उरई। समाजवादी पार्टी में जिला स्तर पर एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन को अंजाम दिया गया है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव ने शनिवार को जारी विज्ञप्ति में इंद्रजीत सिंह यादव के स्थान पर वीरपाल सिंह यादव दादी को सपा का नया जिलाध्यक्ष नियुक्त करने की घोषणा की है। इस तरह इंद्रजीत सिंह यादव का वर्तमान कार्यकाल अपनी कार्यकारिणी के गठन का अवसर मिले बिना ही खत्म कर दिया गया है। इसी के साथ एक और महत्वपूर्ण घटना क्रम में कालपी क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के पूर्व में प्रत्याशी घोषित विष्णु पाल सिंह नन्हू राजा का जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव के दौरान किया गया निष्कासन तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया गया है।
डीवी काॅलेज छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके वीरपाल दादी को एक बार पहले भी पार्टी की बागडोर सौंपी जा चुकी है। लेकिन साफ-सुथरी छवि के बावजूद उन्हें पार्टी के अंदरूनी षणयंत्रों की वजह से कुछ ही दिनों बाद हट जाना पड़ा था। उनके बाद पार्टी चलाने के लिए जिले में अध्यक्ष की नियुक्ति के नाम पर कई प्रयोग हुए जिनके तहत पूर्व कैबिनेट मंत्री श्रीराम पाल, सोहराब खान, सुरेंद्र बजरिया और धीरेंद्र यादव को अवसर दिया गया। आखिर में धरती गोल है के सूत्र को साबित करते हुए पार्टी ने जिला पंचायत के चुनाव में उठे तूफान की अफरा-तफरी के बीच फिर पुराने चावल यानि इंद्रजीत सिंह यादव को पार्टी की बागडोर थमा दी।
ल्ेकिन यह व्यवस्था तदर्थ ही रही। इंद्रजीत सिंह यादव को बदलने की चर्चाएं कई दिनों से गर्म थीं। हालांकि असमंजस वीरपाल दादी के नाम पर भी था। जिनके समर्थकों ने पार्टी हाईकमान के पर्यवेक्षकों के सामने उन्हें अध्यक्ष बनाने के लिए पार्टी के जिला कार्यालय पर आक्रामक तरीके से दबाव बनाया था जिसे अनुशासनहीनता से जोड़ने की कोशिश की गई थी लेकिन आखिर में दादी की जिले में जबर्दस्त स्वीकार्यता और बेदाग छवि के कारण पार्टी को उन पर भरोसा जताना पड़ा।
भले ही वीरपाल दादी दूसरी बार अध्यक्ष बने हों लेकिन उनकी अध्यक्षी के पहले कार्यकाल और नये कार्यकाल के बीच मलंगा नाले में काफी पानी बह चुका है। वीरपाल दादी उसी डकोर गांव के रहने वाले हैं जिसके चंद्रपाल सिंह यादव टीम मुलायम में नर्सरी कार्यकर्ता के रूप में आगे बढ़ते हुए वटवृक्ष की हैसियत तक पहुंचे। पहले कार्यकाल में वीरपाल दादी की शख्सियत चंद्रपाल के कैंडीडेट होने की छवि के भारी भरकम बोझ के नीचे दबकर कुम्हलाती रही थी लेकिन जिला पंचायत के चुनाव में उन्होंने इस बोझ को अपनी शख्सियत से उतार फेंका और चंद्रपाल सिंह यादव के अनुज व तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष शिशुपाल सिंह यादव के खिलाफ डकोर से उम्मीदवारी का पर्चा सदस्यीय के चुनाव में ठोंक दिया। भले ही वीरपाल को इस शक्ति परीक्षण में कामयाबी नही मिल पाई थी लेकिन इसके बाद जिले में पार्टी के अंदर उनके नेतृत्व की स्वतंत्र पहचान स्थापित हुई। आसानी से समझा जा सकता है कि सहकारिता की राजनीति में समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव के अपने पुत्र से जुड़े अरमानों और चंद्रपाल सिंह यादव की बुलंदी के बीच जो द्वंद है उससे चंद्रपाल की पार्टी के अंदर हैसियत में किस कदर प्रभाव पड़ रहा है। इस क्रम में वीरपाल दादी को सपा का जिलाध्यक्ष पद नवाजा जाना शिवपाल की ओर से चंद्रपाल को एक और शह का नमूना माना जा सकता है।
बहरहाल समाजवादी पार्टी में समर्पित कार्यकर्ताओं के बीच वीरपाल दादी की ताजपोशी से खुशी का माहौल छा गया है और पार्टी नई ऊर्जा से लैस नजर आने लगी है। उम्मीद की जा रही है कि आगामी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के अभियान को इस बदलाव से तेज गति मिलेगी। इसी के साथ विष्णुपाल सिंह नन्हू राजा का निष्कासन रदद कर दिया गया है। जिसका अनुमान पहले से ही लगाया जा रहा था क्योंकि नन्हू राजा के स्थान पर अभी तक पार्टी ने कालपी क्षेत्र से कोई कैंडिडेट घोषित नही किया था। नन्हू राजा की बहाली के निहितार्थ को भी समझा जाना चाहिए। नन्हू राजा की पत्नी ने जिला पंचायत चुनाव में चंद्रपाल सिंह की अनुज वधू को हराया है। चंद्रपाल की पूरी टीम और उनकी पत्नी तक पहली बार अपनी देवरानी की सफलता के लिए पूरी शक्ति से चुनाव मैदान में सक्रिय रही थी। फिर भी प्रतिकूल परिणाम आने से चंद्रपाल को किरकिरी झेलनी पड़ी थी। नन्हू राजा को पार्टी में बहाली का मिला इनाम, कहीं न कहीं इस घटना क्रम से ताल्लुक जरूर रखता है।







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