राष्ट्र प्रेरणा स्थल का विवाद: सरदार पटेल की अनुपस्थिति और सत्ता की वैचारिक चयनबद्धता

लखनऊ में 25 दिसंबर 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटित ‘राष्ट्र प्रेरणा स्थल’ ने एक नया राजनीतिक और वैचारिक विवाद खड़ा कर दिया है। इस भव्य स्मारक में तीन 65 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं—अटल बिहारी वाजपेयी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय की। ये प्रतिमाएं भाजपा-जनसंघ की वैचारिक त्रयी का प्रतीक हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत के एकीकरण के महान शिल्पी सरदार वल्लभभाई पटेल को यहां क्यों जगह नहीं मिली? जबकि भाजपा और संघ परिवार सरदार पटेल की छवि को बार-बार अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए उपयोग करता रहा है।यह बहिष्कार महज संयोग नहीं, बल्कि एक गहरी वैचारिक और जातीय मानसिकता का परिचायक लगता है। राष्ट्र प्रेरणा स्थल को ‘राष्ट्रीय प्रेरणा’ का केंद्र बताकर प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन चयनित प्रतीकों से यह सवाल उठता है कि क्या यह स्मारक वास्तव में राष्ट्रीय है, या केवल एक विशेष वैचारिक धारा का महिमामंडन?प्रतिमाओं का चयन: योगदान की कसौटी पर खरा उतरता है?राष्ट्र प्रेरणा स्थल में स्थापित तीनों महापुरुषों का सम्मान स्वाभाविक है। अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के रूप में देश को स्थिरता और विकास की दिशा दी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ‘एक देश, एक निशान, एक संविधान’ का नारा दिया, जो कश्मीर के संदर्भ में महत्वपूर्ण था। दीनदयाल उपाध्याय की ‘अंत्योदय’ और ‘एकात्म मानववाद’ की विचारधारा भाजपा की नीतियों की आधारशिला है।लेकिन यदि राष्ट्रीय एकीकरण और प्रेरणा की बात हो, तो सरदार पटेल का योगदान सर्वोपरि है। उन्होंने 562 रियासतों को एक सूत्र में बांधकर आधुनिक भारत की नींव रखी। हैदराबाद और जूनागढ़ जैसे संकटों को दृढ़ता से सुलझाया। फिर भी, इस स्थल पर उनकी अनुपस्थिति आश्चर्यजनक है। क्या इसलिए कि पटेल का प्रारंभिक रुख आरक्षण और सामाजिक न्याय के कुछ पहलुओं पर संघ की वर्तमान विचारधारा से मेल नहीं खाता? या जातिगत समीकरणों का प्रभाव यहां भी काम कर रहा है?इसी तरह, लाल बहादुर शास्त्री की शुचिता और ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा, या स्वामी विवेकानंद का वैश्विक हिंदू दर्शन—ये भी राष्ट्रीय प्रेरणा के स्रोत हो सकते थे। लेकिन चयन एक विशेष जातीय और वैचारिक वर्चस्व तक सीमित दिखता है।पटेल की छवि का राजनीतिक दोहन: स्टैच्यू से बहिष्कार तकभाजपा नेतृत्व सरदार पटेल को ‘लौह पुरुष’ कहकर उनकी विरासत का दावा करता रहा है। नरेंद्र मोदी ने गुजरात में ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ बनवाकर खुद को उनके वारिस के रूप में प्रस्तुत किया। लालकृष्ण आडवाणी ने खुद को ‘लौह पुरुष’ कहलवाने की ललक दिखाई। चंद्रशेखर द्वारा पटेल को भारत रत्न दिए जाने को भी संघ प्रभाव से जोड़ा जाता है—वह मंडल आयोग और अंबेडकर सम्मान की काट के रूप में देखा गया।लेकिन राष्ट्र प्रेरणा स्थल में पटेल का नामो निशान न होना इस दोहन की पोल खोलता है। पटेल ने ही 1948 में गांधी हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगाया था। हालांकि संघ इसे उनकी विवशता मानता है, लेकिन पटेल की संवैधानिक राष्ट्र-दृष्टि संघ की सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से भिन्न थी। पटेल अंबेडकर के प्रति प्रारंभिक विरोध और आरक्षण पर आपत्ति के बावजूद बाद में संवैधानिक मूल्यों के रक्षक बने। शायद यही वजह है कि उन्हें इस ‘प्रेरणा स्थल’ में जगह नहीं मिली—क्योंकि वे पूरी तरह फिट नहीं बैठते।समरसता का दावा और जाति की दीवारभाजपा ‘समरसता’ और ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा देती है, लेकिन इस स्थल की तीनों प्रतिमाएं एक ही जातिगत पृष्ठभूमि से आती हैं। क्या यह संयोग है? या सत्ता की स्मृति पर एकाधिकार की योजना? सरदार पटेल, शास्त्री या विवेकानंद जैसे अन्य प्रेरक चेहरों को बाहर रखकर यह स्थल राष्ट्रीय की बजाय वैचारिक रूप से संकीर्ण लगता है।राष्ट्र प्रेरणा स्थल का निर्माण सरकारी खर्चे पर हुआ, लेकिन इसका लाभ केवल एक विचारधारा को मिल रहा है। यह विडंबना है कि जिन पटेल को भाषणों में ‘अखंड भारत’ का शिल्पी कहा जाता है, उन्हें अपने ही प्रचारित स्मारक में जगह न दी जाए।यह विवाद न केवल प्रतिमाओं का है, बल्कि इतिहास की व्याख्या और प्रतीकों के उपयोग का है। सच्ची राष्ट्रीय प्रेरणा तब मिलेगी, जब स्मारक सभी योगदानों को समावेशी ढंग से सम्मान दें—न कि चयनित विरासत को ही बढ़ावा दें। अन्यथा, यह ‘प्रेरणा’ का पाखंड ही कहलाएगा।

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