उरई।
लोकतंत्र सेनानी, संघर्ष और सिद्धांत की राजनीति के प्रतीक कामरेड राधेलाल गुप्ता का दोपहर बाद पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया। मोक्षधाम तक पहुँची उनकी अंतिम यात्रा सिर्फ एक व्यक्ति की विदाई नहीं थी, बल्कि जिले की राजनीतिक चेतना के एक युग का अवसान थी।
अंतिम दर्शन और विदाई के लिए उमड़ी अश्रुपूरित भीड़ में व्यापारी, उद्योगपति, सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के नेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार, लेखक, रंगकर्मी और जिले भर की अनेक जानी-मानी हस्तियां मौजूद थीं। हर आंख नम थी और हर चेहरा एक ही सवाल पूछ रहा था—अब ऐसा बेखौफ, बेबाक और निस्वार्थ संघर्ष कौन करेगा?
कामरेड राधेलाल गुप्ता का निधन आज सुबह हुआ। उन्होंने राजनीति की कई दशकों लंबी पारी खेली। उनकी शुरुआत कम्युनिस्ट पार्टी से हुई, बाद में वे सोशलिस्ट आंदोलन से जुड़े, लेकिन कामरेड का संबोधन उनके नाम के साथ जीवन भर चस्पा रहा।
आपातकाल के दौरान उन्होंने जेल की यातनाएं झेलीं। जमीपाल सिंह के बाद वे जनता पार्टी से लेकर जनता दल के गठन तक जिले के अध्यक्ष रहे।
वे उन नेताओं में शुमार थे जिन्हें लोग “जेल का शेर” कहा करते थे। मजदूरों, अल्पसंख्यकों, किसानों, कर्मचारियों और शिक्षकों पर हुए अन्याय के खिलाफ उन्होंने सत्ता और प्रशासन—दोनों से टक्कर ली। वे उस आंदोलनकारी टोली के मजबूत स्तंभ थे, जिसमें कैलाश पाठक, लाल सिंह चौहान और गिरेंद्र सिंह जैसे नाम साथ-साथ गूंजते थे।
हालांकि 1988 के नगर पालिका चुनाव में हुए अली-बली के खेल ने उन्हें गहरा मानसिक आघात दिया। जिनके लिए उन्होंने सर्वस्व दांव पर लगाकर संघर्ष किए थे, उनका समर्थन न जुटा पाना उन्हें भीतर तक तोड़ गया। इसके बाद वे सक्रिय राजनीति से कुछ उचाट हो गए, लेकिन संघर्ष से कभी दूर नहीं हुए।
जिस भी आंदोलन में उन्हें बुलाया गया, वे पहुंचने से नहीं चूके। उरई की स्टेशन रोड की बदहाल सड़क के खिलाफ चले आंदोलन में उन्होंने अपने पुराने तेवर दिखाए। उसी दबाव का असर था कि नियमित बजट न होने के बावजूद प्रशासन को जुगाड़ कर सड़क निर्माण कराना पड़ा।
सादगी उनकी पहचान थी। वे अपने घर से दुकान तक का करीब तीन किलोमीटर का रास्ता पैदल ही तय करते रहे।
स्वास्थ्य कारणों और मानसिक अवसाद के चलते वे कुछ समय से सक्रिय नहीं थे, लेकिन उनकी छत्रछाया परिवर्तनकामी लोगों के लिए संबल बनी रही।
उनके दो पुत्रों में से एक युद्धवीर कंथरिया, शिक्षक संघ के प्रांतीय स्तर के नेता हैं। कामरेड के आवास पर संवेदना व्यक्त करने वालों का तांता लगा हुआ है—हर आने वाला व्यक्ति किसी न किसी संघर्ष, किसी आंदोलन और किसी इंसाफ की याद साझा करता दिखा।
कामरेड राधेलाल गुप्ता अब पंचभूत में विलीन हो गए हैं,
लेकिन जिले की राजनीति में उनकी दहाड़,
और संघर्ष की उनकी गूंज—
बहुत दूर तक सुनाई देती रहेगी।





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