अखिलेश कुमार सिंह
cropped-27c0e33e-70ae-40cd-b9cb-6e01381eb0ce11.pngउरई। अंधे पीसे कुत्ते खायें, पुलिस की कार्यशैली देखकर यह आभास होता है कि इस कहावत को खाकी के कारनामें देखकर ही गढ़ा गया है। कहावत की कसौटी पर विभाग की अर्हता कमजोर न पड़ जाये इसके मददेनजर पुलिस के अधिकारी कुछ न कुछ नमूना पेश करते ही रहते हैं।
ताजा मामला एट थाना अंतर्गत बिरगुवां गांव में फांसी लगाकर जान देने वाली किशोरी प्रतिज्ञा (16वर्ष) पुत्री अरविंद निरंजन के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजते समय पुलिस द्वारा दाखिल की गई रिपोर्ट का है। जाति विशेष को चारे की निगाह से देखने की अभ्यस्त पुलिस ने रिपोर्ट में मामले को सनसनीखेज बनाने के लिए बचकानी हरकत का परिचय दे डाला। एसओ ने लिख दिया कि मृतका के अंतःवस्त्र फटे और खून से सने हुए हैं। जिससे मामला संदिग्ध होने के कारण पोस्टमार्टम में सावधानी बरते जाने की जरूरत है। इसके साथ-साथ पुलिस ने दो डाक्टरों के पैनल से शव का पोस्टमार्टम कराने की सिफारिश भी जोड़ दी।
जब इस रिपोर्ट को मेडिकल काॅलेज के सीएमएस ने देखा तो उन्होंने अतिरिक्त सतर्कता दिखाते हुए पुलिस की रिपोर्ट के अनुरूप दो डाक्टरों के पैनल को पोस्टमार्टम के लिए भेजा। लेकिन वहां जो स्थिति सामने आई उससे डाॅक्टरों ने माथा पीट लिया। दरअसल किशोरी की मौत के मामले में किसी भी बिंदु पर सनसनी का कोई पुट नही पाया गया। हुआ यह था कि किशोरी को मासिक स्राव हुआ था जिसके कारण उसके अंतःवस्त्र में खून दिखाई दे रहा था। पुलिस इस जुगाड़ में थी कि मामले को आॅनर किलिंग का रूप देने का कोई क्लू मिल जाये तो किशोरी के पिता को तरीके से दुहा जा सके। बताया जाता है कि एट पुलिस की यह पहली हरकत नही है। एट पुलिस आये दिन इसी तरह वसूली के लिए दिमाग लगाती रहती है। लेकिन इसके बावजूद अधिकारी थानाध्यक्ष की काबलियत पर उंगली उठाने में सक्षम नही है। वजह यह है कि एट जैसे थानों के एसओ विभागीय अधिकारी नहीं बनाते, इनकी ताजपोशी नेताओं के अतःपुर में फाइनल होती है। जिससे अधिकारी इन्हें टच करने से परहेज करने मे ही अपनी खैर मानते हैं।

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