गांधी और गीता प्रेस


गीता प्रेस गोरखपुर को वर्ष 2021 के गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया जायेगा। यह फैसला पुरस्कार के लिये गठित जूरी ने लिया है जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें इस पुरस्कार को गीता प्रेस को देने पर विवाद की आशंका नहीं रही हो पर उन्होंने जानबूझकर कांगे्रस को मिर्ची लगाने के लिये इस हेतु गीता प्रेस का चयन किया। पुरस्कार के संबंध में कहा गया है कि गीता प्रेस को यह पुरस्कार अहिंसक और दूसरे गांधीवादी तरीकों से सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन की दिशा में योगदान के लिये दिया जा रहा है। जैसा कि अपेक्षित था कि कांग्रेस ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया जतायी है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा है कि इस सम्मान को देने के लिये गीता प्रेस का नाम तय करने का फैसला सावरकर और गोडसे को पुरस्कार देने जैसा है। कांग्रेस की इस प्रतिक्रिया की आलोचना की जा रही है और इसके लिये हिंदू धर्म, संस्कृति के प्रचार हेतु गीता प्रेस के दीर्घकालीन प्रयासों का स्मरण कराया जा रहा है। सवाल यह नहीं है कि गीता प्रेस के इस योगदान के लिये हिंदू संस्कृति के प्रति आस्थावान लोगों के मन में क्या कृतज्ञता नहीं होनी चाहिये। इसलिये अगर ऐसे लोग गीता प्रेस को आदर के साथ देखते है तो उसमें कुछ अन्यथा नहीं है पर जिस पुरस्कार के साथ गांधी का नाम जुड़ा है उसे गीता प्रेस को देने के पहले गांधी और गीता प्रेस के संस्थापकों के रिश्तों को ध्यान में रखा जाना चाहिये था। जयराम रमेश की प्रतिक्रिया को अतिरंजित होना माना जा सकता है लेकिन उन्होंने गीता प्रेस के बारे में शोध करने वाले अक्षय मुकुल की किताब गीता प्रेस एण्ड द मेकिंग आॅफ हिंदू इण्डिया का हवाला दिया है उसकी रोशनी में गांधी और गीता प्रेस के रिश्ते की जो जानकारी मिलती है उससे साफ जाहिर हो जाता है कि यह फैसला शुद्ध विवेक से नहीं शरारतन किया गया है।
इस किताब से पता चलता है कि गीता प्रेस मंदिरों में दलितों के प्रवेश की कतई विरोधी थी जबकि गांधी जी इस मानसिकता को बदलने की जद्दोजहद में जुटे रहे थे। इस प्रश्न पर उनके और गीता प्रेस के संचालकों के बीच इतने तीखे मतभेद हो गये थे कि जब गांधी जी की हत्या की गयी तो गीता प्रेस की पत्रिका में इस पर एक शब्द नहीं लिखा गया था। इस से गीता प्रेस के मालिकों के बहुत प्रशंसक रहे घनश्यामदास बिड़ला ने नाराज होकर उनसे सारे संबंध तोड़ लिये थे। इतना ही नहीं अक्षय मुकुल की किताब के मुताबिक 30 जनवरी 1948 को गांधी जी की हत्या के सिलसिले में जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया था उनमें गीता प्रेस के ट्रस्टी जयदयाल गोयनका और हनुमान प्रशाद पोददार भी थे। अत्यंत निष्ठावान वैष्णव घनश्यामदास बिड़ला ने कहा था कि ये दोनों सनातन धर्म का प्रचार नहीं कर रहे थे बल्कि शैतान धर्म का प्रचार कर रहे थे।
जरूरी नहीं है कि हर कोई गीता प्रेस के बारे में घनश्यामदास बिड़ला के इस कथन से सहमत हो। गांधी जी से उनके मतभेदों के बावजूद गीता प्रेस के संचालकों के प्रति बहुत लोगों को श्रद्धा हो सकती है लेकिन गांधी के नाम पर दिये जाने वाले पुरस्कार के लिये तो गीता प्रेस के नाम को यह जानने के बाद आगे करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। यह सरासर धृष्टता है। गांधी शांति पुरस्कार से भी बड़े पुरस्कार होंगे जिनके लिये गीता प्रेस का नाम तय किया जाता तो किसी को आपत्ति नहीं होती। यह तो गांधीवादियों को चिढ़ाने वाली बात हो गयी। इस शहजोरी के पीछे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरासर अहम्मन्यता है जिसमें वे हर अवसर पर यह दिखाना चाहते हैं कि उन्हें किसी लोकलाज की परवाह करने की जरूरत नहीं है। जब तक उनका सूरज चढ़ाव पर है वे जो करें उसे झेलने में ही लोग खैर समझें।
कई उदाहरणों से समझा जा सकता है कि प्रतिबद्धता के मामले में उनका कोई ठोस सोच नहीं है। जब वे प्रधानमंत्री बने थे तो अपने को गांधी जी का सबसे बड़ा भक्त साबित करने में कसर नहीं छोड़ते थे। सांसद प्रज्ञा ठाकुर ने लोकसभा में गांधी पर अनर्गल टिप्पणी कर दी थी तो वे आग बबूला हो गये थे। उनके इशारे पर खबरें छपीं थी कि मोदी प्रज्ञा ठाकुर को पार्टी से निष्कासित करने पर विचार कर रहे है लेकिन बाद में गांधी को लेकर वाॅटसप यूनीवर्सिटी जैसे माध्यमों की कृपा से हवा ऐसी बदली कि एक बड़ा वर्ग गांधी को खलनायक और गोडसे को हीरो मानने लगा तो मोदी का रूख भी बदल गया। उन्होंने भी गांधी के प्रति अपनी श्रद्धा पोंछ फेंकी और गांधी के नाम के पुरस्कार को मिट्टी करने के लिये इस हेतु गीता प्रेस का नाम लेकर आये। फिर दोहराना होगा कि गीता प्रेस के हिंदू धार्मिक साहित्य को प्रचारित करने में योगदान के कारण उसे सम्मान देने की पवित्र भावना मोदी में होती तो वे किसी और बड़े पुरस्कार हेतु उसका नाम रख सकते थे जिसमें विवाद भी नहीं होता।
किसी देश और समाज को आगे बढ़ाने के लिये विचारों और व्यवहार के स्तर पर उसे हर असमंजस से उबारने की कोशिश होनी चाहिये लेकिन इस मामले में हमारे अगुआकारों के पाखण्ड की इंतहा है जिन्हें लेकर यही पता नहीं चलता कि उनके कदम कहां पड़ रहे हैं और दिमाग कहां चलने को कह रहा है। जैसे दलितों के मंदिर में प्रवेश की ही बात है हो सकता है कि किसी काल खण्ड में इसके पीछे कोई उद्देश्य रहा हो पर आज एक ओर इस विचार को मान्यता दिलाने के लिये जोर लगाया जाये और दूसरी ओर बाल्मीकि समाज के लोगों के सार्वजनिक समारोह में पैर पखारने जैसे तमाशे किये जायें तो समाज को कैसे दिशा बोध कराया जा सकेगा। दलितों के मामले मात्र में ही गीता प्रेस ने आप्रासंगिक विचार प्रतिपादित नहीं किये स्त्रियों के मामले में भी उसने जो विचार रखे वे आज कहीं स्वीकार्य नहीं हैं। 1948 के कल्याण के एक अंक का हवाला दिया जाता है जिसमें कहा गया है कि पति कितना भी खराब हो पत्नी का कर्तव्य है कि उसका कभी विरोध न करे। लड़कियों को काॅलेज में पढ़ने के लिये नहीं भेजा जाना चाहिये। लड़कियों को घर के बाहर नौकरी के लिये नहीं जाना चाहिये। विधवा को बिस्तर पर नहीं जमीन पर सोना चाहिये। क्या आज इस तरह की बातों की वकालत करके समाज में स्थिरता और शांति की कल्पना की जा सकती है। एक ओर आप करेंगे कुछ और दूसरी ओर कहेंगे कि धार्मिक रूढ़ियों में कोई संशोधन स्वीकार्य नहीं है। आप उन धार्मिक किताबों को अटल अचल घोषित करेंगे जिनमें वर्ग विशेष को कितना भी गुणी होने पर सम्मान न देने के लिये निर्देशित किया हो दूसरी ओर राष्ट्रपति का पद जो कि संवैधानिक तौर पर सबसे अधिक सम्मानीय घोषित है वहां धार्मिक निषेध को नकारकर आप उसी वर्ग को सुशोभित करेंगे, जो कि अत्यंत श्लाघनीय भी है, जिसके लिये मनाही की गयी है। आप कैसे भगवान कृष्ण के उपासक हैं जिन्होंने अपने आचरण से यही प्रतिपादित किया है कि आचार विचार और नैतिकता स्थायी नहीं होते, युग के अनुसार उनमें परिवर्तन करते रहना चाहिये। उन्होंने धर्म युद्ध के परंपरागत प्रतिमानों की पग पग पर महाभारत में अवहेलना की ताकि आने वाली पीढ़ी को सिखा सकें कि अपनी उत्तरजीविता के लिये लोग युग धर्म को समझने का क्या महत्व है जिसे पाखंड और कपटाचार में लिप्त लोग कभी संज्ञान में नहीं ले सकते। 

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