कर्नाटक की पराजय के प्रभाव को पोछने के लिए उनका यह मास्टर स्ट्रोक बेहद कारगर रहने वाला था। लेकिन उसी दिन महिला पहलवानों को सबक सिखाने का अदूरदर्शी बाजी पलटाने वाला साबित हुआ है। जंतर मंतर से उनकी बल पूर्वक बेदखली के मामले की गंूज अंतर्राष्ट्रीय मंचो तक सुनायी देने लगी है और सैंगोल की चर्चा एक तरफ हो गयी। अब तो देश में और देश के बाहर महिला पहलवानों के दमन का प्रयास ही चर्चाओं के केन्द्र में दिखायी दे रहा है। यहां तक कि प्रधानमंत्री के विदेश दौरे को आधार बनाकर विश्व के सबसे सम्मानित नेता के रूप में नये सिरे से जनता के बीच पेश करने के जो कौतुक हुए थे वे भी बेमानी हो गये हैं। भारतीयों को अपने अतीत का गौरव बखान बहुत गुदगुदाता है। भले ही इससे जुडी गल्प कथाओं का कोई सिर पैर हो या न हो। प्रवंचना में जीने की भारतीय समाज को बीमारी है। सैंगोल कथा के माध्यम से देश को भ्रमित मानसिकता में घेरने का जो उपक्रम किया गया वह विचित्र है। धर्म का स्थान अलग है और संविधान का स्थान अलग। अगर धर्म एक नैतिक व्यवस्था का नाम है तो संविधान में वह स्वतः निहित है। दरअसल देश के सासंारिक व्यवस्थापन के लिए एक सुस्पष्ट संविधान अनिवार्यता है जबकि वैदिक कहे या सनातन- धर्म मंे दर्शन के तत्व तो उच्च कोटि के हो सकते है लेकिन भौतिक नियमन के मामले से धर्म का कोई विशेष वास्ता नहीं है। जैसे वर्तमान सत्ताधारी कुनबे को रामराज का उच्चार बहुत सुहाता है। लेकिन भौतिक तौर पर इसकी कोई कल्पना प्रस्तुत कर पाना उनके लिए सम्भव नहीं है। बताना होगा कि रामराज में क्या था। क्या राज्य की पहली शर्त के रूप में शासन और न्याय के बीच पृथक्करण रामराज की व्यवस्था में दिखाया गया है या राजा ही शासन करेगा और वहीं न्याय ऐसा निर्देशन किया गया है। इसी तरह कबीलाई स्थिति के विकास के बाद जब राज्य आया तो उसकी पहचान इस रूप मंे होती है कि उस समय शासन जटिल हो चुका था। इस कारण शासन में कार्य क्षेत्र के विभाजन की स्थिति आ गयी थी। राजा के जो मंत्री होते थे। उन्हंे अलग अलग विभाग इसके तहत सौपें जाने लगे थे। लेकिन रामराज के वर्णन में मंत्रियों के बीच ऐसे कार्य विभाजन की कोई तस्वीर प्रदर्शित नहीं है। जहां तक शासन के धर्म दण्ड से इस बात के लिए शपथबद्ध होने का प्रश्न है कि वह लोगों के साथ न्याय के लिए करें तो इसकी भी कोई रूप रेखा नहीं दिखती। जबकि इसके बिना न्याय का गान खोखला है, निस्सार है। आधुनिक न्याय प्रणाली तकनीकी है जिसमें प्रक्रियायें बनानी पडती है और अलग अलग अपराधों के लिए सजा के मानक तय करने पडते है। सनातन धर्म इस्लाम की तरह नहीं है जिसमंे शरियत के अन्दर निर्देशित किया गया है कि कोई चोरी करते पकडा जाये तो उसके हाथ काटे जायेंगे और इसी तरह के तमाम दण्ड विधान लेकिन सनातन या वैदिक धर्म मंे कोई सर्वमान्य दण्ड विधान तलाशना मुश्किल है। दरअसल सनातन धर्म में चिंतन की शक्ति के उत्कर्ष के तत्व निहित हैं जबकि सांसारिकता के लिए इसकी व्यवस्था में दूसरे विकल्प अपनाये जाने चाहिए। इस कारण जरूरत इस बात की है कि लोगों को गलत फहमी में धकेल कर व्यवस्था को अस्त व्यस्त न किया जाये। इसलिए शासन के मामले में संवैधानिक प्रतिबद्धता सर्वोपरि है जिसे लेकर कोई गफलत नहीं लायी जानी चाहिए। |







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