जीरो टॉलरेंस का मिथक: अभिषेक प्रकाश प्रकरण और उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार का सच

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से एक वाक्यांश लगातार दोहराया जाता रहा है—भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेंस”। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार इसे अपनी प्रशासनिक नीति का केंद्रीय सिद्धांत बताती रही है। शासन की ओर से यह दावा किया जाता है कि राज्य में अपराध और भ्रष्टाचार दोनों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जा रही है और कानून-व्यवस्था में आया सुधार इसी नीति की सफलता का प्रमाण है।

लेकिन हाल में आईएएस अधिकारी अभिषेक प्रकाश के मामले में जिस तरह घटनाक्रम आगे बढ़ा और अंततः उनका निलंबन समाप्त कर उन्हें बहाल कर दिया गया, उसने इस नीति की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। आलोचकों का कहना है कि यह प्रकरण उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की वास्तविकता को उजागर करता है।

सोलर एनर्जी परियोजना और रिश्वत का आरोप

मामले की शुरुआत तब हुई जब अभिषेक प्रकाश Invest UP के मुख्य कार्यकारी अधिकारी थे। Invest UP राज्य में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने वाली महत्वपूर्ण संस्था है। आरोप सामने आया कि एक सोलर एनर्जी परियोजना को मंजूरी देने के लिए कथित रूप से एक दलाल के माध्यम से भारी रिश्वत की मांग की गई।

यह खुलासा होते ही प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया। सरकार ने तत्काल कार्रवाई करते हुए कथित दलाल के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उसे जेल भेज दिया। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से उसी मामले में अभिषेक प्रकाश को केवल निलंबित किया गया और एफआईआर में उनका नाम शामिल नहीं किया गया।

यहीं से यह धारणा बननी शुरू हुई कि इस मामले में सरकार का रवैया अपेक्षाकृत नरम है।

जांच और उसका अनिश्चित अंत

मामले की गंभीरता को देखते हुए एक विशेष जांच दल (SIT) गठित किया गया। उम्मीद थी कि यह दल पूरे प्रकरण की गहराई से जांच करेगा। लेकिन आलोचकों का कहना है कि जांच की गति शुरू से ही धीमी रही।

महीनों बीत गए, लेकिन कोई ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आया। धीरे-धीरे मामला सार्वजनिक विमर्श से भी ओझल हो गया और अंततः अभिषेक प्रकाश को बहाल कर दिया गया।

हालाँकि औपचारिक रूप से यह कहा गया कि जांच अभी जारी है, लेकिन प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में इसे औपचारिक बयान भर माना जा रहा है।

लखनऊ के जिलाधिकारी के रूप में लंबा कार्यकाल

अभिषेक प्रकाश का प्रशासनिक करियर उत्तर प्रदेश में प्रभावशाली रहा है। वे लंबे समय तक लखनऊ के जिलाधिकारी रहे। राजधानी में किसी अधिकारी का इतने लंबे समय तक बने रहना असाधारण माना जाता है।

उनके कार्यकाल के दौरान कई प्रशासनिक निर्णयों को लेकर आलोचनाएँ भी सामने आईं, लेकिन वे लंबे समय तक पद पर बने रहे। राजनीतिक गलियारों में यह धारणा भी प्रचलित रही कि वे मुख्यमंत्री के भरोसेमंद अधिकारियों में शामिल हैं।

नौ वर्षों में कितनी कार्रवाई?

यदि पिछले लगभग नौ वर्षों की स्थिति पर नजर डालें तो कहा जाता है कि इस अवधि में बमुश्किल एक-डेढ़ दर्जन आईएएस और लगभग इतने ही आईपीएस अधिकारियों पर कार्रवाई की गई।

लेकिन इनमें से अधिकांश मामलों में या तो अधिकारी बाद में बहाल हो गए या जांच लंबी अवधि तक लंबित रही। अंतिम सजा तक पहुँचने वाले मामलों की संख्या बहुत कम दिखाई देती है।

वैभव कृष्ण का पत्र और पुलिस पोस्टिंग विवाद

भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा एक चर्चित मामला तब सामने आया जब वैभव कृष्ण गौतम बुद्ध नगर के एसएसपी थे।

उन्होंने एक पत्र लिखकर आरोप लगाया कि कई स्थानों पर मलाइदार थानों और चौकियों की पोस्टिंग के बदले भारी रकम वसूली जाती है। यह पत्र सार्वजनिक होने के बाद पुलिस व्यवस्था में हलचल मच गई।

इसके बाद कई अधिकारियों पर कार्रवाई हुई। उस समय एन. कोलाची (बुलंदशहर) और अजय पाल शर्मा (प्रयागराज) जैसे अधिकारियों को निलंबित किया गया। लेकिन बाद में इन मामलों की गति भी धीमी पड़ गई।

संदिग्ध सूची और पुरस्कार जैसी पोस्टिंग

वैभव कृष्ण के पत्र के आधार पर आईपीएस अधिकारी सुधा सिंह का नाम भी संदिग्ध सूची में जोड़े जाने की चर्चा हुई थी। लेकिन बाद में उन्हें झांसी का एसएसपी बनाया गया। आलोचकों ने इसे “प्राइज पोस्टिंग” तक कहा।

पुराने घोटालों की फाइलें

उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार से जुड़े कई पुराने मामले भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। पिछली सरकार के दौरान हुए खनन घोटाले में आईएएस अधिकारी बी चंद्रकला सहित कई अधिकारियों के नाम सामने आए थे।

लेकिन समय के साथ इन मामलों की जांच भी लंबी और जटिल प्रक्रिया में उलझती चली गई।

कार्रवाई की जटिलताओं का तर्क

अक्सर कहा जाता है कि आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करना आसान नहीं होता। सेवा नियम, अभियोजन स्वीकृति और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं का हवाला देकर यह बताया जाता है कि वरिष्ठ अधिकारियों को जेल भेजना या सेवा से हटाना अत्यंत जटिल प्रक्रिया है।

लेकिन यह तर्क तब कमजोर पड़ जाता है जब इतिहास के उदाहरण सामने रखे जाते हैं। पिछली सरकारों में, जिन्हें अक्सर कम कठोर माना जाता है, उन्हीं नियमों के अंतर्गत **नीरा यादव, राजीव कुमार और प्रदीप शुक्ला जैसे अधिकारियों को भ्रष्टाचार के मामलों में जेल जाना पड़ा था।

जब उस समय यह संभव था तो आज क्यों नहीं?

कार्रवाई के नाम पर सीमित उदाहरण

आलोचक कहते हैं कि हाल के वर्षों में यदि कठोर कार्रवाई के उदाहरण खोजे जाएँ तो उनमें प्रमुख रूप से अमिताभ ठाकुर और जसवंत सिंह के नाम सामने आते हैं।

लेकिन इन मामलों को लेकर भी यह आरोप लगाया जाता रहा है कि इनके पीछे प्रशासनिक शुचिता से अधिक राजनीतिक कारण प्रभावी रहे।

संपत्ति और जांच एजेंसियाँ

प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा भी अक्सर होती है कि कई वरिष्ठ अधिकारी वर्षों की सेवा के दौरान बड़ी संपत्ति अर्जित कर लेते हैं। लेकिन आय से अधिक संपत्ति के मामलों में कार्रवाई कम दिखाई देती है।

प्रदेश में भ्रष्टाचार निवारण संगठन और आर्थिक अपराध अनुसंधान संगठन मौजूद हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इनकी कार्रवाई प्रायः निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रहती है।

65 करोड़ की चोरी का चर्चित मामला

कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर एक घटना ने भी काफी चर्चा बटोरी। खबर आई कि एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी के उत्तराखंड स्थित आवास से उनके घरेलू नौकर द्वारा कथित रूप से 65 करोड़ रुपये नकद चोरी कर लिए गए।

बाद में खबर आई कि पुलिस ने यह रकम बरामद कर ली। लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही उठता रहा कि इतनी बड़ी नकद राशि आखिर आई कहाँ से।

इतिहास का सबक

भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार का मुद्दा हमेशा निर्णायक रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार को बोफोर्स विवाद के कारण भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा।

इसी तरह मनमोहन सिंह की सरकार भी दूसरे कार्यकाल में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर गई।

1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की शुरुआत भी भ्रष्टाचार के मुद्दे से ही हुई थी, जिसने इतना व्यापक रूप ले लिया कि अंततः इंदिरा गांधी को आपातकाल लागू करना पड़ा।

दावे  और वास्तविकता के बीच

अभिषेक प्रकाश प्रकरण ने एक बार फिर यह प्रश्न सामने रख दिया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ घोषित नीतियों और वास्तविक कार्रवाई के बीच कितना अंतर है।

यदि सरकार वास्तव में “जीरो टॉलरेंस” की नीति पर चलना चाहती है तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि कार्रवाई केवल निचले स्तर तक सीमित न रहे, बल्कि शीर्ष स्तर के अधिकारियों तक भी समान रूप से लागू हो।

इतिहास बताता है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे को नजरअंदाज करना किसी भी सरकार के लिए जोखिम भरा हो सकता है। इसलिए बेहतर यही होगा कि शासन व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही को केवल नारे के रूप में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी उतारा जाए।

तभी “जीरो टॉलरेंस” का दावा जनता के बीच विश्वसनीय बन सकेगा।

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