यह देश को खतरनाक अराजकता में धकेलने की कोशिश है


मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जज अतुल श्रीधरन के तबादले में सरकारी मर्जी का कोण सामने आने से उजागर हो गया है कि जो चल रहा है उस मर्ज की जड़े कहां हैं। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई की कथित टिप्पणी को लेकर जो हंगामा बरपा हुआ, संविधान निर्माता के रूप में बाबा साहब अंबेडकर की छवि के मूर्ति भंजन के लिए छाती फाड़ चिग्घाड़ और जस्टिस अतुल श्रीधरन के द्वारा दमोह जिले में पिछड़ी जाति के एक युवक को दूसरों के पैर की धोवन जिसे चरणामृत कहकर अलंकृत किया जाता है पीने के लिए मजबूर किया जाना सभी एक सिलसिले की कड़ी है। मकसद है कि संविधान, सारे कानूनों की जकड़ को तोड़कर पूरे समाज को जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त संतों, महंतों के फतवों पर चलने के लिए मानसिकता बनाने को मजबूर करना।
नैतिक बुनियाद पर कितने खरे हैं ये विधान
कोई व्यवस्था नियम कानूनों के बिना नही चलती और नियम कानून तार्किकता, वैज्ञानिकता और नैतिकता पर आधारित होते हैं। छदमवेशी संत पिछले कुछ समय से जिस विधान का हवाला दे रहे हैं क्या वे इस कसौटी पर वैज्ञानिक नियम कहे जा सकते हैं। प्राकृतिक नियमों को ही अध्यात्म की टर्मिनलॉजी में ईश्वरीय विधान कहते हैं। प्राकृतिक नियम किसी में विशिष्ट गुण और प्रतिभा का होना उसकी व्यक्तिगत विशेषता को जताते हैं। प्राकृतिक नियम के अनुसार कोई भी क्षमता या अक्षमता व्यक्ति वाचक होती है न कि समूह वाचक। हमारे संविधान में इसी धारणा के मुताबिक सारी व्यवस्थायें तैयार की गयी हैं लेकिन तथाकथित संतो ंके यहां सीधे परलोक से खाचें आये हैं जिनमें वे व्यक्ति नही समूह फिट करते हैं। आपके समूह का नाम अमुक जाति है तो उनका विधान कहता है कि इसे जन्मना गंदे लोगों के लिए बनाये गये खाचे में डाल दो। दूसरे व्यक्ति के समूह का नाम कोई और जाति है जिसे तथाकथित संत जन्मना श्रेष्ठ और सारे गुण, प्रतिभाओं से सम्पन्न मानता है तो वह उसे पूज्य कहे गये खाचे में डालेगा। यह वर्गीकरण कोई व्यवस्था नही है, शुद्ध मनमानी है। फिर भी इसे थोपने की जबर्दस्ती दिखाना अराजकता को निमंत्रण देना है।
ईश्वर को बेरहम पिता दिखाना बड़ा पाप
जो लोग ऐसा कर रहे हैं अगर वे कहते हैं कि ईश्वरवादी हैं तो कहना होगा कि ऐसे लोग नितांत झूठे हैं। परमपिता के रूप में ईश्वर की कल्पना की गयी है जो अभिभावकीय है। कोई पिता अपनी संतानों में भेदभाव कैसे कर सकता है, वह अपनी कुछ संतानों के लिए उत्पीड़नात्मक और दमनकारी नियम कैसे बना सकता है। लेकिन तथाकथित संत कह रहे हैं कि वर्ण व्यवस्था हमारे धर्म का मौलिक तत्व है। किसी भी धर्म का मौलिक तत्व ईश्वर तक पहुंचने के प्रयास में निहित माना जाता है। सनातन धर्म के आदि गुरू शंकराचार्य जी संसार को माया घोषित करते हैं और आप कहते हैं कि सांसारिक व्यवस्था में ही आपके धर्म का पूरा सार समाहित है। तब तो देखना पड़ेगा कि आप धर्म ध्वजा वाहक हैं या धर्म को नष्ट करने आये कोई पातकी। आप तो लोगों को परमपिता परमात्मा से दूर करके संसार में उलझाने का प्रपंच करते दिखाई दे रहे हैं।
जातिवाद से सिकुड़ रहा हिंदू संसार
जातिवाद की कुरीति समाज की बहुसंख्या को हिंदू संगठन से दूर करने वाली है। आप एक बड़ी आबादी को देवालयों में घुसने नही देगें, जनेऊ, कलावा, तिलक आदि हिंदुओं के गौरव चिन्हों को उन्हें धारण नही करने देगें, आप उन्हें धार्मिक ज्ञान सुनने का अधिकार नही देगें, ऐसी चेष्टा के लिए कानों में गर्म सीसा डालने जैसे प्रावधान शास्त्रों से हटाने नही देगें तो जो लोग उक्त धार्मिक प्रावधानों के लिए अधिकृत हैं मात्र उन्हीं को तो आप हिन्दू पहचान के दायरे में समेट पायेगें। यही बात तो दमोह के मामले में अतुल श्रीधरन ने कह दी थी। दमोह जिले में पुरुषोत्तम कुशवाहा नामक दलित युवक को काला जादू का शिकार बता दिया गया। गांव के ब्राह्मण युवकों ने कहा कि इससे छुटकारें के लिए तुम्हें हम लोगों के पैर धोकर उस पानी को पीना पड़ेगा। पुरुषोत्तम कुशवाहा मना करता रहा लेकिन अमानुषिकता पर उतारू युवक नही माने। पुरुषोत्तम को वह करना पड़ा जो संगठित युवक धर्म रक्षा के नाम पर करा रहे थे। जब इसका वीडियो वायरल हुआ तो कोर्ट ने इसे संज्ञान में लिया। जस्टिस अतुल श्रीधरन की अगुवाई वाली दो सदस्यीय पीठ ने कहा कि लोग खुद को हिंदू की बजाय ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र कहकर स्वतंत्र पहचान स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं और अगर यह होता रहा तो एक दिन कोई हिंदू कहलाने के लिए नही बचेगा। उन्होंने वीडियो में पहचान में आ रहे सभी युवकों के खिलाफ कठोर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर रासुका में उन्हें निरुद्ध करने का आदेश पारित कर दिया।
न्याय के रास्ते पर प्रताड़ना के शूल
जस्टिस अतुल श्रीधरन संविधान की मानवीय मूल्यों पर आधारित व्यवस्थाओं के लिए अपनी प्रतिबद्धता के कारण ही वर्तमान सरकार में दागी जैसे बन गये हैं। पहले वे जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय में नियुक्त थे जहां उन्होंने सरकार द्वारा की गयीं मनमानी गिरफ्तारियों को रदद कर दिया था। इसके बाद उनका तबादला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में हो गया था। यह तबादला उस समय किया गया था जबकि वे जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश होने वाले थे। तबादले के कारण उन्हें यह अवसर गंवाना पड़ा। मध्य प्रदेश में उन्होंने कर्नल सोफिया को आतंकवादियों की बहन कहे जाने के मामले में राज्य के मंत्री विजय शाह के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेकर उन पर एफआईआर दर्ज करा दी थी। वैसे तो हाईकोर्ट के जजों का तबादला भी सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम करता है लेकिन कॉलेजियम की स्वतंत्र छवि पर अब प्रश्न चिन्ह लग गया है। अतुल श्रीधरन के मामले में भी यह देखने में आया। मंत्री विजय शाह के खिलाफ कदम उठाने के बाद उन्हें पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में स्थानांतरित करने का विचार बनाया गया। वे वहां जाते तो उनका स्थान वरिष्ठता में तीसरा होता। इससे वे कॉलेजियम में शामिल रहते लेकिन खुलकर बताया गया है कि सरकार की इच्छा पर सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने उन्हें उत्तर प्रदेश स्थानांतरित कर दिया है क्योंकि यहां जजों की संख्या ज्यादा है और इसलिए वे वरिष्ठता में सांतवे स्थान पर पहुंच जायेगें।
कौन है जो देश की खुशहाली को लगा रहा नजर
जजों की नियुक्तियों और तबादलों में हो रहे खेल का मुददा अलग है जिस पर ज्यादा चर्चा से विषयान्तर हो जायेगा इसलिए हम मूल विषय पर आते हैं। जस्टिस श्रीधरन को जाने-अनजाने में वर्ण व्यवस्था के मर्म पर चोट करने की सजा मिली है। हालांकि उनका कथन कहीं से हिंदू समाज को नुकसान पहुंचाने वाला नही बल्कि उसको चेताने वाला था। संवैधानिक व्यवस्था में एकाग्र होकर चलने के बाद देश ने एकता और संगठित रहने की भावना को पुख्ता करने की दिशा में चाल पकड़ ली थी लेकिन वे लोग जिन्हें देश से कोई हमदर्दी नही है वे इस खुशहाल रास्ते को पचा नही पाये हैं और वर्तमान निजाम को अपने लिये मौका मानकर खुराफात करने में जुट पड़े हैं। उनके लिए देश तब तक अपना देश है जब तक कि उनके प्रभुत्व की मान्यता इसमें रहे। अन्यथा उन्हें देश से कोई प्यार नही है। यह देश बहुसंख्यकों का पहले है चूंकि बहुजन और अल्पजन के बीच की रेखा हम नही खींच रहे यह विभाजन तो वे जो कर रहे हैं उसमें स्वतः शामिल है। अगर इस विभाजन के आप कायल हैं तो ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जो बड़ी आबादी को संतुष्ट करने वाली हो। परंपरागत व्यवस्था में बड़ी आबादी की भागीदारी कहीं नही थी जो निश्चित रूप से एक बड़ी त्रुटि थी। इसमें योग्यता, अयोग्यता का सवाल नही है। यह कैसे हो सकता है कि कोई अपने घर की व्यवस्था में डयोढ़ी पर बैठने के लिए मजबूर कर दिया जाये और दूसरे लोग उसके घरों का फैसला करें। आजादी मिलने के बाद लोकतंत्र लागू होने पर इसे सुधारा गया। पहले दलितों को आरक्षण देकर उन्हें व्यवस्था में भागीदार बनाया गया। इसके बाद मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू हुई तो पिछड़े भी व्यवस्था के अंग बने। यह कदम व्यवस्था और देश को मजबूत करने वाले थे। आज इसी के खिलाफ बगावत के तेवर दिखाये जा रहे हैं तो जो लोग ऐसा कर रहे हैं उन्हें कैसे कहा जा सकता है कि वे देश भक्त हैं। उन्हें इस व्यवस्था की मजबूती में योगदान करना चाहिए था लेकिन वे तो व्यवस्था को अस्त-व्यस्त करने में लग गये हैं।
बदलाव से उपजी कुंठा
उनकी कुंठाये स्पष्ट हैं। राजनीतिक रणनीति की मजबूरी के चलते उनकी अपनी सगी भाजपा को भी देश के सारे शीर्ष पद उन्हें सौंप देने पड़ गये हैं जो उनके विधान में उपेक्षित रहने के पात्र हैं। फिर वह चाहे राष्ट्रपति का पद हो, प्रधानमंत्री का पद हो, ज्यादातर राज्यों के मुख्यमंत्री हों और चाहे उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश हों। स्वामी भक्त मोदी जी की शुरूआत में पार्टी के असल एजेंडे को लागू करने की थी। उन्होंने आरंभ में राज्यपालों की नियुक्तियां की जिनमें दलित प्रतिनिधित्व की अनदेखी की गयी थी लेकिन अखबारों में हल्ला मच गया। उन्हें बैकफुट पर आना पड़ा। मोहन भागवत जी ने बिहार के चुनाव में आरक्षण की समीक्षा का शोशा उछालकर परीक्षण किया तो पार्टी की भद पिट गयी। मोदी अपने और पार्टी के जीवन निर्वाह के लिए वंचितों को भागीदारी की रणनीति पर चलने के लिए मजबूर होते गये। भाजपा की वर्ग सत्ता को मोदी की वफादारी पर पूरा भरोसा था लेकिन जब उसने देखा कि सामाजिक सत्ता समीकरणों में मोदी निरुपाय साबित होते जा रहे हैं तो उसका धैर्य टूट गया। इसी की प्रतिक्रिया उन घटनाओं के रूप में सामने आ रही है जिससे राष्ट्रीय एकता में दरकन की बड़ी विभीषिका खड़ी होती जा रही है।
सनातन की सहिष्णुता
सनातन धर्म का चरित्र कटटर धर्मों से बहुत अलग है। यह धर्म कभी आलोचना से भड़कता नही है। अगर ऐसा होता तो इस धर्म में न जाने कितने दंगे और क्रूसेड हो गये होते। इसका कारण यह भी है कि इस धर्म में आश्चर्यजनक बदलाव होते रहे। वेदों में विष्णु सबसे ऊपर नही हैं बल्कि इंद्र के सहायक हैं। पुराण आये तो शिव पुराण में वे भगवान शिव के सामने नतमस्तक दिखाई देते हैं तो देवी पुराण में देवी के सामने। इन प्रस्तुतियों को लेकर किसी वैष्णव ने कोई उग्र प्रतिकार नही किया, कोई युद्ध नही छेड़ा। आधुनिक समय में पेरियार ने हिंदू देवी देवताओं को खुलकर नकारा। उत्तर प्रदेश में उनसे प्रेरित होकर ललई सिंह यादव ने असली रामायण लिखी जिसमें राम की आलोचना हुई पर किसी ने ललई सिंह यादव पर हमला नही किया। उनकी किताब पर लगाये गये प्रतिबंध को उल्टे हाईकोर्ट ने खत्म कर दिया। बाबा साहब अंबेडकर ने भी रिडिल्स इन हिन्दुज्म में भगवान राम और भगवान कृष्ण पर जमकर आक्षेप किये लेकिन फिर भी उनके योगदान को सराहने में किसी को समस्या नही हो रही। तो फिर गवई साहब ने तो दुर्भावना रहित एक टिप्पणी कर दी थी जिसमें जबर्दस्ती भगवान विष्णु के सुनियोजित निरादर की कुचेष्टा को खोजा गया और इसे ठंडा नही होने दिया जा रहा है। भाजपा में प्रतिष्ठा प्राप्त बुद्धिजीवी भी इस अभियान में शामिल हो रहे हैं और पूरे अभियान का सार यह संदेश देना है कि किसी दलित को विश्वास करके उच्च पद देना बहुत बड़े जोखिम का काम है इसलिए भविष्य के लिए इस मामले में एक निश्चय कर लिया जाना चाहिए।
हिंदू सत्यापन की किसने दी अथॉरिटी
आश्चर्य है कि एक लहर चल पड़ी है जिसमें दिखाई देता है कि कुछ लोगों को हिंदू सत्यापित करने का अधिकार मिल गया है। लंबे समय से देश में कांग्रेस का शासन रहा किस की दम पर। जाहिर है कि इसलिए तब अधिकांश हिंदू कांग्रेस को वोट देते थे। आप कर रहे है कि कांग्रेस हिंदू विरोधी थी तो उसे वोट देने वाले लोग भी हिंदू समाज से बहिष्कृत करने पड़ेगें। अदालतों के तमाम फैसले जिन पर आपको आपत्ति है उन्हें देने वाले हिंदू जज हैं तो आपके द्वारा समूची भारतीय न्यायपालिका को हिंदू विरोधी साबित करने का अर्थ तो यह हुआ कि आप उन जजों को हिंदू समाज से खारिज कर रहे हैं। आप तमाम हिंदू बुद्धिजीवियों को हिंदू समाज से खारिज कर रहे हैं। आप हैं कौन? हम आपको हिंदू समाज से खारिज कर रहे हैं क्योंकि धर्म के नाम पर यह दादागीरी हिंदू समाज ने कभी नही दिखायी। हिंदुओं को तो आप अजनबी जैसे दिखाई दे रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि दुश्मन भेष बदलकर हिंदू समाज को हाईजैक करने की कोशिश कर रहे हों। इस प्रवृत्ति से मजबूती के साथ वैचारिक लड़ाई लड़ने की जरूरत है वरना इनकी दुष्टता से हिंदू समाज और देश में बहुत बड़ा विनाश घटित होते नजर आने लगा है। 

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