चीन को लेकर लोगों में चढ़ रही खुमारी सीडीएस ने एक झटके में उतारी


चीन के तियानजिन शहर में 31 अगस्त से 1 सितम्बर तक आयोजित हुए शंघाई सहयोग संगठन के 25वें शिखर सम्मेलन में भाग लेकर हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब वापस लौटे तो उनके समर्थकों ने धूम मचा दी। प्रदर्शित किया गया कि सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने प्रधानमंत्री मोदी का किसी बिछुड़े सगे के मिल जाने जैसी खुशी के साथ टूटकर स्वागत किया। भारतीय मीडिया चीन के शत्रुता पूर्ण रवैये को लेकर उसे कोसने का जो अभियान चला रही थी उसकी याद कहीं गुम जैसी हो गयी। अचानक भारतीय मीडिया को चीन में तमाम नेकिया नजर आने लगीं।


लेकिन भारत के चीफ ऑफ डिफेन्स स्टॉफ जनरल अनिल चौहान ने गोरखपुर में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने देश की सुरक्षा चुनौतियों को लेकर जो भाषण दिया उससे हमारी सारी खुमारी उतर गयी। सेना के अधिकारी राजनीतिक या किसी अन्य सुविधा के लिए तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर बोलने के आदी नही होते। उन्हें अवसर मिलता है तो वे चीजों को वस्तु परकता के अनुरूप सामने रखते हैं। सीडीएस चौहान ने भारत के लिए 6 प्रमुख सुरक्षा चुनौतियां गिनाई और दो टूक शब्दों में कहा कि इन चुनौतियों में हम पाकिस्तान को पीछे रखते हैं। सेना के आंकलन में सीमा विवाद के कारण सुरक्षा चुनौती के रूप में चीन को सबसे ऊपर रखा गया है। ऑपरेशन सिंदूर को लेकर सीडीएस की सपाट बयानी के कारण भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों के नुकसान के वे तथ्य सामने आ गये थे जिन्हें सरकार छुपाना चाहती थी। सेना पर संदेह का मुददा उठाने वाली सरकार ने बाद में इसे झुठलाने के लिए एनएसए अजीत डोभाल को आगे करते हुए आगा-पीछा सोचने की कोई जरूरत नही समझी थी। उसे ऐसा करने की जरूरत क्या थी। अगर भारत के इक्का-दुक्का लड़ाकू विमानों को शत्रु ने गिरा भी दिया था तो इस तथ्य के सामने आने से ऐसी कौन सी हेठी हो रही थी जिससे इस मामले में उसने विरोधाभास पूर्ण स्थिति बनाने के पहले विचार करने की जरूरत नही समझी।


वैदेशिक नीति के मामले में लोगों में क्षणिक धारणाओं और प्रतिक्रियाओं की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित नही किया जाना चाहिए। अब शीत युद्ध का दौर भी बीत चुका है जब भारत की स्थिति एक निरीह राष्ट्र की थी और उसे दुनियां के बड़े जमूड़ों के बीच में अपनी स्वतंत्र पहचान कायम करने के लिए कुछ प्रतिबद्धताएं दिखानी पड़ी थीं। इस रणनीति से गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नाम से अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत ने एक नया मोर्चा खड़ा कर दिया था। लेकिन आज न तो महाशक्तियों का वह टकराव रह गया है और न गुटनिरपेक्ष आंदोलन जैसे मोर्चे की प्रासंगिकता। आज तो अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में आर्थिक मोर्चें बनाने का युग चल रहा है।


इस आपाधापी में किसी देश को दूसरे देश के साथ वफा की कसमें खाने की कोई जरूरत नही रह गयी है। यूक्रेन युद्ध के शुरूआती दौर में घोषित रूप से तटस्थ भारत का पलड़ा दुनियां ने कहीं न कहीं अमेरिका के रुख की ओर झुका हुआ पाया था। रूस को भारत के इस रवैये पर अप्रसन्न हो जाना चाहिए था। लेकिन उसने अंतर्राष्ट्रीय वास्तविकताओं के अनुरूप अपनी प्रतिक्रिया को रखा। इसमें चीन के साथ पुराने मतभेदों को भुलाकर रूस ने उससे नजदीकियां जोड़ डालीं और भारत के लिए भी खिड़की खुली रखी। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की इस आपाधापी के बीच आज भारत की अमेरिका से दूरी हो चली है जबकि रूस के साथ वह पहले जैसे गर्मजोश संबंधों की बहाली कर रहा है।


दिक्कत यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हर चीज में व्यक्तिगत उपलब्धि दिखाने की बीमारी इतनी बढ़ चुकी है कि वे नाजुक क्षेत्रों में भी इस आचरण से अपने को दूर नही रख पाते। राष्ट्रपति ट्रंप के साथ रिश्ते को व्यक्तिगत पहलू के रूप में उभारकर जो चूंक उन्होंने की थी वह उनके लिए समस्या का कारण बन गयी। राष्ट्रपति ट्रंप ने पूरी दुनियां को जिस तरह हांकना शुरू किया उसके पीछे कहीं न कहीं अमेरिकनों का समर्थन रहा। अगर ऐसा न होता तो एक बार अमेरिकन उन्हें सिंहासन से नीचे उतार चुके थे फिर पिछले चुनाव में उन्हीं को वापस क्यों ले आये। यह उल्लेख इसलिए किया जा रहा है कि अमेरिका के जिस अतिवाद को दुनियां झेल रही है वह व्यक्तिगत ट्रंप का नही एक मगरूर देश के दादागीर रवैये का नतीजा है। चीजें इस रूप में देखी जायेगीं तब बात स्पष्ट होगी। सो, अगर ट्रंप ने टैरिफ को हथियार बनाकर भारत पर चढ़ाई कर दी थी तो इसमें मोदी के मन में व्यक्तिगत ग्लानि की भावना क्यों आनी चाहिए थी। लेकिन कहीं न कहीं ऐसा हुआ कि मोदी को यह डर सताने लगा कि ट्रंप की ब्लैकमेलिंग उनकी अपराजेय छवि को तार-तार करने वाली साबित हो रही है। इस भान से वे हड़बड़ा गये।


इसकी क्षतिपूर्ति के लिए तियानजिन में शी जिनपिंग और ब्लादिमिर पुतिन के साथ ठिठोली करते हुए अपने फोटो उन्होने वायरल कराये यह सोचकर कि भारत में उनके समर्थक मानते रहें कि अपने नेता का अभी भी दुनियां की हस्तियों में जबर्दस्त रुतबा बना हुआ है। जबकि उनको ऐसा बचकाना उत्साह दिखाने की कोई जरूरत नहीं थी। अमेरिका द्वारा संकट में डाले जाने के बाद रणनीतिक कदम के तौर पर चीन से पीगें बढ़ाने की नीति एकदम उचित थी लेकिन यह तो स्पष्ट है कि भारत के लिए स्थाई तौर पर चीन पर भरोसा करने से ज्यादा मूर्खतापूर्ण कदम कोई और नही हो सकता। ऐसा नही है कि मोदी जी इससे अनभिज्ञ हों। तियानजिन में शी जिनपिंग ने अमेरिका को जलाने के लिए मोदी को तबज्जो देने का काम तो किया लेकिन मुंह में राम, बगल में छुरी जैसी हरकत करने से बाज नही आया था। एसओसी शिखर सम्मेलन के बाद चीन के विजयोत्सव का कार्यक्रम था जिसके लिए उसने मोदी को ससम्मान रोकने की कोई जरूरत महसूस नही की। विजयोत्सव में उसने पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल, म्यांमार आदि भारत के सारे पड़ोसियों को अपने साथ खड़ा करके एक तरह से मोदी को नीचा दिखाया। मानो वह प्रदर्शित करना चाहता था कि भारत देख ले कि दक्षिण एशिया की राजनीति में भी वह चीन के मुकाबले कहीं नही है।
चीन के इस व्यवहार के मददेनजर मोदी को चाहिए था कि मीडिया में शी जिनपिंग के साथ हुई मुलाकातों को बहुत बढ़चढ़ कर प्रसारित न करें। चीन ही नही वैदेशिक संबंधों के मामले में जनता को बहुत धीरज के साथ कोई आंकलन करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। वैदेशिक मामलों में क्षणिक उत्साह और क्षणिक रोष दोनों ही तरह की प्रतिक्रियायें वर्जित हैं। जनरल अनिल चौहान ने प्रधानमंत्री की तियानजिन यात्रा की सफलता के कसीदे काढ़ने के क्रम में जनता के मन में चीन की असली नीयत को लेकर जो गफलत पैदा हो रही थी उसे झटका देकर खत्म कर दिया है। खासतौर से अमेरिकी सामान के बहिष्कार के नये जोश के साथ चीनी सामान के बहिष्कार के संकल्प में लोगों के अंदर किसी तरह की ढील नही आनी देनी चाहिए। इस बीच ट्रंप ने अभिसारिक याचना में पगी शब्दावली के साथ प्रधानमंत्री मोदी के लिए अपील जारी करके जताया है कि अमेरिका नही चाहता कि भारत के साथ उसके रिश्तों में कोई स्थायी दरार आये। प्रधानमंत्री मोदी तो इसके लिए पहले से ही टकटकी लगाये हुए थे इसलिए उन्होंने ट्रंप को उतना ही प्रेम पूर्ण ट्वीट करने में देरी नही लगायी। लेकिन देखने वाली बात यह है कि एक ओर ट्रंप शब्दों की इतनी मीठी चाशनी भारत के लिए परोस रहे हैं तो दूसरी ओर उनके वाणिज्य मंत्री ने जो कहा वह भारत को अपमानित करने जैसा है। उन्होंने कहा कि एक-दो महीनों में ही भारत स्वतः अमेरिका से बात करने के लिए टेबिल पर आ जायेगा। ट्रंप के वाणिज्य मंत्री ने ऐसा बयान ट्रंप के इशारे के बिना दिया नही होगा। वैदेशिक संबंधों में हर देश के लिए उसका हित ही सर्वोच्च नैतिकता के रूप में मान्य है। भारत को भी इसी सूत्र का पालन करना चाहिए। यह तो किया ही जा रहा है लेकिन विदेश नीति में आत्म प्रचार के लोभ का संवरण करना भी आवश्यक है। इस विषय की नजाकत को देखते हुए जब तक कोई बात निष्कर्ष पर न पहुंचे तब तक वेबजह का नगाड़ा पीटने से परहेज करने की आदत लोगों में विकसित की जानी चाहिए।

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