अंदरूनी घमासान का लावा फूट पड़ने की वजह से समाजवादी पार्टी एक बार फिर कुछ बात है कि मिटती नहीं हस्ती हमारी की तर्ज पर सुर्खियों में है जबकि विधानसभा चुनाव के हालिया चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी की हैसियत में होने के बावजूद यह पार्टी इतने रसातल में चली गई थी कि लगता था कि तीन-चार साल तक तो इसके नाम की कोई चर्चा सम्भव नहीं होगी। भारतीय इतिहास विवेचन का एक अलग तरह का ट्रेंड है। इसमें जो हारता है उसके हिस्से में केवल कमियां और खामियां ही आती हैं। हारने वाले को जन्मजात खलनायक मानना भारतीय इतिहास विवेचन की फितरत है। हालांकि इसे स्वस्थ और संतुलित दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता। कई बार जो हारते हैं इतिहास उनको विजेता से अधिक श्रेष्ठ मानने को मजबूर होता है। बहरहाल सपा की दुर्गति को एंटी इंकंबैंसी फैक्टर का नतीजा घोषित करने का औचित्य इसलिए नहीं है कि ऐसा होने पर इसका पूरा लाभ बसपा को मिलना चाहिए था पर बसपा को तो ताजा विधानसभा चुनाव के जनादेश ने लगभग मिटाकर रख दिया है। सही बात यह है कि लोग केंद्र के बाद प्रदेश में भी भाजपा को आजमाना चाहते थे। भाजपा की जो प्रचण्ड जीत हुई उसके पीछे सकारात्मक समर्थन था। अखिलेश सरकार के प्रति नकार, वितृष्णा या नफरत जैसे तत्व इसमें खोजना बौद्धिक दिवालियेपन की पराकाष्ठा है पर गूढ़ ज्ञान वाले इस देश में सरलीकृत निष्कर्ष निकालने की कमजोरी हमेशा से हावी रही है और इसका भारतीय समाज ने बहुत मोल चुकाया है। फिर भी वह इस कमजोरी से उबरने को तैयार नहीं है।
लोग फिलहाल तो भाजपा को सरकार चलाकर कुछ कर दिखाने का मौका देना चाहते हैं इसलिए लोगों के जेहन में अखिलेश कहां हैं, इस बात का भी कोई गुमान नहीं है लेकिन चटखारेदार प्रसंग के आने पर लोगों की उसमें रति स्वाभाविक प्रवृत्ति है। मुलायम सिंह के मैनपुरी पहुंचकर अखिलेश के प्रति कुछ कह देने ने प्याली में जो तूफान पैदा किया है उसका मकसद मात्र इतना ही है। मुलायम सिंह आज उनके साथ अपनों के न निभा पाने का रोना रो रहे हैं लेकिन सवाल यह भी होना चाहिए कि उन्होंने जिनके साथ निभाना चाहिए था उनके साथ क्या किया। मुलायम सिंह ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध, महात्मा गांधी से भी ज्यादा बड़े शख्स और युगपुरुष हैं। मुलायम सिंह के यह अतिरेकपूर्ण महिमामंडन के निहितार्थ क्या हैं, यह आसानी से समझे जा सकते हैं। वरना सही बात तो यह है कि कभी देश के सर्वोत्तम प्रदेश से नवाजा जाने वाला उत्तर प्रदेश उलटा प्रदेश कैसे बन गया, इसमें सबसे बड़ा योगदान मुलायम सिंह जैसे बौनसाई नेता का वटवृक्ष के रूप में स्थापित हो जाना रहा। उन्होंने किसी नीति, नैतिकता का पालन नहीं किया। फिर भी उनका कद इसलिए बढ़ता चला गया कि यह शक्ति पूजा का देश है जो कि लम्बे समय तक गुलाम रहे किसी समाज की स्वाभाविक आदत का नतीजा कहा जा सकता है।
समाजवाद, लोकतांत्रिक सरोकार ये सब बातें बहुत ऊंचे स्तर की हैं। गांवों के प्रधान तक सीमित विजन वाले किसी मोटे दिमाग वाले नेता को इतना दूर तक सोचने की जरूरत नहीं है। अगर मुलायम सिंह इतनी दूर तक सोचने की व्याकुलता में रहते तो अपने बाद अपने बेटे को मुख्यमंत्री नहीं बना सकते थे। उनके परिवार के देश के किसी भी राजनीतिक परिवार से ज्यादा सांसद, विधायक और अन्य लालबत्ती धारक माननीय बने। अखिलेश को अपने जीते जी देश के सबसे बड़े सूबे का मुख्यमंत्री बनवाकर उन्होंने तृप्ति का अहसास किया और वे लोग बहुत भुलावे में हैं जो यह सोचते हैं कि इसे लेकर मुलायम सिंह के मन में कोई पछतावा है। मुलायम सिंह के सरोकार अपनी बिरादरी, अपने परिवार और सबसे ऊपर अपने वंश तक के सीमित हैं। वे अपने छोटे भाई शिवपाल को बहुत चाहते हैं लेकिन 2012 में जब वे मन में अपना वंश आगे बढ़ाने के लिए अखिलेश को अपनी आंखों के सामने मुख्यमंत्री का ताज पहनाने को सोच ठाने हुए थे उस समय शिवपाल मुख्यमंत्री बनने के लिए खूंटा तुड़ाने तक को बेताब हो गए थे। उस समय तो नेताजी का भ्रातृप्रेम नहीं छलका। सारा भ्रातृप्रेम तेल लेने चला गया और नेताजी ने पूरा झांसा देकर आखिर में अखिलेश का राजतिलक करा ही दिया।
अखिलेश ने उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाकर खुद पार्टी की कमान संभाल ली। मुख्यमंत्री तो वे बने ही रहे लेकिन अगर इससे मुलायम सिंह को कोई पीड़ा होती तो वे उनके खिलाफ पहले ही खुलकर सामने मैदान में आ जाते। शिवपाल ने सपा के सिल्वर जुबली सम्मेलन के बाद बहुत जोर डाला कि अब नेताजी अखिलेश को हटाकर खुद मुख्यमंत्री बन जाएं ताकि परिवार और पार्टी में युद्ध विराम हो सके पर मुलायम सिंह ने साबित कर दिया कि वे बहुत चालू चीज हैं। शिवपाल को लॉलीपाप जरूर देते रहे लेकिन अखिलेश की जगह खुद मुख्यमंत्री बनने की बात पर उन्होंने कोई कान नहीं धरे। अखिलेश जब उनकी जगह सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गये तो चुनाव आयोग में अखिलेश का मुकाबला करने का नाटक उन्होंने खूब किया लेकिन इसमें स्वांग के अलावा कुछ नहीं था। यह पता चलने की वजह से ही अमर सिंह मुलायम सिंह से इतने ज्यादा नाराज हैं। उन्हें यह भलीभांति पता है कि अखिलेश के रिपीट न हो पाने के पीछे उनकी विफलता नहीं है बल्कि यह मोदी का भाजपा के पक्ष में बहुत प्रभावी संयोजन का नतीजा है इसलिए शिवपाल की राय के इतर वे पहले ही कह चुके हैं कि प्रदेश में पार्टी की हार के पीछे कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार नहीं है।
दरअसल पेंच उनके घर में फंस गया है। शिवपाल ने साधना गुप्ता की महत्वाकांक्षा को इतनी ज्यादा हवा दे दी है कि वे अंतिम चरण के चुनाव के पहले ही अखिलेश का माहौल खराब करने के लिए मैदान में आ गईं और उन्होंने यह इच्छा व्यक्त कर दी कि वे प्रतीक को संसद में पहुंचाना चाहती हैं। बुढ़ापे की शादी बहुत ही दुश्कर होती है इसलिए मुलायम सिंह इस समय त्रयाहठ के जाल में छटपटा रहे हैं। अपने वास्तविक और इकलौते पुत्र अखिलेश का कोई अहित न चाहते हुए भी उन्हें साधना गुप्ता की महत्वाकांक्षा को संतुलित करने के लिए बहुत ठठकर्म करने पड़ रहे हैं।
राजऋषि और युगपुरुष मुलायम सिंह यादव मैनपुरी में जिस कार्यक्रम में अपना प्रवचन करने पहुंचे वह जनाब तोताराम यादव का था। जो पंचायत चुनाव में मंत्री का दर्जा होते हुए भी बूथ कैप्चरिंग करते हुए ट्रैप हो गए थे और इसके कारण सपा की बहुत फजीहत हुई थी। फिर भी मुलायम सिंह के त्याग के प्रति लोगों में जो दर्द है वह वंदनीय है। पात्र बदल जाते हैं तो ऐसे दर्द का नेचर भी बदल जाता है। जैसे भाजपा को सिफर से शिखर तक पहुंचाने का श्रेय लालकृष्ण आडवाणी को रहा लेकिन जब नरेंद्र मोदी उन्हें दरकिनार कर दिया तो किसी को यह दर्द नहीं हुआ कि जिसने अपना खून-पसीना बहाकर पार्टी को बुलंदी पर पहुंचाया उसके प्रति कृतघ्न व्यवहार कितना खेदजनक है लेकिन पिता-पुत्र के मामले में यह प्रतिमान लोगों के जेहन में कितना ऊंचा हो गया है, धन्य है यह भारतभूमि।
बहरहाल मुलायम सिंह के जीवन का अगला ध्येय अपने दूसरे पुत्र को दूसरी पत्नी की इच्छा के नाते राजनीति में सेट करना है। उन्होंने पहले पुत्र और बहू को मोदी के जरिये योगी के पीछे लगाया। मोदी के कहने से योगी उनकी गौशाला में चले गये लेकिन पता चला कि गौशाला तो नाटक है। जो लखनऊ नगर निगम की अरबों-खरबों की जमीन पर कब्जे के लिए किया जा रहा स्वांग है। अंदरखाने की खबर यह है कि इस बात की जानकारी होने के बाद योगी अंदर ही अंदर बहुत आहत हैं। यह दूसरी बात है कि अपने कई कारणों से मोदी का पहले से मुलायम सिंह के प्रति सॉफ्टकॉर्नर है और रहेगा। योगी वीतराग हो सकते हैं लेकिन मोदी नहीं इसीलिए मोदी ने मुलायम सिंह जैसे महापुरुष के पौत्र की शादी में पहुंचकर अपने को कृतार्थ किया था। इस समय मोदी का अभियान काला धन खपाने के लिए दिग्गजों द्वारा चलाई जा रही सैल कंपनियों की नाक में नकेल डालने पर है लेकिन उन्हें इसमें ख्याल है कि मुलायम सिंह को कोई तकलीफ न हो। ईडी ने 500 सैल कंपनियों पर छापेमारी की है जिनमें जगन और छगन भुजबल के विनिवेश वाली कंपनियां तो हैं लेकिन सैल कंपनियों का मास्टरमाइंड अमर सिंह इस कार्रवाई से अछूता रखा गया है। वजह यह है कि अगर अमर सिंह पर शिकंजा कसेगा तो आंच मुलायम सिंह और अमिताभ बच्चन तक पहुंच जाएगी। मोदी के रहते हुए ऐसा तो नहीं होना चाहिए।
योगी के शपथ ग्रहण समारोह में मुलायम सिंह मोदी के कान में फुसफुसा चुके हैं। उन्होंने क्या कहा इसको लेकर तमाम अटकलें हैं लेकिन साधना गुप्ता के हठ को पूरा करने के लिए मैनपुरी की सीट पर ताना-बाना बुना जा रहा है। जहां से अभी तक मुलायम सिंह सांसद रहे हैं और बाद में उन्होंने अपने भाई के पौत्र तेजू यादव को सांसद बनवा दिया। यह सीट मुलायम सिंह की सबसे सेफ सीट है। इस समय मुलायम सिंह आजमगढ़ से सांसद हैं लेकिन यह सीट निरापद नहीं है। मैनपुरी की सीट पर मुलायम सिंह ने वीटो का प्रयोग किया तो तेजू को यह सीट छोड़नी पड़ेगी। उनके ससुर लालू यादव के लिए भी इस समय रिश्तेदारी का मान सारे राजनीतिक लक्ष्यों से ऊपर है इसलिए उनका दबाव भी तेजू पर रहेगा। इस सीट से अपने जीते जी प्रतीक को चुनवाकर साधना गुप्ता की हसरत पूरी करने का ताना-बाना मुलायम सिंह ने रच लिया है।
मुलायम सिंह के सारे खिन्न तेवर इसी लक्ष्य की हद तक सिमटे हुए हैं। सयाने जानते हैं कि पिता-पुत्र के विग्रह का दिखावा थोथा है। मुलायम सिंह प्रतीक को भी राजनीति में सेट कर दें तो अपनी सारी जिम्मेदारियों से फारिग हो जाएंगे। अब यही होना है। मोदी भी इसमें सहयोग करें, शायद कनबतिया में उन्होंने मोदी से यही अर्ज की है। एक पिता अपने जीवित रहते पुत्रों को अच्छी तरह सेट कर दे, इससे ज्यादा सौभाग्य क्या हो सकता है। मुलायम सिंह इस मामले में सौभाग्यशाली हैं और कोई सौभाग्यशाली तब होता है जब उसने बड़े पुण्य किए हों। आपका क्या ख्याल है मुलायम सिंह ने समाज के साथ क्या महान पुण्य नहीं किए…।







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