0 बुंदेलखंड भूलता जा रहा है अपनी सांस्कृतिक पहचान
0 डीजे की कानफोड़ू धुनों पर थिरकना अब युवाओं का शगल बना
कोंच-उरई। बैसे तो पर्व और त्यौहार पूरे देश और दुनिया में मनाये जाते हैं लेकिन इन पर्वों को खास बनाती है स्थानीय मान्यतायें, लोक विधायें और लोक संस्कृतियां। पर्व होली हो या कोई अन्य, बुंदेलखंड में इन पर्वों के साथ यहां की लोक परंपरायें जब इनके साथ जुड़ती हैं तो यहां के लोगों के लिये यह न सिर्फ बहुत ही खास बन जाते हैं बल्कि इनकी अपनी एक अलग पहचान भी बनती है। होली पर फागों का गायन अब गुजरे जमाने की बातें लगने लगी हैं, अलबत्ता ग्रामीण अंचलों में भले ही छोटे रूप में चलन हो, अभी भी इस विधा को लोग आगे ले जाने में लगे हैं। मिटती जा रही सांस्कृतिक पहचान के बीच आज का युवा इन सब बातों से अनभिज्ञ डीजे के कानफोड़ू संगीत पर हाथ पांव फेंकने को ही मस्ती समझ बैठा है।
होली का पर्व वस्तुतः सार्वभौमिक ही है और देश दुनिया के विभिन्न अंचलों में इसे मनाने की अपनी अलग परंपरायें और रीति रिवाज होते हैं। बुंदेलखंड में होली का परिष्कृत स्वरूप होरी बड़ा ही आनंददायी और मस्ती भरा तो है ही, व्रज की ही तरह यहां की भी होरी अपने आप में वैशिष्ट्य भरी है जो भारत के इस हृदय स्थल की खास पहचान है। होरी पर जब फगुवारों की टोलियां गांव गली से गुजरती हुई चैपालों या गांव के प्रतिष्ठित व्यक्तियों के यहां पहुंच कर फागों का गायन करते थे तो लगता था कि सारी कायनात ही होरी के रंगों में सराबोर होकर अपना आह्लाद प्रकट कर रही हो। भंग की तरंग में जब फगुवारे आलाप लेते तो ऐसी मस्ती चढती कि खुमार हफ्ते भर तक नहीं उतरता था। ईसुरी की फागें तो जग प्रसिद्घ हैं और बुंदेलखंड की थाती भी, जिसे विसराना वास्तव में अपनी संस्कृति का खुद ही क्षरण करने जैसा है। इन फागों में देवर भौजी की ठिठोली से लेकर राधा और कृष्ण के वांगमय हास परिहास का स्वाभाविक प्रस्फुटन है।
मो पै रंगा न डारो संवरिया,
मैं तो ऊसई अतर में डूबी लला, मो पै रंगा…
केसर डार रस गंगा बनाई, हरे बांस पिचकारी लला
भर पिचकारी मोरी सम्मुख मारी,
भींज गई तन सारी लला, मो पै रंगा…
देवर भौजी की इस तरह की हास्य व्यंग्य की ठिठोलियों से फागें भरी पड़ी हैं। हंसी और विनोद के इस रंगारंग पर्व में एक ओर जहां मन मयूर नचाने के लिये पर्याप्त रस है वहीं रिश्तों को प्रगाढ करने में यह हंसी ठिठोली उत्प्रेरक का काम करती है। ऐसा ही एक होरी गीत-
दिल डारें अटा पै काये ठाड़ी
काय ठाड़ी, कैसें ठाड़ी, दिल डारें अटा पै काये ठाड़ी,
कै तोरी सास ननद दुख दीनी,
कै तोरे सैंया ने दई गारी
ना मोरी सास ननद दुख दीनी,
ना मोरे सैंया ने दई गारी
मायके के यार सपने में दिखे,
सो आई हिलोर फटै छाती। दिल डारें…
ऐसे रस भरे होरी गीत सुनने के लिये लोगों के अब कान तरस गये हैं। इन गीतों की जगह अब डीजे के भौंड़े कानफोड़ू संगीत पर युवा अपनी पतली पतली टांगों को उल्टा सीधा फेंक कर मस्ती का स्वांग कर रहे हैं। घर पड़ोस के बड़े बूढे भी अब नई पीढी को अपनी विरासत देने के प्रति उदासीन सी नजर आते हैं जिसके चलते बुंदेलखंड की यह समृद्घ लोककला अपनी पहचान ढूंढने के लिये मजबूर है। हालांकि राज्य के संस्कृति विभाग ने बुंदेलखंड की इन लोक और ललित कलाओं को संरक्षित करने के प्रयास में इन्हें पुस्तकबद्ध तो किया है लेकिन जब तक यहां के लोग, खासतौर पर नई पीढी इन्हें आगे ले जाने का काम नहीं करेगी, इनके क्षरण के रुक पाने में संदेह ही है।







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