पूर्व केंद्रीय मंत्री और कंाग्रेस के चर्चित नेता शशि थरूर के बयान के बाद संजय लीला भंसाली की फिल्म पदमावती पर छिड़े विवाद में एक नया मोड़ पैदा हो गया। भाजपा की दुनियां में ईश्वर भक्ति अंततोगत्वा राज भक्ति के किनारे पर ही जाकर लगती है। लेकिन कांग्रेस के अंदर भी महाराज तबका शशि थरूर के खिलाफ सार्वजनिक रूप से उबाल खाने से पीछे नही रहा।
शशि थरूर हाईफाई सोसाइटी की दुनियां के आदमी हैं। पौराणिक भाषा में कहें तो उनकी दुनियां इस धरती की दुनियां न होकर यक्ष-किन्नरों की दुनियां है। जिनकी उन्मुक्तता आम समाज के लोगों को सहज में पच नही पाती। इसलिए वैसे भी शशि थरूर जब बोलते हैं तो पृथ्वी लोक पर खलबली मचाने का कारण बन ही जाते हैं।
इसलिए शशि थरूर के राजा महाराजों को लेकर बोल से तूफान खड़ा होना लाजिमी था लेकिन अब की बार उनकी तुकतान केा लेकर दुष्यंत कुमार का वह चर्चित शेर याद करना पड़ेगा कि सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही, मेरा मकसद है कि सूरत बदलनी चाहिए। जाने-अनजाने में शशि थरूर का बयान ऐसी बहस का केंद्र बन गया है जिसकी जरूरत आजादी के पहले दिन से महसूस की जा रही है।


पुनरुत्थान की ललक में अतीत के गौरव का अंध महिमा मंडन निहित होता है। लेकिन प्रकृति की तासीर प्रगतिशील होती है। इस समय भारत पुनरुत्थानवादी लहर की चपेट मे है जिससे द्वंदात्मकता का नया अखाड़ा तैयार हो रहा है। क्योंकि प्रकृति को इतिहास को पीछे की ओर ले जाने का न्याय मंजूर नही हो सकता। इसलिए वर्ग संघर्ष के इस आयाम का भविष्य क्या होगा यह आंकलन करना दिलचस्प सगल हो सकता है।
शशि थरूर के बयान पर भाजपा की नेता स्मृति इरानी ने पार्टी के वर्ग चेतना के अनुरूप चिकौटी काटी जिसके बाद कांग्रेस में भी ज्योतिरादित्य जैसे महाराजाओं में जागरण हुआ। ज्योतिरादित्य, उनकी दादी और उनके पिता अपवाद रहे हैं जिन्हें लोकतांत्रिक राजनीति में भी मान्यता मिली। लेकिन उन्हें यह गलतफहमी नही होनी चाहिए कि उन्हें और उनके परिवार को मिली जनस्वीकृति की वजह महाराज होने का उनका ग्लैमर है।

जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी तक का विकास एक समय ग्वालियर राज परिवार के टुकड़ों पर पल कर हुआ। लेकिन अब भारतीय जनता पार्टी में लोग ग्वालियर राज घराने के इतिहास का हवाला देने का दुस्साहस उसे अवमानना की गर्त में धकेलने के लिए करने लगे हैं। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में सिधिंयाओं की भूमिका को लेकर मध्य प्रदेश के भाजपाई मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चैहान तक ने विषवमन कर डाला। उन्होंने इस मामले में राजस्थान की मुख्यमंत्री के रूप में पार्टी की बड़ी नेता के रूप में स्थापित वसुंधरा राजे की भी परवाह नही की। जाहिर है कि भाजपा में भी अब सिंधियाओं को पूजने के दिन लद चुके हैं। लेकिन सिधिंयाओं की लोकप्रियता पर 1857 के हवाले की वजह से कभी आंच नही आई तो उसकी वजह पब्लिक है, यह सब जानती हैं का फार्मूला है।
1857 के समय भारतीय राष्ट्रीयता का आज जैसा वृहद नक्शा तैयार नही हुआ था। महाराजाओं के सरोकार अपने साम्राज्य तक सिमटे हुए थे। सिंधिया विलासिता में डूबे नाकारा राजाओं से अलग थे। उन्होंने राजशाही में भी अपनी शासन व्यवस्था जन कल्याणकारी स्वरूप में संचालित कर रखी थी। ऐसे में उन्होनें अपने साम्राज्य की स्थिरता के लिए जो रास्ता अपनाया वह उनकी रियाया को नागवार नही लगा। आज के संदर्भ से सिंधिंया के उस समय के फैसले का मूल्यांकन नही हो सकता। लोकतांत्रिक राजनीति में आने के बाद भी जनता के प्रति जबावदेह रहने के अपने पूर्वजों के गुण सिंधियाओं ने नही छोड़े। इसलिए सिंधिया ग्वालियर क्षेत्र के लोगों के लिए आस्था और श्रृद्धा का केंद्र बन गये।

 

पर ज्योतिरादित्य सभी राजाओं-महाराजों का ठेका नही ले सकते। शशि थरूर का यह सवाल एकदम सही है कि राजा महाराजा उस समय कहां थे जब ब्रिटिशर्स इनके मान-सम्मान को पैरों से रौंद रहे थे। अंग्रेजों के कृपा पात्र बने रहने के लिए राजा-महाराजाओं ने किस हद तक अपनी गैरत बेंच दी थी इसको जानना है तो नई पीढ़ी को दीवान जर्मनी दास की महाराजा और महारानी किताबें पढ़नी पढ़ेगी। हद तो यह थी कि कई राजा अपने घर की महिलाओं तक को ब्रिटिश एजेंटों के सामने परोसने से नही हिचके। ज्यादातर राजा-महाराजाओं में किसी तरह का पुरुषार्थ नही था। न तो उन्हें शासन से कुछ लेना-देना था और न ही अपनी प्रजा से। यह लोग देश और मानवता के नाम पर कंलक थे। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने अगर सख्ती न दिखाई होती तो यह लोग भारत माता को दुत्कार कर अपना अलग झंडा लेकर निकल लेते तांकि इनकी मनमानी अपनी प्रजा पर आजादी के बाद भी चलती रहती।

 


आदि गुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म की स्थापना जब की तो सवोच्च आराध्य के रूप में महादेव को रखा जो फक्कड, मस्तमौला, अनगढ़, जीवन शैली व रहन-सहन के कारण जनवाद का प्रतिनिधित्व करते थे। उन्होंने चार मठों को धर्म में सर्वोच्च स्थान दिया और चारों मठों में भगवान शंकर को स्थापित किया। आदि गुरू शंकराचार्य और सनातन धर्म के निहितार्थ स्पष्ट हैं। शशि थरूर के बयान पर भाजपा कुछ न बोलती तो उसका कुछ बिगड़ने वाला नही था लेकिन धर्म से लेकर राजनीति तक में राजा-महाराजाओं की पुर्न प्राणप्रतिष्ठा उसका अभीष्ट है जिससे उसके वर्गीय दृष्टिकोण का पता चलता है। राजसी इतिहास के प्रति सम्मोहन की यह कमजोरी कहीं न कहीं देश भक्ति के मामले मे भी संदेह उत्पन्न करने का कारण बन जाती है। भाजपा और राजा-महाराजाओं की आलोचनाओं पर उबलने वालें लोगों को यह बात ध्यान रखनी चाहिए।

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