0 एक तपस्वी की भांति समाज के लिये काम करते रहे बाबूजी
0 समूचे विधानसभा क्षेत्र को घर परिवार माना, पचास एकड़ में बसाया चित्तरपुरा
पुरुषोत्तमदास रिछारिया
konch2 konch1कोंच-उरई। राज्य ही पहली विधान सभा में कोंच विधानसभा सीट से नेतृत्व करने वाले चित्तर सिंह का समूचा व्यक्तित्व ही किसी तपस्वी की भांति रहा है। जब तक वे विधायक रहे तब तक उन्होंने फ्रीडम फाइटर की पेंशन ही नहीं ली। इतना ही नहीं, बाबूजी ने अपनी पचास एकड़ जमीन दान कर ग्राम सदूपुरा के पास चित्तरपुरा गांव बसाया था। वे राजनैतिक शुचिता के जीते जागते उदाहरण कहे जा सकते हैं। उनकी राजनैतिक विरासत आज भले ही कोई संभाल पाने की स्थिति में न हो लेकिन उनके पौत्र लालप्रताप सिंह कांग्रेस में अपनी सक्रियता जरूर बनाये हैं और जिला कमेटी में उपाध्यक्ष हैं।
जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने वाले यहां के पहले विधायक चित्तर सिंह जिन्हें लोग प्यार से बाबूजी कहते थे, का जन्म 1 जनवरी 1901 में यहां के जमींदार परिवार में हुआ था। उनके पिता चैधरी दिलीप सिंह ने उनकी पढाई लिखाई में कोई कोर कसर बाकी नहीं उठा रखी और उन्हें वकालत तक की पढाई कराई। बाबूजी को अंग्रेजी हुकूमत द्वारा भारतीयों पर किये जा रहे जोर जुल्म बर्दाश्त नहीं हुये और उन्होंने देश को अंग्रेजी दासत्व से मुक्त कराने के लिये मखमली विस्तर पर ऐश-ओ-आराम करने के बजाये कांटों भरी सेज का चुनाव किया और स्वाधीनता आंदोलन में कूद गये। उनके लिये घर परिवार से बढ कर मां भारती की अस्मिता और देशवासियों की स्वतंत्रता थी। गांधीजी के साथ नमक आंदोलन में वे जेल गये और एक हजार रूपये जुर्माना भी भरा। 1952 में हुये एसेम्बली चुनाव में यहां की जनता ने उन्हें विधायक बनाया। जनता के प्रति उनके त्याग और बलिदान ने उन्हें करिश्माई व्यक्तित्व बना दिया और 1957 के इलैक्शन में वे दूसरी बार यहां से विधायक बने, जबकि 1962 का चुनाव वह 667 वोटों से हर गये। 1941 से 1952 तक म्युनिसपल बोर्ड के चेयरमैन रहे और 1952 में हुये एसेम्बली चुनाव में यहां की जनता ने उन्हें विधायक बनाया। विधायक बनने के बाद उन्होंने चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया था। पालिका चेयरमैन और विधायक रहते हुये उन्होंने कभी भी अपने घर परिवार के लोगों या नाते रिश्तेदारों को अपने पद और रसूख का लाभ नहीं लेने दिया। उनके तीन बेटे थे वीरेन्द्र सिंह, रवीन्द्र सिंह और राजेन्द्र सिंह, तीनों ही अपने अपने निजी व्यवसायों और कृषि कार्यों में लगे रहे।
बाबूजी के जेल में रहते ही हो गया था पिता का निधन
बाबूजी 1930 में नमक आंदोलन में जेल गये और उन पर एक हजार रुपये का जुर्माना भी ठोंका गया था। उनके जीवन का वह बाकिया बहुत ही उद्वेलित करने बाला है जब बाबूजी 1937 में स्थानीय सर्राफा बाजार में सभा करते हुये गिरफ्तार कर लिये गये और उन्हें जेल भेज दिया गया। पांच माह के इस कारावास के दौरान ही उनके पिता का देहावसान हो गया किंतु बाबूजी इस घटना से भी विचलित नहीं हुये और उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखी। 1941 में सत्याग्रह करते हुये वे फिर जेल चले गये और उन्हें सात माह का कठोर कारावास हुआ, उनके साथ गौरीशंकर शुक्ला, प्रभूदयाल द्विवेदी, गयाप्रसाद गुप्ता, रामनारायण अग्रवाल, मनीराम सेठ, बंशीधर अग्रवाल आदि भी जेल जाने बालों की फेहरिश्त में शुमार रहे। बाबूजी ने देश को आजाद कराने की ऐसी अलख जगाई कि पूरा कोंच क्षेत्र ही स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़ा। धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यों में उनकी अभिरुचि का पता इसी से चलता है कि वे पंद्रह बर्षों तक धर्मादा रक्षिणी सभा के प्रबंधक रहे और संस्कृत पाठशाला के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। कोंच में मुंसिफ कोर्ट की स्थापना कराने को लेकर भी उन्होंने गुरुतर प्रयास किये। उनका निधन 18 फरवरी 1981 में हो गया। उनका समूचा जीवन किसी तपस्वी की भांति ही गुजरा और यह कहना बाजिब ही होगा कि देश उनके ऋण से कभी भी उऋण नहीं हो सकेगा।

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