उरई।
यमुना नदी को अविरल और निर्मल बनाने के संकल्प के साथ बुंदेलखंड की जल सहेलियों द्वारा संचालित लगभग 500 किलोमीटर लंबी “अविरल-निर्मल यमुना यात्रा” सफलतापूर्वक संपन्न हो गई। यह यात्रा 29 जनवरी को जालौन जनपद स्थित पंचनदा धाम से शुरू हुई थी, जहाँ यमुना, चंबल, सिंध, पहुज और क्वारी नदियों का संगम होता है। कई जिलों और सैकड़ों गांवों से गुजरते हुए यात्रा का समापन दिल्ली के वासुदेव घाट पर हुआ।
यात्रा के दौरान जल सहेलियाँ गांव-गांव और शहर-शहर पहुंचीं और लोगों से संवाद कर नदी की वर्तमान स्थिति से अवगत कराया। साथ ही जल संरक्षण को जन आंदोलन बनाने का संदेश दिया। यह यात्रा केवल पदयात्रा नहीं बल्कि नदी और समाज के बीच संबंधों को मजबूत करने का प्रयास भी रही।
इस पदयात्रा में लगभग 620 जल सहेलियों ने सक्रिय भागीदारी की। उन्होंने 32 से अधिक विद्यालयों में जाकर करीब 34,115 विद्यार्थियों को जल संरक्षण, नदी संरक्षण और पर्यावरण के महत्व के प्रति जागरूक किया। इसके अतिरिक्त ग्रामीणों, किसानों, युवाओं और अन्य नागरिकों सहित 61 हजार से अधिक लोगों से सीधा संवाद किया गया।
यात्रा के दौरान कई स्थानों पर ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने जल सहेलियों का स्वागत किया और यमुना कलश पर पुष्प वर्षा कर उनका अभिनंदन किया। कई जगह लोगों ने उन्हें “जल पुत्री” कहकर सम्मानित किया, जबकि कुछ स्थानों पर उनके साहस और नेतृत्व की तुलना वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई से की गई।
कड़ाके की ठंड से शुरू हुई इस यात्रा में जल सहेलियों ने बदलते मौसम, धूप और अन्य कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने संकल्प को कमजोर नहीं होने दिया और अंततः दिल्ली पहुंचकर यात्रा का समापन किया।
यात्रा के दौरान यह भी सामने आया कि कई स्थानों पर यमुना नदी का प्रवाह अत्यंत कम हो गया है और घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट तथा प्लास्टिक कचरे के कारण नदी गंभीर रूप से प्रदूषित हो रही है। जल सहेलियों ने लोगों को चेताया कि यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।
यात्रा के दौरान जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए गांवों में जल समितियों के गठन का प्रयास किया गया और कई स्थानों पर “यमुना चौपाल” का आयोजन कर लोगों को नदियों के संरक्षण के प्रति जागरूक किया गया। इस दौरान 15 से अधिक यमुना संवाद कार्यक्रम भी आयोजित किए गए।
जल सहेलियों ने यमुना नदी के संरक्षण के लिए कई सुझाव भी दिए, जिनमें तटवर्ती क्षेत्रों में तालाब, चेक डैम और रिचार्ज संरचनाओं का निर्माण, नदी में पर्याप्त पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करना, प्रमुख नालों पर सीवेज शोधन संयंत्र स्थापित करना और नदी के दोनों किनारों पर हरित पट्टी विकसित करना शामिल है।
इसके साथ ही औद्योगिक अपशिष्ट पर कड़ी निगरानी, तटवर्ती क्षेत्रों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली विकसित करने, विद्यालयों व महाविद्यालयों में यमुना संरक्षण समितियां बनाने और आगरा में “यमुना रिसर्च सेंटर” स्थापित करने जैसे सुझाव भी दिए गए। राज्य स्तर पर “यमुना संरक्षण मिशन” की स्थापना पर भी विचार करने की बात कही गई।
लगभग 500 किलोमीटर लंबी इस यात्रा में कुल 46,23,356 रुपये का खर्च आया, जिसे जल सहेलियों और समाज के सहयोग से स्वयं एकत्र किया गया।
प्रेस वार्ता में बताया गया कि यह यात्रा केवल शुरुआत है। आगे भी नदी संरक्षण, जल स्रोतों के पुनर्जीवन और समुदाय आधारित जल प्रबंधन के लिए अभियान जारी रहेंगे।
इस यात्रा में प्रमुख रूप से गायत्री, माया, सुधा, सीता, रेखा तथा पुष्पा कुशवाहा (राष्ट्रीय अध्यक्ष, जल सहेली समिति) सहित बुंदेलखंड क्षेत्र की अनेक जल सहेलियों ने सक्रिय भूमिका निभाई।






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