उरई। जालौन ब्लाक के भदवां प्राथमिक विद्यालय की प्रधानाध्यापिका की निष्ठुर टिप्पणी से आहत एक बच्चे की मां कोमा में चली गई। प्रधानाध्यापिका के असंवेदनशील और मनमाने रवैये को लेकर तमाम शिकायतें होने के बावजूद उन पर कार्रवाई नही हो पा रही है।
बताया गया है कि भदवां के स्कूल में गांव के मजदूरी करने वाले रविंद्र मोहन का बेटा अनुज कुमार पढ़ता है। जिसके भविष्य के साथ तानाशाही रवैये की वजह से प्रधानाध्यापिका बार-बार खिलवाड़ कर चुकी हैं। 25 फरवरी को अनुज को विद्या ज्ञान की मुख्य परीक्षा में शामिल होना है। जिसके लिए वह अपनी मां के साथ कक्षा तीन, चार की मार्कशीट लेने विद्यालय पहुंचा था। प्रधानाध्यापिका कमलेश कुमारी इस दौरान वेबजह ही भड़क गईं और बच्चे की मां से कहने लगीं कि तुम्हारे पति मर गये हैं जो तुम बच्चे के साथ आई हो।
अमानवीयता की हद पार करते हुए प्रधानाध्यापिका ने यह नही सोचा कि पत्नी के सामने पति की मौत की बात कहने की उस पर क्या प्रतिक्रिया हो सकती है। अनुज की मां विचलित होकर प्रधानाध्यापिका की टिप्पणी के कारण घर चली आईं और कोमा में चली गईं। बाद में रविंद्र मोहन को उनका उपचार कराना पड़ा।
इसके पहले प्रधानाचार्या ने मनमानी के तहत नवोदय विद्यालय के प्रवेश फार्म को एसआर के अंतर्गत सत्यापित नही किया था। जिसकी शिकायत रविंद्र मोहन ने अधिकारियों को भेजी थी। लेकिन प्रधानाध्यापिका पर कोई कार्रवाई नही हुई जिससे वे और खूंखार हो गईं। दूसरी ओर अनुज नवोदय की प्रवेश परीक्षा में आनलाइन आवेदन नही कर सका।
विद्या ज्ञान परीक्षा में भी खण्ड शिक्षाधिकारी और न्याय पंचायत प्रभारी के कहने के बावजूद प्रधानाध्यापिका ने जब अनुज को एसआर के तहत सत्यापित नही किया तो उन्होंने कन्या प्राथमिक विद्यालय की प्रधानाध्यापिका राजकुमारी वर्मा से उसका फार्म भरवाया। तो क्या कमलेश कुमारी शिक्षा विभाग के अधिकारियों के नियंत्रण में नही हैं।
बताया जाता है कि कमलेश कुमारी ने बच्चों को जूते-मोजे भी वितरित नही कराये हैं। एमडीएम भी न्याय पंचायत प्रभारी के कहने के बाद शुरू कराया था। विद्यालय में तीस प्रतिशत बच्चे ही उपस्थित रहते हैं लेकिन एमडीएम के लिए 90 प्रतिशत बच्चे उपस्थित दिखाये जाते हैं। उनकी बदमिजाजी की वजह से कोई रसोइया विद्यालय में नही टिक पाती। इन अव्यवस्थाओं का खामियाजा बच्चों को भोगना पड़ रहा है। जाहिर है कि कमलेश कुमारी जैसी जालिम व्यवहार की अभ्यस्थ प्रधानाध्यापिका की जरूरत स्कूल में नही जेल प्रशासन मे है। सरकार और उच्चाधिकारियों को इस पर गौर करना चाहिए।





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