एक कहावत है छब्बे बनने चले थे चौबे जी दुबे रह गये। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को चाहिए कि वे इस कहावत को आइना दिखाएं तो शायद उन्हें अपनी ही सूरत का अक्स उसमें नजर आयेगा। सन 2012 में राहुल गांधी ने अचानक बोध ज्ञान की प्रतीति की तरह अपने को ब्राहमण जाति में पाया और सार्वजनिक रूप से एलान किया कि वे ब्राहमण हैं। सन 2017 में गुजरात के चुनाव आते-आते तक इस प्रचार के लिए उनकी एक पूरी पल्टन मैदान में उतर पड़ी जो बता रही थी कि राहुल गांधी ऐरे-गैरे नही 24 कैरेट के जनेऊधारी ब्राहमण हैं। यह दूसरी बात है कि राहुल एण्ड कंपनी का यह हथकंडा तुरुप की बजाय जोकर वाला पत्ता साबित हुआ। इस पर असल ट्रंप कार्ड दागा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीच जाति के हवाले से जिसकी बदौलत राहुल गांधी की गुजरात फतेह की सारी तैयारियां तहस-नहस हो गईं।
सोशल इंजीनियरिंग के पैंतरे
भारतीय राजनीति में यहां के सामाजिक चरित्र और गठन के कारण सोशल इंजीनियरिंग के मुहाबरे का सूत्रपात हुआ।
जाति कार्ड की भूमिका इसी इंजीनियरिंग के तहत है। आजादी के कुछ ही समय बाद भारतीय राजनीति में सोशल इंजीनियरिंग का दांव चल पड़ा था। शुरूआत में सत्ता में अंगद के पांव की तरह अपने पैर रोपे कांग्रेस को हटाना सिर पटक-पटक कर दीवार को गिराने के उपक्रम जैसा था। उस समय समाजवादी राजनीति के धुरंधर महारथी डा. राममनोहर लोहिया सोशल इंजीनियरिंग के पैंतरे के साथ आये। उन्होंने नारा दिया पिछड़ों ने बांधी गांठ, सौं में पावें साठ। इसके साथ ही उन्होनें बाबा साहब की जिंदगी के आखिरी दिनों में उनके साथ चुनावी समीकरण बनाने की कोशिश की तांकि सोशल इंजीनियरिंग को और व्यापक कर सकें। आखिर सोशल इंजीनियरिंग ने कांग्रेस के अजेय दुर्ग को भेद दिया और 1967 में कई राज्यों में संविद सरकारों के गठन से लोगों ने पहली बार जाना कि वोटों से भी सरकारें गिराई जा सकती हैं। 1977 में पहली बार केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकार के गठित होने के पीछे भी सोशल इंजीनियरिंग का ही योगदान था।
मुख्य रूप से पिछड़ा वर्ग और सीलिंग से प्रभावित जातियां जनता पार्टी की छतरी तले इकटठी हो गईं थीं जिससे दिल्ली में तख्ता पलट आसान हो गया। कांग्रेस ने भी इसके बाद सोशल इंजीनियरिंग का दामन थामने की कोशिश की। उत्तर प्रदेश में बलराम सिंह यादव और गुलाब सेहरा को मुख्यमंत्री बनाने का विचार तो 1980 के बाद कांग्रेस में कई बार हुआ लेकिन व्यवहार में वह ठाकुर, ब्राहमण मुख्यमंत्री की धुरी के बीच ही चक्कर काटती रही। जिससे इस विचार को मूर्त रूप नही मिल पाया। 1989 में वीपी सिंह के नेतृत्व में बनी जनता दल की सरकार के पीछे भी सोशल इंजीनियरिंग का ही योगदान था। वीपी सिंह ने इसको समझा और जब उनके राजनैतिक अस्तित्व पर बन आई तो उन्होंने बाबा साहब अंबेडकर को मरणोपरान्त भारत रत्न घोषित करने और मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने जैसे कदम उठाये।
जनता दल की सामाजिक न्याय की आंधी को थामने के लिए गोविंदाचार्य ने सोशल इंजीनियरिंग के मंत्र के साथ सत्ता के लिए भाजपा की कारगर फिटनेस की। गोविंदाचार्य को बाद में संघ और भाजपा ने दूध की मक्खी की तरह निकालकर फेंक दिया। लेकिन अमल में भाजपा आज भी सोशल इंजीनियरिंग की राजनीति की ही टेक ले रही है और इसी के बदौलत नरेंद्र मोदी के नाम पर प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा जैसी पार्टी में मुहर लग सकी।
मोदी भी सोशल इंजीनियरिंग के घोड़े पर सवार
राष्ट्रीय क्षितिज पर आने के बाद नरेंद्र मोदी ने सायास यह घोषित किया कि वे पिछड़ी जाति के गरीब परिवार की तलहट से शुरू होकर राजनीति के शिखर तक आये हैं।
बाबा साहब का नाम लेकर उन्होंने अपने शूद्र होने को और ज्यादा ग्लेमराइज किया। जिससे संवेदना के धरातल पर गैर मुस्लिम बहुजन का जुड़ाव उनके साथ मजबूती से होने की प्रक्रिया को गति मिली।
उल्टे बांस बरेली को
नरेंद्र मोदी की अपराजेयता आज एक मिथक बन चुकी है लेकिन सचमुच ऐसा नही है। बशर्ते विपक्ष खुद ही थाली में परोसकर उन्हें सत्ता का आस्वादन न कराता रहे। उल्टे बांस बरेली को यह कहावत भी सभी ने सुनी है। राहुल गांधी गुजरात में समीकरण तो बना रहे थे हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवानी के साथ। लेकिन परवाह जता रहे थे ब्राहमण अस्मिता को सहलाने की। इस मामले में उन्हें उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में सबक मिल चुका था फिर भी वे नही संभले। पहली बार अपने को ब्राहमण घोषित करने और इसके बाद चुनाव के स्वयंभू मैनेजमेंट गुरू प्रशांत किशोर गोस्वामी की सलाह पर यूपी में मुख्यमंत्री पद के लिए ब्राहमण चेहरे को सामने करने के बावजूद वे खीर नही खा पाये थे बल्कि उन्हें यूपी में सबसे शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा था। ब्राहमण कार्ड के सम्मोहन के चक्कर में गुजरात के युवाओं की त्रयी को भी उन्होंने बेअसर कर दिया। इसी कारण यह त्रयी कांग्रेस के पक्ष में बहुजन का धुव्रीकरण नही कर सकी। दूसरी ओर मोदी ने मणिशंकर अय्यर के ब्यान के बहाने बार-बार अपनी तथाकथित नीच जाति की दुहाई देकर पासा ही पलट दिया। जीएसटी, नोटबंदी और किसानों की उपेक्षा जैसे मुददों का जोखिम उनके नीच कार्ड की वजह से चुनाव में गौण बन गया।
मुसलमानों की अनदेखी
सोशल इंजीनियरिंग के खेल के पत्ते कौन से होते हैं राहुल गांधी को यह नही मालूम इसके खिलाड़ी जहां दबी-कुचली जातियों में आक्रामक चेतना भरने में माहिर हैं साथ ही वे यह भी ध्यान रखते हैं कि इस देश में जो मुसलमानों का अच्छा-खासा अनुपात है हिंदू वर्ण व्यवस्था में कोई निहित स्वार्थ न होने से वे भी उनके स्वाभाविक साथी बन सकते हैं। इसलिए इस खेल में सोशल इंजीनियरिंग के खिलाड़ियों ने अभी तक मुसलमानों को अग्रिम भूमिका देने का रिवाज अपनाया जबकि राहुल गांधी की कुलीन खुमारी का आलम यह रहा कि वे भूल गये कि गुजरात में मुसलमान भी रहते हैं। इसका भी खामियाजा उन्हें भोगना पड़ा। अगर आगे दूसरे राज्यों में भी मुसलमानों की अनदेखी करके पींगें बढ़ाने की कोशिश उन्होंने जारी रखी तो मोदी को भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति का चक्रवर्ती सम्राट बनने से कोई रोक नही पायेगा।
मंदिर पालिटिक्स
राहुल गांधी की गुजरात में मंदिर पालिटिक्स भी चर्चा का विषय रही। भाजपा के नेता धर्मभीरू हैं। इसलिए उनके घरों में मंदिर बने हैं नियमित रूप से उनके यहां धार्मिक अनुष्ठान होते रहते हैं। सप्ताह के कुछ निश्चित दिवसों में उनका अपने आराध्य के मंदिर में गमन होता रहता है। इसलिए वे चुनाव में मंदिर जायें तो उसकी कोई चर्चा होने वाली नही है। लेकिन राहुल गांधी किसी ऐसी दिनचर्या के अभ्यस्त नही हैं। इसलिए गुजरात में अचानक उनका मंदिर-मंदिर जाना अटपटेपन का एहसास कराने वाला बन गया। जिसने भी उनको ऐसा करने की सलाह दी वह निश्चित रूप से उल्लू का पटठा है। आम हिंदू आस्तिकता का प्रबल आग्रही तो ही लेकिन मंदिर जाने, यज्ञ हवन करवाने से किसी को अतिरिक्त अंक देने वाला नही है। इन चोचलों से वह कटटर हिंदू प्रभावित होता है जिसे मंदिर जाने के साथ-साथ मुसलमानों के लिए गालियां और धमकियां भी चाहिए क्या राहुल गांधी उनकी इस मंशा पूर्ति के लिए अपने को तैयार कर सकते थे। राहुल गांधी की मंदिर नौटंकी ने उन्हें कोई लाभ देने की बजाये परंपरागत कांग्रेसियों को गफलत में धकेल दिया।
मां से सीखें राहुल
राहुल अपनी मां सोनिया गांधी से ही कुछ सीख लें तो उनका भला हो सकता है। सोनिया गांधी को कभी यह एलान करने की जरूरत नही पड़ी कि वे हिंदू हैं, ब्राहमण हैं बगैरह-बगैरह। फिर भी उन्होंने कांग्रेस को गर्त से उबारकर उसके सितारे चमका दिये थे। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभालने के बाद पार्टी में हर स्तर पर 55 प्रतिशत पद दलित, आदिवासी, पिछड़ों, मुसलमानों और महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिये थे। वीपी सिंह से निजी दुश्मनी होते हुए भी समकालीन राजनीति के असली तकाजे की समझ होने के कारण ही सोनिया गांधी ने वीपी सिंह की टीम के सामाजिक न्याय सैनानियों को अपनी कोर कमेटी में शामिल किया। इसी कीमियागीरी की बदौलत वे कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने में कामयाब हुईं थीं। वह भी अटल बिहारी बाजपेयी जैसे विराट नेता के युग में।
सार्वजनिक जीवन में प्रतिबद्धता का प्रमाणिक और खरा होना महत्वपूर्ण है। जिन्होंने अवसरवादिता के लिए अपनी मौलिकता को खोया उन्हें पराभव का सामना करना पड़ा। मायावती और समाजवादी पार्टी इसी अवसरवादिता की शिकार होकर गच्चा खा बैठी। दूसरी ओर खरी प्रतिबद्धता की वजह से ममता बनर्जी और लालू यादव के पैरों के नीचे की जमीन खीचने में सारी ताकत लगाने के बावजूद भाजपा को सफलता नही मिल पा रही है। क्या राहुल गांधी को इन्हें देखकर समझ में नही आता कि राजनीति कैसी होती है और कैसी होनी चाहिए।

One response to “राहुल गांधी की सबसे बड़ी चूंक, जिसके कारण गुजरात में पूरे नही हो सके कांग्रेस के अरमान”

  1. ripu sudan singh Avatar
    ripu sudan singh

    excellent analysis

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