प्रदेश के ऊर्जा और नगर विकास मंत्री अरविंद शर्मा ने बिजली विभाग को लेकर शक्ति भवन में समीक्षा बैठक की जिसमें उन्होंने विभाग की कार्यप्रणाली पर तीव्र असंतोष जताया। योगी ने जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का पद संभाला था तभी से विद्युत व्यवस्था और इससे जुड़े विभाग की कार्य पद्धति में सुधार लाना उनकी सरकार के लिये बड़ी चुनौती बनी हुयी है। मुख्यमंत्री ने अपने पहले कार्यकाल में तेज तर्रार नेता श्रीकांत शर्मा को ऊर्जा विभाग की जिम्मेदारी सौंपी थी जिन्होंने उपभोक्ताओं की नकेल कस कनेक्शन और वसूली बढ़ाने में काफी हद तक सफलता प्राप्त कर ली लेकिन पावर काॅरपोरेशन के बिगड़ैल अधिकारियों को सीधी पटरी पर लाने की दिशा में वे कुछ खास नहीं कर सके जिसकी वजह से विद्युत व्यवस्था यथावत चरमराई रही। मुख्यमंत्री ने अपने दूसरे कार्यकाल में इस महकमें को दुरूस्त करने का जिम्मा अरविंद शर्मा को सौंपा जिनके प्रधानमंत्री मोदी के कार्यालय में तैनात रहने से बड़े चर्चे थे। वे उत्तर प्रदेश के मूल के होते हुये भी गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी रहे हैं और उनकी गिनती मोदी के पसंदीदा अधिकारियों में रही है। जब वे प्रधानमंत्री बने तो अरविंद शर्मा को वे दिल्ली ले आये और पीएमओ की बागडोर उन्हीं के हाथ में सौंप दी। मोदी के बारे में पहले दिन से मीडिया के जरिये चमत्कारिक तेजी के साथ देश का प्रशासन चलाने की धारणा रोपी गयी जिसके चलते यह माना गया था कि अरविंद शर्मा में भी विलक्षण विशेषताऐं होगीं। उन्होंने जब प्रधानमंत्री के इशारे पर समय से पहले स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ले ली और उत्तर प्रदेश में अवतरित हुये तो उन्हें लेकर भी जमीन आसमान के कुलाबे जोड़े गये जिससे उन्हें लेकर लोगों ने बड़ी अपेक्षाएं जोड़ ली थीं। 2022 के चुनाव के पहले उन्हें लखनऊ भेजा गया था यह प्रचारित करके केन्द्र उनके रिमोट कंट्रोल के माध्यम से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गाइड करेगा जिसमें अपने आप ध्वनित था कि योगी प्रदेश की सरकार चलाने में नौसिखिये साबित हो रहे हैं जिसके कारण अभी उनको ट्रेनिंग देनी पड़ेगी। अपने बारे में यह इम्प्रेशन दिये जाने से योगी चिढ़ गये और उन्होंने दिल्ली द्वारा भेजे गये देवदूतनुमा अरविंद शर्मा का पानी उनकी शुरूआत के पहले ही उतार देने की ठान ली। अरविंद शर्मा के आते ही लखनऊ के सारे पार्टी दिग्गज उन्हें जुहारने पहंुच गये थे लेकिन अरविंद शर्मा को झटका लगा जब योगी आदित्यनाथ ने उन्हें तवज्जो देना तो दूर उनके प्रयास करने पर भी उन्हें मुलाकात तक का समय नहीं दिया। इधर उनका विधान परिषद के लिये नामांकन हो रहा था उधर योगी विमुखता जताने के लिये अपने गृह नगर गोरखपुर प्रस्थान कर चुके थे। उन्हें विशिष्ट बंगला भी नहीं दिया गया जबकि इसकी चर्चा से अखबार रंग दिये गये थे। बात उन्हें उप मुख्यमंत्री बनाये जाने की थी लेकिन योगी ने पहली बार में उन्हें मंत्री तक नहीं बनाया। इस बीच पूरी तरह कट साइज करने के बाद जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद की दूसरी बार शपथ ली तब एक साधारण मंत्री की तरह उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया। इस बीच एक नौकरशाह की सत्ता की हर दुलत्ती सह जाने की सुपरिचित आदत के मुताबिक उन्होंने योगी द्वारा अपनी इतनी हेठी के बावजूद कोई प्रतिक्रिया नहीं की और विनम्र बने रहे। इसका पुरस्कार यह मिला कि योगी ने उन्हें ऊर्जा और नगर विकास जैसे अहम विभाग सौंप दिये।
उनसे अपेक्षा यह थी कि अपनी ख्याति के अनुरूप वे इन चुनौतीपूर्ण विभागों को सुधारकर एक मिसाल बनायेंगे लेकिन इस मामले में अभी तक निराशा ही हाथ लगी है। हालांकि यह उनकी ईमानदारी कही जायेगी कि बुधवार को ऊर्जा विभाग की समीक्षा बैठक में उन्होंने खुलेआम कहा कि इस विभाग में हद से ज्यादा भ्रष्टाचार है। वैसे भ्रष्टाचार नगर विकास विभाग में भी चरम सीमा पर है जहां नगर निकायों में होने वाले विकास कार्यो में बजट का 60 से 70 प्रतिशत तक कमीशन के रूप में डकारा जा रहा है और नगर विकास मंत्री निरूपाय बने हुये हैं। जनता के खून पसीने से जमा कराये जाने वाले टैक्स की इस कदर लूट के भयानक नतीजे का अनुमान किया जा सकता है। सरकार मे जब भ्रष्टाचार को रोकने की इच्छा शक्ति नहीं है तो संसाधन जुटाकर लुटाते रहने की पूरी मार लोगों पर ही टैक्स लगातार बढ़ते रहने के रूप में गिरेगी और यही हो रहा है। संतोष इस बात का है कि अरविंद शर्मा ने अपने गुरू प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरह शहजोरी नहीं की जो मंचों से कहते है कि उन्होंने भ्रष्टाचार को पूरी तरह खतम कर दिया है और यह कहकर रोजमर्रा के प्रशासनिक भ्रष्टाचार को रोकने के लिये अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रखा है। वे कहते है कि वह राजीव गांधी का जमाना था जब एक रूपये में से पचासी पैसे का गबन हो जाता था और केवल पन्द्रह पैसे से कार्य होते थे। राजीव गांधी भले थे जो कम से कम स्वीकार तो करते थे कि प्रचंड भ्रष्टाचार हो रहा है जिससे उम्मीद बनती थी कि जब सरकार जानती है तो वह इसे रोकने के लिये उपाय भी कर रही होगी जिससे अंततोगत्वा स्वच्छ प्रशासन कायम होगा। पर मोदी ने तो चैप्टर ही क्लोज कर दिया है। टैक्नोलोजी की वजह से कल्याणकारी योजनाओं का पैसा सीधे लाभार्थी के खाते में पहुंचाना संभव हो गया है जिसे वे नाहक ही अपनी उपलब्धि बता रहे हैं। लेकिन इससे अधिकारियों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा है। उनके सामने विकास के लंबे चैड़े बजट की वजह से भ्रष्टाचार के इतने मुहाने खुल गये है कि उन्हें गरीबों के हिस्से के चन्द रूपये फुटकर में बटाने में दिलचस्पी भी नहीं रह गयी है। लंबे चैड़े बजट के लिये जितने सीधे और अप्रत्यक्ष कर शुल्क व जुर्माने आविष्कृत कर लिये गये हैं उतने दुनिया में कहीं नहीं हैं। लोगों का यह शोषण ईस्ट इंडिया कंपनी को भी मात करने वाला है। बहरहाल प्रदेश में विद्युत व्यवस्था ठीक न हो पाने की मुख्य वजह भ्रष्टाचार ही है। अरविंद शर्मा ने इस बैठक में कहा कि बिजली विभाग का 47 हजार करोड़ रूपये लोगों पर बकाया है जिसके लिये गरीबों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करायी जा रही है लेकिन बड़े बकायेदारों को छूआ तक नहीं जा रहा। उन्होंने यह कहकर बिल्कुल सही नब्ज पर हाथ रखा है। इसी तरह पंखे कूलर वालों के यहां विभाग का विजीलेंस कार्रवाइयां करते घूमता है जबकि एक ही घर में दस दस एसी ट्रिक से चलते रहते हैं और वे हेरा फेरी करके प्रतीकात्मक बिल देते हैं लेकिन विभाग की नजर उन पर नहीं जाती। फैैक्ट्रियों की करोड़ों की चोरी में भी यही आलम है जिसमें विभाग की मिली भगत रहती है। खरीद में अलग खेल होता है। विभाग में घटिया उपकरण खरीदकर करोड़ों अरबों रूपये डकारे गये हैं इसीलिये मौसम जरा भी प्रतिकूल हुआ कि उपकरण फुक जाते है। अरविंद शर्मा ने सही कहा कि प्रदेश सरकार की भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टारलेंस की नीति है फिर भी भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिये कोई कारगर कार्ययोजना सामने क्यों नहीं लायी जा रही इस पर भी विचार होना चाहिए। योगी सरकार में भ्रष्टाचार के आरोप में बड़े बड़े अधिकारियों पर जितनी कार्रवाई हुयी उतनी पहले किसी सरकार में नहीं हुयी थी फिर भी आश्चर्य है कि इस सरकार में भ्रष्ट अधिकारी अपने आप को सबसे ज्यादा सुरक्षित मानते हैं। इसकी वजह यही है कि रूटीन में ऐसे अधिकारियों की कड़ी निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है। उस पर तुर्रा यह है कि मुख्यमंत्री समय समय पर अपने बयानों से यह भावना झलकाते हैं कि अधिकारियों की शिकायत करने वाले उनके कार्यकर्ता तक दलाल होते हैं इसलिए उनपर ध्यान देने की कोई जरूरत नहीं है। जन प्रतिनिधि उनकी निगाह में ब्लैकमेलर हैं जो अधिकारियों से नाजायज फायदा उठाना चाहते हैं। इसलिए वे जन प्रतिनिधियों की भी नहीं सुनते। अधिकारियों के खिलाफ प्रार्थना पत्र देने वाले आम लोगों के बारे में उन्होंने यह धारणा बना रखी है कि वे ऐसे लोगों में है जिन्हें शिकायत करने की आदत पड़ी हुयी है इसलिये उन्हें भी गंभीरता से नहीं लिया जाता। खुद मुख्यमंत्री कार्यालय से शिकायतों के निस्तारण के बारे में फीडबैक लिया गया था तो पता चला था कि 90 प्रतिशत लोग निस्तारण के दावे पर असंतोष प्रकट करते हैं। इसके बाद प्रचारित किया गया था कि इसके लिये जिम्मेदार कई जिलों के जिलाधिकारियों पर गाज गिरेगी पर यह प्रचार चरितार्थ नहीं हुआ। इससे यह संदेश जा रहा है कि मुख्यमंत्री अधिकारियों पर मेहरबान हैं जिससे अधिकारियों को बहुत शह मिल रही है। दरअसल जब समाज में गिरावट आती है तो इसके लिये अलग अलग श्रेणियों को चिन्ह्ति नहीं किया जा सकता। अधिकारी, कार्यकर्ता, नेता, आम लोग सभी में नैतिक गिरावट है इसलिए इस पर विचार किये बिना जिसके पास शक्ति है, जो जबावदेह है उसपर कार्रवाई होनी चाहिए तो सभी सुधर जायेंगे। आखिर सुधार की शुरूआत कहीं से तो करनी पड़ेगी और शुरूआत कहां से हो इसका तार्किक उत्तर स्पष्ट रूप से अधिकारियों को ही इंगित करेगा।







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