शब्दों और आंकड़ों की बाजीगरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई जबाब नही है लेकिन काम के नाम पर कार्यकाल पूर्ण करने वाले प्रधानमंत्रियों में वे सबसे फिसडडी हैं। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई बहस के जबाब में वे जो बोले वह स्थापित मानकों के अनुरूप भाषण नही था। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस का समापन करते हुए प्रधानमंत्री अपनी सरकार के कामकाज पर प्रतिपक्ष द्वारा उठाईं गईं उंगलियों का जबाब देते हैं और अपनी सरकार की आगामी योजनाओं का खाका खीचते हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि इस मामले में उनके पास सिर्फ कोरे कागज थे। इसलिए उन्होंने सारा वक्त लीक से हटकर भाषण करते हुए नेहरू-गांधी परिवार को कोसने में जाया कर दिया। इस दौरान सामान्य ज्ञान तक के मामले में उनकी बौद्धिक कमजोरी एक बार फिर छलक कर सामने आ गई। कल तक उनका समर्थन करने वाले भी अब उनसे निराश होते जा रहे हैं। ऐसे लोगों ने भी माना है कि मोदी का यह चुनावी भाषण था, संसद का भाषण नही।
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि कांग्रेस में पार्टी ने जब सरदार पटेल को प्रधानमंत्री पद के लिए चुना था तो जवाहर लाल नेहरू ने यह पद क्यों हथिया लिया। वैसे तो इन गड़े मुर्दे को उखाड़ने की वहां कोई प्रासंगिकता नही थी। लेकिन यह भी सोचा जाना चाहिए कि उस समय कांग्रेस पार्टी में जवाहर लाल नेहरू के समकक्ष कई नेता थे। जिनके सामने बहुधा नेहरू अपनी सोच को लागू करने के मामले में असहाय हो जाते थे। 1949 में जब अयोध्या विवाद की आजाद भारत में शुरूआत हुई तब विवादित स्थल पर रखी गई मूर्तियों के मामले में नेहरू का दृष्टिकोण अलग था, पर उनकी चली नही। हिंदू कोड बिल जिसके लागू न हो पाने की वजह से डा. अंबेडकर ने उनके मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। उसमें नेहरू का वश चलता तो हिंदू कोड बिल भी लागू होता और डा. अंबेडकर का इस्तीफा भी नही होता। कहने का मतलब यह है कि कांग्रेस पार्टी में नेहरू इस हैसियत में नही थे कि वे सरदार पटेल से अवसर छीन लेते। लेकिन महात्मा गांधी नेहरू को ही प्रधानमंत्री चाहते थे, यहां तक कि सरदार पटेल ने न केवल उनका प्रतिवाद नही किया बल्कि वे सहर्ष नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल हुए और यह भी गौरतलब है कि पहला आम चुनाव तो तब हुआ जब सरदार पटेल का देहावसान हो गया था। इसमें कांग्रेस पार्टी के सबसे बड़े जननायक के रूप में नेहरू के कद की पुष्टि हुई और नेहरू जी के जीवन काल में हुए तीन चुनावों में उनकी तमाम विफलताओं के बावजूद लोगों का समर्थन प्रधानमंत्री पद के लिए उन्ही को मिलता रहा। इसलिए यह धारणा पेश करना कि नेहरू ने पद छल से हथियाया था, न केवल सिरे से गलत है बल्कि धूर्ततापूर्ण है।
ऐसे तो 2014 के लोक सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी नही चाहती थी कि प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को प्रोजेक्ट किया जाये। संघ का वीटो न होता तो प्रधानमंत्री की दौड़ में मोदी कहीं नजर नही आ रहे थे, उन्हें संघ ने अचानक गुजरात से लाकर थोप दिया जिसे लेकर पार्टी बहुत असहज रही। उनके प्रधानमंत्री बन जाने के बाद भी भाजपा का एक बड़ा वर्ग जब लालकृष्ण आडवाणी के साथ उन्हें देखता था तो उसके मन में यह कचोट होती थी कि आडवाणी के साथ अन्याय किया गया है। इसकी भरपाई के लिए आडवाणी को उनके कद के अनुरूप पद देने की बजाय मोदी ने उनसे प्रतिशोध लेने में कसर नही छोड़ी। आडवाणी के बरक्स इतिहास मोदी का मूल्यांकन अंहकारी और तानाशाह मनोवृत्ति के नेता के रूप में करेगा।
संसद के अपने भाषण में मोदी ने इंदिरा गांधी द्वारा इमरजेंसी लगाने के फैसले का भी बेतुका जिक्र किया। लेकिन वे यह भूल जाते है कि इमरजेंसी की वजह से लोगों ने इंदिरा गांधी को उखाड़ा तो कुछ ही समय बाद उन्हें पछतावे का शिकार होना पड़ा। लोगों को उम्मीद थी कि कांग्रेस अधिक जनतांत्रिक और स्वच्छता और कुशलता से काम करने वाले लोग सत्ता में आयेगें जो देश की गरिमा को बढ़ाने का काम करेगें। लेकिन जो विकल्प आया उसमें शासन संचालन की बुनियादी योग्यता भी नही थी।
बदलाव का तकाजा यह कहता था कि बाबू जगजीवन राम प्रधानमंत्री बनाये जायें लेकिन जातिवादी सोच की वजह से जनता पार्टी के लोग मोरारजी देसाई के नाम पर सहमत हो गये थे जिनकी असल में पार्टी में कोई स्वीकार्यता नही थी। इस पार्टी ने अपने मानस पिता लोक नायक जयप्रकाश नारायण के निरादर में भी कसर नही छोड़ी। सोना गिरवी रखकर जनता पार्टी ने देश के मान-सम्मान को रोंद डाला। इसलिए ढ़ाई वर्ष में ही लोग इंदिरा गांधी को वापस ले आये। इस तरह इमरजेंसी का अध्याय इंदिरा गांधी के दूसरी बार सत्ता के आने के साथ ही समाप्त हो गया था। इसके बाद जो इंदिरा गांधी थी सब जानते है कि तत्कालीन संघ प्रमुख बाला साहब देवरस तक को भाजपा की बजाय उनका समर्थन करना सुहा रहा था। यह भी किसी से छुपा नही है कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिक्ख हिंसा को जो तांडव हुआ उसके पीछे संघ के हिन्दू आक्रोश की कितनी ऊर्जा थी। इसलिए वे सिक्खो के कत्लेआम को केवल कांग्रेसियों के मत्थे मढ़कर बरी नही हो सकते।
वो उसके मामले में राजीव गांधी को जनता ने लोक सभा चुनाव में दंडित किया। लेकिन उसे जिस विकल्प की तलाश थी वह विपक्ष नही दे सका। नतीजतन जनता दल की सरकार भी बहुत जल्दी ही पतन का शिकार हो गई। इसीलिए बाद में अल्पमत में होते हुए भी कांग्रेस की नरसिंहाराव सरकार को कार्यकाल पूर्ण करने का मौका मिल गया। इसके बाद लोगों ने फिर विकल्प आजमाये लेकिन वे उम्मीदें पूरी करने में नाकामयाब रहे। जब अटल बिहारी बाजपेई को काम करने का मौका मिला तो लोगों को लगा कि शायद यह उपयुक्त विकल्प है इसलिए 1998 में लोक सभा में मात्र एक मत से पराजित होकर उनके नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता से अपदस्थ हुआ तो 1999 में जनता ने उन्हें पुनः पदासीन कर दिया।
चुनाव में हार-जीत के पीछे कई कारक काम करते हैं लेकिन 2004 में अटल जी सत्ताच्युत भले ही हुए हों पर लोग उनके कार्यकाल को अभी तक खारिज नही करते। पार्टियों और सरकारों का मूल्यांकन सम्पूर्णता में होता है, प्रसंग विशेष के आधार पर नही। सम्पूर्णता में नेहरू जी के साथ कई उपलब्धियां थी। भाखड़ा नांगल बांध से लेकर भेल में सोवियत सहयोग से भारी इस्पात का कारखाना लगाने सहित कई काम उन्होंने ऐसे किये जिससे आधुनिक भारत के निर्माण की सही नीव पड़ी। इंदिरा गांधी ने पहले कार्यकाल में ही बैंकों के राष्ट्रीयकरण राजाओं के प्रिवीपर्स समाप्त करने और दुनियां के नक्शे पर बंगला देश नाम के नये राष्ट्र का निर्माण करने जैसे अभूतपूर्व कदम उठाये जिनके निहितार्थ बहुत गहरे और दूरगामी थे। राजीव गांधी ने भी पांच वर्ष के कार्यकाल में ऐतिहासिक काम किये जैसे गांव के प्रतिभाशाली गरीब बच्चों के लिए कांवेंट से ज्यादा बेहतर जवाहर नवोदय विद्यालय, पंचायतों और स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा व उनमें दलितों, पिछड़ो और महिलाओं को आरक्षण देकर वंचितों के नेतृत्व को जमीनी स्तर पर स्थापित करना और संचार क्रांति व गांव-गांव तक टीवी की पहुंच कायम करना।
नरसिंहाराव ने आर्थिक उदारीकरण के माध्यम से देश को आर्थिक महाशक्ति बनाने की नींव रखी। अटल जी ने परमाणु विस्फोट और स्वर्णिम चतुर्भुज योजना जैसे इतिहास में हमेशा दर्ज होने वाले कदम उठाये। मनमोहन सिंह के 10 वर्ष के कार्यकाल में वैश्विक मंदी के दौर में भी भारत की आर्थिक मजबूती को सुनिश्चित किया गया और मानक विकास सूचकांक बढ़ाने के उल्लेखनीय प्रयास हुए।
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लेकिन अगर इतिहास का चित्रगुप्त आगे चलकर मोदी का हिसाब-किताब लिखेगा तो उसमें क्या दर्ज किया जायेगा। मोदी ने काम नही प्रयोग किये, जैसे नोट बंदी जिसके बारे में उन्होंने बार-बार अपना बयान बदला कि इसके पीछे यह उददेश्य था, वह उददेश्य था। सर्जिकल स्ट्राइक जैसी गंभीर कार्रवाई को उन्होंने शोशेबाजी के तौर पर अंजाम दिया जिसके बाद सेना पर हमले और युद्ध विराम उल्लंघन की घटनाएं बढ़ी। लेकिन फिर पाकिस्तान के इलाज के नाम पर किंकर्तव्यविमूढ़ता प्रदर्शित करने के अलावा वे कुछ नही कर पा रहे। सही बात यह है कि जुमलेबाजी के अलावा वे कुछ ऐसा नही कर सके जिससे देश की जरूरते पूरी हो सकें। फिर भी उनका समर्थन लोगों को मिल जाता है तो यह पराजयों के इतिहास से अभिशप्त कौम की कुंठित मनोवृत्ति का नतीजा है जिसको भुनाना मोदी बहुत अच्छी तरह जानते हैं। बेरोजगारी, बढ़ती मंहगाई, डामाडोल अर्थव्यवस्था और जबाबदेह गवर्नेंस न दे पाने की विफलता से लोगों का मोह भंग हो रहा है और पहले गुजरात में सीटों में कमी आने और इसके बाद राजस्थान के उपचुनावों के झकझोरने वाले परिणाम खतरे की आहट देखकर मोदी ने एक बार फिर संसद में दिये गये अपने भाषण से लोगों की इस दुखती रग को छूने का हुनर दिखाया है पर कब तक लोगों को फंतासी में बहलाया जा सकता है। भावलोक में घुमाकर लोगों को बहुत दिनों तक मुटठी में नही रखा जा सकता। ऐसे संचारी भाव की बुखार की तरह एक मियाद है। स्थाई भाव जीवन की वास्तविकताओं पर आधारित होता है और जो कटु वास्तविकताएं लोग इस समय झेल रहे हैं और जिनके निराकरण की अब कोई आशा नही बची है वे आने वाले लोक सभा चुनाव में क्या गुल खिलायेगें इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

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