वीपी सिंह के नाम से क्यों छिटके प्रधानमंत्री मोदी



पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह की 25 जून को जयंती पड़ती है। इस तिथि का एक ऐतिहासिक महत्व भी है क्योंकि इसी दिन 1975 में इन्दिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी का ऐलान किया था। हालांकि वीपी सिंह का जन्म इससे बहुत पहले 1931 में हुआ था लेकिन संयोग और दुर्योग के हवाले से कुछ कह देना ज्योतिष में समय खपाने वाले भारतीय समाज का प्रिय शगल रहा है। वीपी सिंह का निधन 27 नवम्बर 2008 को हो गया था जिसको गुजरे भी लम्बा समय हो गया है। भारतीय समाज में किसी व्यक्ति के निधन के बाद उससे अगर गिले शिकवे भी हों तो भुला दिये जाते हैं। इसके अलावा सार्वजनिक जीवन की किसी बड़ी हस्ती को जयंती या उसकी पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि देना भारतीय समाज में सहज शिष्टाचार माना जाता है लेकिन विश्वनाथ प्रताप सिंह अपने दौर के उन राजनीतिज्ञों में हैं जिनसे सबसे ज्यादा नफरत की गयी। इसका कारण जाहिर है। इसका कारण है भारत का सवर्ण वर्चस्ववादी ढांचा जिसे नष्ट करने का गम्भीर प्रयास उन्होंने किया और इसकी कोई माफी नहीं है।


एक समय था जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री नहीं रह चुके थे उन्होंने किसानों के एक आंदोलन में गिरफ्तारी दी। उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह थे जिन्होंने वीपी सिंह को जेल के उस कमरे धकेल दिया जिसमें सही तरीके से बिजली की फिटिंग न होने के कारण उन्हें करन्ट लग गया था। ऐसे कमरे में उन्हें रखना पूर्व प्रधानमंत्री के प्रोटोकाॅल के खिलाफ था लेकिन उस समय कल्याण सिंह के मन में वीपी सिंह के लिये हिकारत भरी थी इसलिये उन्हें सबक सिखाने के लिये उनके मान मर्दन के तौर पर कल्याण सिंह के द्वारा उनके साथ सामान्य बंदी जैसा सुलूक स्वाभाविक रहा। लेकिन वही कल्याण सिंह समय बदलने के साथ अपने अंतिम समय में वीपी सिंह के भक्त होने लगे थे। राजस्थान के राज्यपाल के रूप में वे वीपी सिंह की जयंती पर लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लेने आये तो उन्होंने पिछड़ों के उत्थान के लिये वीपी सिंह के योगदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने में कोई कंजूसी नहीं की। भाजपा के इस वर्ग के कई प्रमुख नेता होंगे जिनकी भावनाएं वीपी सिंह के लिये कल्याण सिंह की तरह ही हो गयीं होंगी। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उनको लेकर उपेक्षा के संकेत को देखते हुये वे इस मामले में कोई उत्साह नहीं दिखा सकते।


नरेन्द्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने ही थे तो उनका भाषण वंचितों की सामाजिक भावनाओं को कुरेदने पर केन्द्रित रहता था। वे किसी कार्यक्रम को संबोधित कर रहे हो या चुनावी सभा को स्वयं के पिछड़ी जाति का होने का जिक्र जोर शोर से करते थे और बाबा साहब अम्बेडकर का आभार जताने में यह कहते हुये कसर नहीं रखते थे कि उनके वैचारिक संघर्ष के कारण ही मुझ जैसा व्यक्ति प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पहुंच पाया है। तब लगता था कि किसी दिन वे वीपी सिंह के प्रति भी श्रद्धा का इजहार कर जायेंगे लेकिन आज वे समझ चुके हैं कि उन्हें इतिहास में शिखर पुरूष के रूप में स्थान बनाना है तो सवर्ण वर्चस्ववादी धर्मतंत्र के वफादार सिपाही के रूप में भूमिका निभाने की अपनी नियति का उन्हें निष्ठापूर्वक निर्वाह करना होगा। इसलिये अब उन्होंने बाबा साहब अम्बेडकर के नाम का जाप बहुत कम कर दिया है और वीपी सिंह के नाम का तो वे भूल में भी जिक्र नहीं कर सकते। उन्हें नेहरू के नाम से बड़ी नफरत है लेकिन नेहरू की जयंती और निर्वाण दिवस पर तो श्रद्धांजलि देने का शिष्टाचार वे निभा लेते हैं लेकिन उन्हें पता है कि औपचारिकता के लिये भी अगर उनसे वीपी सिंह के प्रति श्रद्धा दिखाने की चूक हुयी तो अभी तक का उनके पूरे राजनैतिक पुरूषार्थ का बेड़ा गर्क हो जायेगा।


वीपी सिंह की पूरी पहचान आज पूरे समाज को आग में झोंकने वाले खलनायक के रूप में समेट दी गयी है। जिससे उन्हें मरने के बाद भी मोक्ष नहीं मिल पा रहा है। पर शुरू से ही वीपी सिंह की भावनाऐं सामाजिक न्याय के लिये समर्पित दिखतीं हैं इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि मण्डल आयोग की रिपोर्ट लागू करने का फैसला उन्होंने सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने के लिये अचानक लिया जैसा कि बाद में उनके बारे में यह धारणा मजबूती से गढ़ी गयी। 1957 में जब वे भूदान आंदोलन से जुड़े तो उन्होंने अपनी पूरी जमीन दान कर दी थी ताकि उसका वितरण भूमिहीन दलितों को हो सके इसलिये उन्हें अपने परिवार से अलग थलग कर दिया गया था यहां तक कि परिजनों ने उन्हें पागल तक करार दे डाला था और यह घोषित कराने के लिये उन पर मुकदमा दायर कर दिया था। डकैतों के आतंक पर नियंत्रण न कर पाने की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुये जब उन्होंने देश के सबसे बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने का फैसला लिया तो यह उनकी राजनैतिक उत्कर्ष यात्रा का आरंभिक काल था और इस फैसले से यह अग्रसरता किसी ऊंची मंजिल पर पहुंचने के पहले ही भ्रूण हत्या का शिकार हो सकती थी फिर भी उन्होंने नहीं सोचा। राजीव गांधी ने जब उन्हें अपना वित्तमंत्री बनाया तो कारपोरेट भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की ओर से पहली सार्थक जंग छेड़ी गयी जिससे तहलका मच गया। इस परिघटना को गहराई से समझने वाले जानते है कि उनके इस साहस से यह स्थापित हुआ कि लोगों के साथ न्याय करने वाली साफ सुथरी व्यवस्था तब तक कायम नहीं हो सकती जब तक कि कारपोरेट की घपलेबाजी पर पूर्ण अंकुश की इच्छाशक्ति सरकार न दिखाये। लेकिन राजीव गांधी इससे विचलित हो गये और उन्होंने विश्वनाथ प्रताप सिंह को रक्षा विभाग में स्थानांतरित कर दिया जहां रक्षा सौदों में पहली बार उन्होंने दलाली के चलन पर चोट की जो साफसुथरी व्यवस्था के लिये उनकी कशिश में निरंतरता बनी रहने के अनुरूप रही लेकिन बाद मेें जब प्रभावशाली वर्ग उनसे चिढ़ गया तो यह साबित करने की कोशिश की गयी कि अपनी अति महत्वाकांक्षा के चलते इसकी पूर्ति के लिये षड़यंत्र के तहत उन्होंने बोफोर्स दलाली मामले में बात का बतंगड़ बनाया।
जहां तक राजीव गांधी का सवाल है वे सिर्फ बोफोर्स दलाली का मुद्दा उछलने के कारण सत्ता से नहीं हटे। उनसे भी कहीं वर्ण व्यवस्था की चूलें हिलाने की गुस्ताखी हुयी थी। एक तो उन्होंने नवोदय विद्यालय जैसी योजना लागू की जिससे देहात की नयी दलित नस्ल के लिये आर्बिट बदलने का रास्ता खुला। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद नवोदय से निकले आईएएस के खिलाफ हुआ विषवमन अपने आप इसकी कहानी कह गया। दूसरे उन्होंने 73 वां व 74 वां संविधान संशोधन लागू करके पंचायतों और नगर निकायो में दलितों, पिछड़ों व महिलाओं को आरक्षण की व्यवस्था करके जमीनी स्तर पर वर्ण व्यवस्था को आप्रासंगिक बनाने का काम कर डाला था जो प्रभावशाली वर्ग को किसी भी कीमत पर पच नहीं सकता था। अचेतन में इसे लेकर उनके प्रति जो प्रतिक्रिया थी उसे किसी परिणति तक पहुंचाने केे लिये बोफोर्स मुद्दे ने त्वरण की भूमिका अदा की। 1985 में जब राजीव गांधी ने चुनाव जीता था तो लोकसभा में उनको भूतो न भविष्यतो वाला बहुमत हासिल होने से कहा गया था कि उन्हें 20 सालों तक कोई सत्ता से नहीं हिला पायेगा। लेकिन उन्होंने स्वशासन की निचली इकाइयों में वर्ण व्यवस्था को झकझोर कर बर्र के छत्ते में हाथ जो डाला उससे एक टर्म बाद ही उनको सत्ता से बाहर हो जाना पड़ा।


वीपी सिंह के लिये प्रधानमंत्री बनने के बाद शुरू से ही स्थितियां इसलिये सहज नहीं रहीं कि संगठन न होने की वजह से उन्होंने लोकदल परिवार का जो साथ लिया था वह सामंती कुलक स्वभाव के कारण सत्ता के जिस बर्बर प्रयोग के पुस्तैनी संस्कारों में पगा हुआ था उसे वीपी सिंह की लोकतांत्रिक नफासत रास नहीं आ सकती थी। उसे वर्ग संस्कृति बदलने के लिये अभी काफी समय चाहिये था जिसे अब हम मुलायम सिंह के दौर और बाद में अखिलेश के दौर जो उन्हीं के बेटे हैं के बीच अन्तर से समझ सकते हैं। इस वर्ग संस्कृति को तो चन्द्रशेखर ही पच सकते थे।
बहरहाल जनता दल में इन्हीं मुद्दों पर अंदरूनी संघर्ष इतना तेज हुआ कि वीपी सिंह ने अपने अध्याय का पटाक्षेप होने के पहले ऐतिहासिक फर्ज जिसे पूरा करना वे जरूरी समझते थे, को निभाने के लिये उन्होंने कदम उठा डाले। सामाजिक न्याय की जिस प्रतिबद्धता का परिचय उन्होंने भूदान आंदोलन से जुड़ने पर दिया था उसकी अगली कड़ी में मण्डल आयोग की सरकारी नौकरियों में पिछड़ों को आरक्षण की एक सिफारिश उन्होंने लागू कर दी जिससे तहलका मच गया। वीपी सिंह को इसका अंदाजा था। उनकी सोच यह थी कि इसके चलते जो सामाजिक द्वंद मचेगा वह सकारात्मक परिवर्तन का समुद्र मंथन सिद्ध होगा। इसके लिये उन्होंने सवर्ण छात्रों से बातचीत हेतु कैबिनेट कमेटी बनायी थी जो उन्हें समाज में दुराग्रह पूर्ण ढंग से वर्चस्व बनाये रखने के इरादे से दूर कर सके। लेकिन इस कमेटी के कर्ता धर्ता जनेश्वर मिश्र खुद ही दगा कर गये। इस बीच सामाजिक न्याय के वृत्त को पूरा करने के लिये उन्होंने बाबा साहब अम्बेडकर को मरणोपरांत भारत रत्न देने और संसद के सेंट्रल हाॅल में उनका चित्र लगाने जैसे प्रतीकात्मक कदम उठाये। इनका भी तीव्र भावनात्मक असर होने की उम्मीद उन्होंने लगायी थी। इसी बीच सांसदों की कारपोरेट षड़यंत्र के तहत खरीद फरोख्त से उनकी सरकार का तख्ता पलट हो गया। बाद में उन्हें संयुक्त मोर्चा के समय दो बार प्रधानमंत्री पद स्वीकार करने का फिर मौका मिला पर उन्होंने इन्हें ठुकरा दिया। यह उनकी भूल थी वरना वे जिस क्रांति का सपना सजोये थे उसको साकार करने का अवसर प्राप्त कर सकते थे। उन्हें यह मालूम होना चाहिये था कि पद त्याग का महत्व स्थिति सापेक्ष है इसलिये इतिहास इसके कारण उन्हंे सराहे यह जरूरी नहीं होगा। राहुल गांधी ने भी ऐसी ही गलती की। अगर मनमोहन सिंह के अन्तिम समय में वे उनकी जगह प्रधानमंत्री बनने का आमंत्रण स्वीकार कर लेते तो बाद में उनकोे आज की तरह की चुनौतियों का सामना न करना पड़ रहा होता। आज राहुल गांधी के भी किसी त्याग को स्वीकार नहीं किया जा रहा है।
भारतीय इतिहास में सामाजिक बदलाव के हर पड़ाव को मंजिल के पहुंचने के पहले ही हश्र का शिकार हो जाना पड़ा है। यह दुष्चक्र अभी भी नहीं टूटा। वीपी सिंह का दौर भी एक संक्रमण काल साबित हुआ जिसके छटते ही यथा स्थितिवाद ने फिर जहां की तहां अपनी जड़े जमा लीं।

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