न्यायपालिका, पाठ्यपुस्तक और संवैधानिक संतुलन: एक संवेदनशील मोड़

हाल ही में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की कक्षा आठवीं की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ विषयक अध्याय को शामिल किए जाने से जो विवाद उत्पन्न हुआ, उसने एक बार फिर सरकार और न्यायपालिका के बीच संबंधों की नाज़ुकता को उजागर कर दिया। यह विवाद इतना गहरा हो गया कि सरकार को तत्काल पीछे हटते हुए न केवल उस अध्याय को हटाना पड़ा, बल्कि डिजिटल और मुद्रित सभी संस्करणों से उसे वापस लेने की कार्रवाई भी करनी पड़ी।

इस पूरे घटनाक्रम में सरकार द्वारा दिखाया गया संयम राजनीतिक दृष्टि से बुद्धिमत्तापूर्ण कहा जा सकता है। अन्यथा मामला इतना आगे बढ़ चुका था कि सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत तक ने इसे किसी गहरी साज़िश से जोड़कर देखने की बात कही। उनके तेवर यह संकेत दे रहे थे कि यदि सरकार पीछे न हटती, तो टकराव और तीव्र हो सकता था।

सरकार ने आनन-फानन में कदम उठाकर स्थिति को संभाल लिया। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के प्रति न्यायपालिका की नाराज़गी की ख़बरें भी सामने आईं, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि संस्थागत असंतोष किस स्तर तक पहुँच चुका था।

संवैधानिक संस्थाओं में बढ़ता तनाव

यह पहला अवसर नहीं है जब सरकार और न्यायपालिका के बीच तनाव सामने आया हो। बीते वर्षों में सत्ता पक्ष के कई वरिष्ठ नेताओं ने बार-बार ऐसे बयान दिए, जिनसे टकराव की स्थिति बनी। पूर्व विधि मंत्री किरण रिजिजू और पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा संसद की सर्वोच्चता को लेकर दिए गए वक्तव्यों ने विवाद को और गहरा किया।

इन बयानों में यह संकेत दिया गया कि संसद संविधान के किसी भी हिस्से में बदलाव कर सकती है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित ‘मूल संरचना सिद्धांत’ इसके विपरीत है। इस सिद्धांत के अनुसार, संसद संविधान के मूल ढांचे से छेड़छाड़ नहीं कर सकती। जब यह टकराव चरम पर पहुँचा, तब जाकर सरकार को नरमी दिखानी पड़ी।

असहिष्णुता और ट्रोल संस्कृति

इस संस्थागत तनाव का सबसे चिंताजनक परिणाम सामाजिक स्तर पर दिखाई दिया। असहमति को लोकतंत्र की बुनियादी विशेषता माना जाता है, किंतु हाल के वर्षों में इसके प्रति असहिष्णुता बढ़ी है। सरकार की आलोचना करने वाले केवल विपक्षी नेता ही नहीं, बल्कि न्यायाधीश भी ट्रोलिंग का शिकार होने लगे।

कई बार न्यायपालिका के किसी अप्रिय फैसले को ‘देशद्रोह’ से जोड़कर देखा गया। यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है, क्योंकि इससे संस्थाओं की साख और स्वतंत्रता दोनों प्रभावित होती हैं।

परंपरा और सत्ता का नया समीकरण

वर्तमान सरकार ने प्रत्यक्ष संवैधानिक संशोधन के बिना ही व्यवस्था को अपने अनुकूल ढालने की रणनीति विकसित की है। रक्षा मंत्री द्वारा सैन्य उपकरणों की लॉन्चिंग को धार्मिक अनुष्ठानों से जोड़ना, बाबाओं को औपचारिक सम्मान देना, प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा धार्मिक संस्थाओं के प्रति असामान्य श्रद्धा दिखाना—ये सभी घटनाएँ इसी प्रवृत्ति का हिस्सा हैं।

यहाँ तक कि न्यायिक मंचों पर भी धार्मिक ग्रंथों के संदर्भ आने लगे हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक न्यायाधीश द्वारा अल्पसंख्यकों को लेकर दिए गए सार्वजनिक बयान ने न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए। ऐसी घटनाएँ संवैधानिक मूल्यों और परंपरागत धार्मिक सोच के बीच टकराव को उजागर करती हैं।

पाठ्यपुस्तक विवाद: असावधानी या रणनीति?

एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर अध्याय जोड़ना संभवतः शैक्षणिक दृष्टि से एक साहसिक कदम था, किंतु इसकी राजनीतिक और संवैधानिक संवेदनशीलता को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। इससे सरकार अनावश्यक संकट में फँस गई।

यह प्रश्न उठता है कि क्या इस तरह के मुद्दों को बच्चों की पाठ्यपुस्तकों में शामिल करना उचित है, या इसके लिए अधिक संतुलित और संदर्भपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। बिना समुचित विमर्श के ऐसे विषयों को जोड़ना न केवल भ्रम पैदा करता है, बल्कि संस्थागत विश्वास को भी चोट पहुँचाता है।

न्यायपालिका की जवाबदेही का प्रश्न

हालाँकि अध्याय हट जाने से विवाद शांत हो गया, पर इससे सच्चाई नहीं मिटती। न्यायपालिका पर उठने वाले सवाल पूरी तरह निराधार भी नहीं हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति में कॉलेजियम प्रणाली की पारदर्शिता, या हालिया वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामलों ने भरोसे को कमजोर किया है।

इन मुद्दों पर आत्ममंथन न्यायपालिका के लिए आवश्यक है। किसी भी लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है, जब वे स्वयं को आलोचना के लिए खुला रखें और सुधार के लिए तत्पर हों।

लोकतंत्र का आधार: विश्वास

न्यायपालिका लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ है। यदि यह स्तंभ कमजोर होता है, तो पूरा ढांचा अस्थिर हो सकता है। कानून के शासन की अवधारणा न्यायालयों पर जनता के विश्वास पर ही टिकी होती है।

इस विश्वास के बिना देश अराजकता की ओर बढ़ सकता है, जहाँ न्याय की जगह शक्ति और प्रभाव हावी हो जाते हैं। इसलिए न तो सरकार को न्यायपालिका को कमजोर करने की कोशिश करनी चाहिए, और न ही न्यायपालिका को स्वयं को आलोचना से परे समझना चाहिए।

एनसीईआरटी पुस्तक विवाद केवल एक अध्याय का मामला नहीं था, बल्कि यह सरकार, न्यायपालिका और समाज के बीच बदलते रिश्तों का प्रतीक था। सरकार का पीछे हटना तत्कालीन संकट का समाधान था, पर दीर्घकालिक समाधान तभी संभव है जब संवैधानिक संस्थाएँ परस्पर सम्मान और संतुलन बनाए रखें।

लोकतंत्र संवाद, असहमति और जवाबदेही से मजबूत होता है, न कि टकराव और दमन से। न्यायपालिका में जनता की आस्था बनाए रखना केवल न्यायाधीशों की ही नहीं, बल्कि सरकार और समाज—तीनों की साझा जिम्मेदारी है। यही आस्था देश की संवैधानिक सुरक्षा की सबसे बड़ी गारंटी है।

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