उरई। पवित्र माह रमज़ान के दौरान जहां कभी सादगी, आत्मसंयम और सामाजिक सौहार्द की मिसाल देखने को मिलती थी, वहीं समय के साथ यह परंपराएं धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही हैं। लोगों के जीवन-शैली में आए बदलाव ने रमज़ान की पारंपरिक पहचान को प्रभावित किया है।
पहले रमज़ान से पूर्व घरों में सिवइयों की तैयारी, छतों पर महिलाओं की हलचल और मोहल्लों में सामूहिक गतिविधियां आम थीं। कुम्हारनपुरा जैसे इलाकों में मिट्टी के बर्तनों की रौनक रहती थी और मस्जिदों में सादगी के साथ अफ्तारी सजती थी। अब यह दृश्य लगभग समाप्त हो चुके हैं। कुल्हड़, मिट्टी के कूंडे और रकाबियां इतिहास बनती जा रही हैं।
आज अफ्तारी की मेजों पर गुलगुले, दहीबड़े और पारंपरिक व्यंजनों की जगह फास्ट फूड ने ले ली है। सहरी में भी दूध जैसे पौष्टिक आहार की भूमिका कम होती जा रही है।
धार्मिक वातावरण में भी बदलाव देखा जा रहा है। पहले जहां मस्जिदों में शांति, तिलावत और आत्मिक सुकून का माहौल रहता था, वहीं अब शोर-शराबा और अव्यवस्था बढ़ी है। बच्चों और युवाओं को धार्मिक अनुशासन व मर्यादा की जानकारी देने वाली व्यवस्थाएं कमजोर हो गई हैं।
ख़त्म शरीफ और नात की महफिलें भी अब दिखावे का माध्यम बनती जा रही हैं। आध्यात्मिकता के स्थान पर प्रदर्शन और शोर-शराबे का प्रभाव बढ़ रहा है।
सामाजिक सेवा की भावना में भी कमी देखी जा रही है। पहले जरूरतमंदों को खोजकर गुपचुप सहायता देने की परंपरा थी, जो अब लगभग समाप्त हो गई है। वहीं, फर्जी संगठनों और पेशेवर गिरोहों द्वारा ज़कात और दान का दुरुपयोग भी चिंता का विषय बन गया है।
मस्जिद समितियां भी अब घर-घर जाकर जरूरतमंदों तक मदद पहुंचाने के बजाय सार्वजनिक चंदा घोषणाओं पर अधिक निर्भर हो गई हैं। इससे वास्तविक जरूरतमंद पीछे छूट जाते हैं।
सुबह फज्र की नमाज के बाद सड़कों पर शोरगुल और खेल-कूद से रोजेदारों और तिलावत करने वालों को परेशानी होती है, लेकिन इस पर नियंत्रण की व्यवस्था कमजोर है।
लेखक मुही आज़म के अनुसार, मिजाजों में आई यह तब्दीली समाज के धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को प्रभावित कर रही है। यदि समय रहते इन परंपराओं को सहेजने का प्रयास नहीं किया गया, तो रमज़ान की मूल आत्मा धीरे-धीरे केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी।







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