देश की हिन्दी पट्टी में मंगलवार को हिन्दी पत्रकारिता दिवस जोर शोर से मनाया गया। ब्लाक और तहसील स्तर तक इस दिन विचार गोष्ठियां हुयी जिनमें पत्रकारिता से जुडे संमकालीन मुद्दों पर महत्वपूर्ण चर्चाए की गयी। किसी संस्था या विधा की बात आती है तो उसके इतिहास पर दृष्टि चली जाती है। जिससे पता चल सके कि उसके जड में क्या है, उस संस्था के आदि पुरूषों ने किन मूल्यों से प्रतिबद्धता के लिए बडी बडी कीमते चुकायी। भारत में आधुनिक पत्रकारिता की शुरूआत जेम्स आगस्टस हिकी ने बंगाल गजट नाम के साप्ताहिक से की जो अंग्रेजी में छपता था। उस समय कम्पनी का शासन था और हिकी ने कम्पनी के अधिकारियों को ही निशाना बना डाला। बात यहां तक पहंुच गयी कि उसने गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंगज को भी नहीं बख्शा इसलिए गोरे होने के बावजूद उसे कम्पनी सरकार का कोप भाजन बनना पडा। जेल जाकर भी उसने सीखचों के अन्दर से ही अखबार निकालना जारी रखा लेकिन साधनों के अभाव में वह कब तक लड पाता । जल्द ही बंगाल गजट की भ्रूण हत्या हो गयी। इसके बाद कम्पनी सरकार के ही रहते हुए उत्तर प्रदेश के पंडित जुगलकिशोर शुक्ला ने उस समय देश की राजधानी होने के नाते कलकत्ता से पहला हिन्दी साप्ताहिक उद्दन्त मार्तण्ड निकाला। तब तक कम्पनी सरकार अखबार की फितरत को समझ चुकी थी। इसलिए किसी अखबार पर रहम करके अपनी आलोचना के स्वर को बल देना उसने गवारा नहीं किया। जुगलकिशोर ने अपने अखबार को बाहर भेजने के लिए रियायती पोस्टल शुल्क की याचना की लेकिन इसे कम्पनी सरकार ने मंजूर नहीं किया। फिर पता चला कि हिन्दी प्रान्तों से आकर कलकत्ता में सरकारी नौकरी कर रहे लोगों के घर उद्दन्त मार्तण्ड पहुंचने लगा है तो उसने संदेशा भेज दिया कि जिस मुलाजिम या उसके रिश्तेदार के खिलाफ यह अखबार पाया गया उसे नौकरी से निकाल दिया जायेगा। इसी तरह हिन्दी प्रान्तों से आकर कलकत्ता में कारोबार जमा लेने वाले सेठ अखबार को विज्ञापन दे देते थे। इसलिए उनकों भी धौस दिलवा दी जिससे उद्दन्त मार्तण्ड को धक्का पहुंचा और यह अखबार भी कुछ समय बाद दम तोड गया। इसी बीच अखबार के मंच की ताकत का अनुभव करके स्वाधीनता प्रेमी आगे आये। हिन्दी का पहला दैनिक समाचार पत्र समाचार सुधा वर्षण भी कम्पनी सरकार के समय निकला जिसमें प्रथम स्वाधीनता संग्राम के नायकांे का महिमा मंडन होता था। यहां तक कि सुधा वर्षण में कम्पनी सरकार को उखाड फैकने की बहादुर शाह जफर की अपील भी प्रकाशित कर दी गयी। जिस पर अखबार के सम्पादक श्याम सुन्दर सेन के खिलाफ देश द्रोह का मुकदमा चला दिया गया। हालाकि सेन इसमें विजयी हुए क्योंकि जज को यह मानना पडा कि वैधानिक रूप से बहादुर शाह जफर के नाम पर ही देश में अभी हुकूमत चल रही है। सो जफर का संदेश छापना देश द्रोह कैसे माना जाए। इसके बाद जितने भी स्वतंत्रता के आन्दोलन के महानायक थे लोकमान्य तिलक से लेकर महात्मा गांधी, बाबा साहब अम्बेडकर, सरदार भगत सिंह सभी ने विदेशी शासन के खिलाफ जनमत तैयार करने के लिए कलम का सहारा लिया और अखबार निकाले। खीचों न कमान न तलवार निकालों जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो अकबर इलाहाबाद की ये पंक्तियां इस मामले मंे कारगर साबित हुयी। अखबारों का स्वाधीनता की प्राप्ति में बडा योगदान रहा। स्वाधीनता के बाद पत्रकारिता की प्रासंगिकता खतरे मंे थी। लेकिन उद्योगपति और धन्ना सेठ अनुभव करते थे कि पैसे से समाज में प्रतिष्ठा नहीं हो पाती इसलिए धर्मादा कार्यों का सहारा वे समाज मंे अपनी छवि बनाने के लिए लेते थे। स्वतंत्रता संग्राम मंे पत्रकारों और अखबारों का समाज में जो आदर बन गया था। उसे ध्यान में रखकर वे इसके लिए पत्रकारिता की ओर भी उन्मुख हुए। उनकी तमन्ना होती थी कि भले ही उनके प्रकाशन घाटे में चले जिसकी पूर्ति अपने दूसरे धन्धों के मुनाफे से करने में उन्हें हिचक नहीं थी। लेकिन वे चाहते थे कि उनके द्वारा चलाये जा रहे पत्र पत्रिकाओं की अपनी साख हो। वे सम्पादक के रूप मंे बौद्धिक महारथियों का चयन करते थे जबकि उनके सामने उनकी खुद की चल भी नहीं पाती थी। उन सम्पादकों की अपनी गरिमा थी। इसलिए उन्हें पढने की लालसा लोगों में बनी रही और पत्रकारिता चुकी नहीं। पत्रकारिता का बुरा दौर नरसिंहा राव द्वारा आर्थिक उदारीकरण के समय से शुरू हुआ। जब ये व्यसायिक बन गयी। मालिकों ने अखबारों को मुनाफे का धंधा बना लिया। लाइजनिंग वाले लोग सम्पादक बनाये जाने लगे। उन्होंने जिलो और तहसीलों तक अपने मिजाज के लोगों की फौज पत्रकार के रूप में खडी कर दी। महात्मा गांधी कहते थे कि उनका ध्येय पत्रकारिता के माध्यम से मुनाफा कमाना नहीं अपने विचारों को फैलाना है। भगत सिंह भी मानते थे कि अखबार सूचनाओं का व्यापार नहीं है। यह जनता को शिक्षित करने का माध्यम है उसे संकीर्ण भावनाओं से उबारना, साम्प्रदायिक भावनाओं से दूर करना यह अखबारों का कर्तव्य है। विचारों के प्रसार को पत्रकारिता का मूल काम माना जाता था। लेकिन आज अखबारों, चैनलों में विचारो का महत्व कितना रह गया है। पत्रकारिता के मंच सनसनी फैलाने, उत्तेजना फैलाने, उन्माद पैदा करने और कौतुहल के माध्यम रह गये है। इलैक्ट्रानिक चैनलों को तो न्यूज चैनल की बजाये मनोरंजन माध्यम के रूप में दर्ज करने की मांग हो रही है। बेपटरी पत्रकारिता को पटरी पर लाना आज के समय की सबसे बडी चुनौती बन गयी है।







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