जब अफ़सर बने देवदूत, बच गई दो ज़िंदगियाँ

उरई। महाशिवरात्रि की पावन बेला में शिवभक्ति से सराबोर सड़कों पर प्रशासन शांति और सुरक्षा की डोर थामे आगे बढ़ रहा था। जिलाधिकारी राजेश कुमार पाण्डेय और पुलिस अधीक्षक डॉ. दुर्गेश कुमार का काफ़िला श्रद्धा, अनुशासन और जिम्मेदारी का प्रतीक बन चुका था।

लेकिन तभी, कुकुरगांव के पास एक दर्दनाक दृश्य सामने आया। अचानक एक बाइक फिसली और सड़क पर गिरे नरेंद्र और उनकी पत्नी सीमा दर्द से कराह उठे। उत्सव की गूंज के बीच यह करुण पुकार मानो इंसानियत को झकझोर रही थी।

पल भर की देरी भी जानलेवा हो सकती थी।

जिलाधिकारी ने बिना किसी औपचारिकता के अपना काफ़िला रुकवाया। वे स्वयं घायलों तक पहुँचे, उनकी हालत देखी और तुरंत निर्देश दिया—

“स्कॉर्ट वाहन को एंबुलेंस में बदलिए, अभी!”

कुछ ही क्षणों में सरकारी काफ़िला सेवा और संवेदना का काफ़िला बन गया। सायरन नहीं, बल्कि मानवता की आवाज़ उस रास्ते पर गूंज उठी। घायल दंपति को तत्काल जिला अस्पताल पहुँचाया गया।

अस्पताल पहुँचते ही प्रशासन ने चिकित्सा टीम को अलर्ट किया। हर संभव उपचार, सतत निगरानी और बेहतर सुविधा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए। यह केवल इलाज नहीं था, यह भरोसे की मरहमपट्टी थी।

जनमानस की आवाज़

घटना के साक्षी स्थानीय लोगों की आँखों में सम्मान झलक रहा था।

एक बुज़ुर्ग ने कहा—

“आज अफ़सर नहीं, भगवान का दूत देखा है। ऐसे ही लोग सिस्टम पर विश्वास ज़िंदा रखते हैं।”

किसी ने कहा—

“यह प्रशासन नहीं, परिवार की तरह मदद थी।”

संवेदना से सजी सेवा

इस त्वरित कार्रवाई ने एक संभावित त्रासदी को टाल दिया। यह घटना साबित करती है कि जब पद और संवेदना एक साथ चलते हैं, तब प्रशासन केवल शासन नहीं करता—वह जीवन बचाता है।

महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर यह दृश्य शिव की करुणा और मानवता की शक्ति का जीवंत प्रतीक बन गया।

जहाँ मंदिरों में घंटे बज रहे थे, वहीं सड़क पर इंसानियत की घंटी भी बज उठी थी।

यह घटना हमें याद दिलाती है कि सच्चा पर्व वही है, जहाँ श्रद्धा के साथ संवेदना भी हो, और व्यवस्था के साथ आत्मीयता भी।

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