उरई। बुंदेलखंड में होली की फागे मशहूर हैं। फागों के विविध स्वरूप हैं जिनके जरिए अनोखे ढंग से होली खेली जाती है।
डगे की फाग इसके तमाम रूपों में से एक है। इसके तहत गांव के खुले मैदान में मोटी तथा चिकनी बल्ली गाड़ दी जाती है। उस पर तेल पोतकर और चिकना किया जाता है। बल्ली के ऊपरी सिरे पर एक पोटली में गुड़ का डला तथा कुछ रुपये पैसे बांध दिये जाते हैं। एक मोटा रस्सा बल्ली के ऊपरी भाग पर बांधकर नीचे तक लहराता हुआ छोड़ दिया जाता है। गांव की वलिष्ठ महिलाएं इस बल्ली का घेरा बनाकर अपने हाथों में पोले बांस लेकर खड़ी हो जाती हैं। इसके पश्चात पुरुषों को डगे की फाग खेलने की आवाज लगाई जाती है। जो पुरुष आगे निकलकर आता है उसे बल्ली पर चढ़कर पोटली उतारकर नीचे उतरने को कहा जाता है। जो व्यक्ति पोटली उतारकर नीचे ले जाता है उसे विजयी घोषित किया जाता है और पोटली उसको इनाम में दे दी जाती है। पोटली उतारकर नीचे आने तक का दृश्य बड़ा दिलचस्प होता है।
कालपी के निकट कहटा ग्राम में गुझिया की फाग मनाई जाती है। इस गांव में कर्दम ऋषि का मंदिर बना है। एक ऊंचे मकान के झरोखे में या छत पर कुछ महिलाएं आटा तथा खोया की बनी गुझियां हाथ में लेकर बैठ जाती हैं। गुझियों की फाग शुरू होते ही मैदान में इकटठे नौजवान उनके हाथ की गुझियां छीनकर खाते हैं। इसमें दीवाल के सहारे चढ़कर गुझियों तक पहुंचना मना रहता है। यदि कोई युवक इसका प्रयास करता है तो महिलाएं लटठ मारकर उसे भगा देती हैं।
कुछ स्थानों पर मटका की फाग होती है। इसमें सड़क के दोनों ओर पेड़ या खंभों से रस्सी बांधी जाती है। उसके बीचों-बीच मटका टांग देते हैं। जिसमें गुलाल, अबीर तथा रुपयों की एक थैली डाल देते हैं। जब फाग शुरू होती है तो युवक हाथ में एक छोटा डंडा लेकर उछलकर मटका तोड़ने का प्रयास करते हैं। जो मटका तोड़ लेता है उसे थैली इनाम में दे दी जाती है।
अन्य पारंपरिक त्यौहारों की तरह होली का भी आधुनिकीकरण होता जा रहा है। जब से हाईटैक होली का चलन बढ़ना शुरू हुआ है तब से इसे खेलने के यह पुराने अंदाज दुर्लभ होते जा रहे हैं। लेकिन बुजुर्ग जब आज के नौजवानों को अपने समय की इन फागों के किस्से सुनाते हैं तो वे कोतूहल से भर जाते हैं।






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