क्या इन्हे पूरा कर पाएंगे उनकी जयंती मनाकर बहुजन वोटो में सेंध लगाने वाले ?
कांशीराम साहब ने एक बार कहा था कि हमारी लड़ाई सबसे नहीं है बल्कि उनसे है जो जाति व्यवस्था में विश्वास रखते हैं।
-अरविन्द कुमार पहारिया
अ स प जालौन
हिंदू समाज में जाति व्यवस्था भेदभाव पर आधारित है उच्च जाति के 15% लोग 85% बहुजनों पर न केवल राज करते हैं बल्कि उनका शोषण भी करते हैं उन पर अत्याचार करते हैं वह कहा करते थे कि जब तक बहुजन समाज नहीं बनेगा तब तक उसका कल्याण नहीं होगा कांशीराम साहब ने सवर्णों द्वारा निचले तबको (आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक रूप से पिछड़े ) पर अत्याचार के खिलाफ बहुजनवाद का सिद्धांत दिया बहुजनवाद की परिधि में उन्होंने अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को शामिल किया वह मानते थे की सभी मिलकर भारत की 85 फ़ीसदी आबादी का निर्माण करते हैं कांशीराम साहब ने अपने हितों को दरकिनार कर अपना सर्वस्व वँचितो के समाज के नाम कर दिया ठीक वैसा ही जैसा कि राजसी सुख ऐश्वर्य का गौतम बुद्ध ने त्याग किया था।
कांशीराम साहब ने न केवल बहुजनो को शासक बनने का सपना दिखाया बल्कि उन्हें यह भी सिखाया की राजनीति में समझौताबादी रवैया अपना कर अवसर को सिद्धांत में बदलकर सत्ता तक कैसे पहुंचा जा सकता है.।
आज पूरे देश में बहुजन समाज के वोटो में ससेंध लगाने वाले तमाम दल बड़े पैमाने पर देश में मान्यवर कांशीराम साहब की जयंती मनाने का ढोंग रच रहे हैं समझना यह होगा की काशीराम की विचारधारा को यह लोग अमल में भी लाते हैं या फिर दलित वोटो को हथियाने के लिए यह केवल एक छलावा साबित होगा जो दल कांशीराम साहब के रहते हुए उनके ध्रुव विरोधी रहे उन्हें सत्ता से दूर करने के लिए साम दाम दंड भेद की नीति अपना कर बहुजनों को तोड़ने का काम करते रहे क्या वह काशीराम के उन दो अधूरे सपने को पूरा करने का एजेंडा अपनी पार्टी के मेनिफेस्टो में शामिल करेंगे।
मान्यवर कांशीराम साहब के जो दो अधूरे सपने रह गए उनमे उनका पहला सपना था कि-
1- इस देश पर शासन करना (यानि बहुजनो को हुकमरान बनाना।
और दूसरा सपना था
2- जिस प्रकार बाबा साहब ने निश्चय किया था कि मैं हिंदू धर्म में पैदा हुआ यह मेरे बस की बात नहीं थी लेकिन हिंदू होकर मारूंगा नहीं और 14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने लाखों लोगों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया ठीक उसी प्रकार कांशीराम साहब ने 2002 में प्राण किया था की 14 अक्टूबर 2006 को डॉक्टर अंबेडकर के बौद्ध धर्म गृहण करने के 50 वी वर्षगांठ पर वे अपने 5 करोड़ अनुयायियों के साथ धर्मांतरण कर बौद्ध धर्म अपना लेंगे मगर उनका यह सपना भी अधूरा रह गया। इस महान क्रांति दिवस को साकार रूप देने के 5 दिन पहले ही 9 अक्टूबर 2006 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया आज उनके यह दोनों सपने सपने ही है।
बहुजन समाज को आज यह चिंतन और मनन करना होगा कि हमारे मसीहा के सिद्धांतों पर कौन खरा उतरेगा और कौन धोखे बाज हैं जो समाज को केवल छलने का काम कर रहा। क्योंकि आज छलावे की राजनीति चरम पर हैं नोटों के बदले वोट की सौदेबाजी जगजाहिर हैं।
एक बात और भी बड़ी चिंता जनक हैं कि हम बात करते हैं भीमा कोरेगाँव की, हम बात करते हैं बाबा साहव के चावदार तालाब के आंदोलन की, हम बात करते हैं कालाराम मंन्दिर के आंदोलन की क्या यह आंदोलन सिर्फ हवाहवाई बातों से जीते गये याद करो उस भीमा कोरे गांव की लड़ाई में शामिल उन योद्धाओं की तस्बीरो को, याद करो बाबा साहव के आदमकद को याद करो काशीराम जैसे नायक को क्या ऐसे हीं दुबले पतले पुतले थे वो जैसे आज हम अपनी संतानो को पीजा, वर्गर, चाऊमीन जैसे विषैले भोजन देकर उन्हें आंदोलन के लिए तैयार कर रहे कभी इस ऒर हमने ध्यान दिया हैं क्या हम आज शारीरिक और मानसिक रूप से उनसे लड़ने के लिए तैयार कर रहे।
यह हक हकूक की लड़ाई सिर्फ ब्यानबाजी और दिखावे से नहीं जीती जा सकती हमें महापुरुषों के सपनो को साकार करने उनके आंदोलनों को कामयाब करने के लिए पूरी तैयारी बनानी होंगी नहीं तो हम सिर्फ नारेबाजी तक ही सिमित रहेंगे और शोषक सत्ता पर काबिज रहकर शोषण करता ही रहेगा।






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