उरई। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हो चुके डाॅ. रामशंकर द्विवेदी के बारे में पत्रकारिता की नई पीढ़ी को शायद मालूम भी न हो कि वे एक जमाने में जिले की पत्रकारिता के सशक्त हस्ताक्षर रह चुके हैं। इस दौर में उन्होंने रिपोर्टिंग के लिए जान जोखिम में डालने का भी हौसला दिखाया। उनके अनुभव पत्रकारिता की नई पीढ़ी के लिए जज्बा भरने में मददगार हो सकते हैं। बांग्ला से हिंदी में अनुवाद के लिए डाॅ. रामशंकर द्विवेदी साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। वे इस समय साहित्य जगत की राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी हस्ती के रूप में पहचान बनाये हुए हैं। उनकी लगभग 130 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं जबकि 14 प्रकाशनाधीन हैं। उन्होंने हर विषय पर किताब लिखी है। चाहे चित्रकला हो, संगीत, यात्रा वृतांत, उपन्यास, नाटक, साक्षात्कार और चाहे आत्मकथा, जीवनी व संस्मरण और पत्रलेखन। उनकी पुस्तकों पर समकालीन दिग्गज समालोचकों की निगाह रहती है। आज जब पत्रकारिता हिंदी तक अधकचरी जानने वाले बेरोजगार युवकों का ठिकाना बन गई है, लोगों को यह आश्चर्य हो सकता है कि रामशंकर द्विवेदी के जमाने में स्थिति भिन्न थी जब पत्रकारिता का क्षेत्र इतना गरिमापूर्ण माना जाता था कि अकादमिक कैरियर की ओर अग्रसर लोग भी इससे जुड़ने में गौरव का अनुभव करते थे। डीवी काॅलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष रहे डाॅ. रामशंकर द्विवेदी भी इसी ललक में 1975 में दैनिक आज के जालौन नगर व तहसील संवाददाता बनकर पत्रकारिता से जुड़े। वे हालांकि क्षेत्रीय संवाददाता थे लेकिन जिले के विशेष समाचार भी दैनिक आज उनसे ही प्राप्त करता था। 1988 तक उन्होंने दैनिक आज को अपनी सेवाएं दीं। बाद में 1986 से 1988 तक वे आज के जिला संवाददाता भी रहे। उन्होंने साहित्य पत्रकारिता से शुरूआत की थी। जिसके तहत साहित्य सरोज नाम की पत्रिका उन्होंने प्रकाशित की। राष्ट्रधर्म मासिक पत्रिका के संपादकीय विभाग में भी उन्होंने काम किया। स्थानीय दैनिक लोक सारथी में उन्होंने विजय के छदम नाम से नियमित स्तंभ लिखा जो बाद में दस्तक के नाम से किताब के रूप में प्रकाशित हुआ और इस किताब को जबर्दस्त सराहना मिली। जिस समय डाॅ. रामशंकर द्विवेदी पत्रकारिता कर रहे थे डकैत समस्या चरमसीमा पर थी। उस समय बीहड़ में जाकर उन्होंने अपने समय के मोस्ट वांटेड डकैत घनश्याम का इंटरव्यू किया था। जो एसपी सिंह द्वारा संपादित रविवार में प्रकाशित हुआ था। डाॅ. रामशंकर द्विवेदी बताते हैं कि इस इंटरव्यू के लिए उन्हें बीहड़ में काफी भटकना पड़ा। जिस दौरान पुलिस और डकैतों के आमना-सामना की स्थिति भी आई। पत्रकारिता में निर्भीकता दिखाने की उन्हें गंभीर कीमत भी चुकानी पड़ी। जालौन में सरकारी अस्पताल के डाॅ. द्वारा मरीजों के लिए आने वाले मिटटी के तेल की बिक्री का समाचार प्रकाशित करने की वजह से उनके पुत्र को उस डाॅक्टर के प्रबंधन में चलने वाले काॅलेज में नियुक्ति से रोक दिया गया। उन पर हमले भी हुए। जिनको लेकर पत्रकारों ने जोरदार प्रदर्शन किये। 70 वर्ष से अधिक की उम्र पार कर लेने के बावजूद वे अभी थके नही हैं और साहित्य जगत में अपनी पताका फहराते हुए वे जिले की पत्रकारिता को भी गौरवान्वित कर रहे हैं।

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