उरई।
एक समय था जब डिस्कवरी चैनल ने जोल्हूपुर–कदौरा मार्ग को एशिया की सबसे खराब सड़कों में शुमार कर दिया था। शर्म से लाल तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बिना देर किए स्थायी समाधान के तौर पर सीसी रोड बनवा दी थी। नतीजा यह हुआ कि जनता की धिक्कार सरकार के लिए जयकार में बदल गई।
उम्मीद जगी थी कि इसके बाद कोई भी सरकार किसी प्रमुख मार्ग को इस हद तक बदहाल नहीं होने देगी। लेकिन आज हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि अगर किसी दिन डिस्कवरी का कैमरा फिर कदौरा क्षेत्र में घूम गया, तो यह इलाका दोबारा दुनिया की बदनाम सड़कों की सूची में शामिल होने से बच नहीं पाएगा।
अखिलेश सरकार से लेकर मौजूदा सरकार तक नदियों में बहुत पानी बह चुका है। आज उत्तर प्रदेश देश में सबसे अधिक एक्सप्रेसवे वाला राज्य है। इंफ्रास्ट्रक्चर क्रांति की चकाचौंध दूर से आंखें चौंधियाती है, लेकिन उसी रोशनी के पीछे कई कोने ऐसे हैं, जो गहरे अंधेरे में छूट गए हैं।
कदौरा क्षेत्र का मौरंग मार्ग ऐसा ही एक कोना है। यहां से सरकार का खजाना तो भरता है, लेकिन दिन-रात दौड़ते ओवरलोड मौरंग ट्रक स्थानीय जनजीवन के लिए नेमत नहीं, बल्कि नरक बन चुके हैं। भारी वाहनों की बेलगाम आवाजाही सड़कों को चीरती जा रही है और लोगों की दिनचर्या को उजाड़ रही है।
लगातार दो वर्षों से जनप्रतिनिधियों से लेकर अधिकारियों की चौखट पर दस्तक दे रहे जितेंद्र राजपूत ‘सोनू’ बताते हैं कि
बरही बंबा से ब्राह्मण मबई, चंदरसी, शहीद नगर, सरसई डेरा, समसी और बसरेही तक करीब 23 किलोमीटर का मार्ग पूरी तरह ऊबड़-खाबड़ हो चुका है।
इस बदहाली की मार 25 से 30 गांवों की आबादी झेल रही है।
जनदबाव के चलते विधायक विनोद चतुर्वेदी ने मुख्यमंत्री को सीसी सड़क निर्माण के लिए पत्र लिखा और व्यक्तिगत स्तर पर पैरवी भी की। वहीं जिलाधिकारी राजेश कुमार पांडेय भी सहानुभूतिपूर्ण प्रयास करते हुए समाधान की दिशा में पहल कर रहे हैं।
अब सवाल यही है—
क्या सरकार उस कराहती सड़क की आवाज सुनेगी,
या फिर कदौरा को एक बार और बदहाली की पहचान बनने दिया जाएगा?





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