बिहार में मुजफ्फरपुर के एसएसपी विवेक कुमार की विशेष निगरानी इकाई द्वारा उत्तर प्रदेश सहित उनके कई ठिकानों पर छापेमारी कर करोड़ों रुपये कीअवैध संपत्ति जब्त किये जाने के बाद निलंबित कर दिया गया है। विवेक कुमार के खिलाफ शराब माफियाओं से रुपया लेकर उन्हें अवैध रूप से बड़े पैमाने पर करोबार करने की छूट दिये जाने का मामला सामने आया था। जिसके बाद विशेष निगरानी इकाई को उनके पीछे लगा दिया गया। वरिष्ठ अधिकारी के भ्रष्टाचार के खिलाफ इस बड़ी कार्रवाई से बिहार की पूरी नौकरशाही में हड़कंप मच गया है। बिना घूस लिए कोई फाइल आगे न बढ़ाने वाले अधिकारी सहम गये हैं। अगर इसमें निरंतरता रही और कुछ और जिलों के डीएम एसपी पकड़ने में कामयाबी हासिल की गई तो भ्रष्टाचार के कारण त्रस्त बिहार की जनता को काफी राहत मिलेगी।
ऐसी कार्रवाइयां हर राज्य में वांछनीय हैं। आईएएस और आईपीएस संवर्ग की अपनी गरिमा है। इसके कारण पहले इन संवर्गों के अधिकारियों को अपनी मान-मार्यादा पर धब्बा न लगने देने का दबाव महसूस होता रहता था। ज्यादातर आईएएस और आईपीएस अधिकारी जिलों में अपनी शुरूआती पोस्टिंग के दौरान पैसे के लालच से कोसों दूर रहते थे। उनका ध्यान भविष्य में बेहतर अधिकारियों के नाम की कतार में अपने को शामिल कराने के लिए ज्यादा से ज्यादा असाधारण काम करने पर होता था। कलेक्टर और एसपी प्रशासन की धुरी होते हैं। जब इन पदों पर काम करने वाले अधिकारी बैठते हैं तो पूरा प्रशासनिक तंत्र चुस्त और गतिशील दिखता है।
लेकिन वर्तमान दौर में जबकि साधु-संत तक यह समझने लगे हैं कि उनके चमत्कार को नमस्कार तभी होगा जब उनके पास चकाचैंध वाला वैभव हो तो सांसारिक पद पर वह कितना भी बड़ा पद क्यों न हो बैठा व्यक्ति क्यों यह नही सोचेगा कि गरिमा और प्रतिष्ठा तो शब्दाडंबर हैं, असली मूल्यांकन इस बात पर होता है कि आप कितने वैभव और ऐश्वर्य के स्वामी हैं। इस धारणा ने आईएएस और आईपीएस संवर्ग को इतना भ्रष्ट कर दिया है कि इन संवर्गों के अधिकारी ट्रेनिंग के दौरान ही उगाही में जुट जाते हैं। इस पराकाष्ठा ने प्रशासनिक तंत्र को पंगु बना दिया है। दूसरी ओर घूसखोरी के कारण लोगों को मौलिक अधिकार तक हासिल नही हो पर रहे जिसकी वजह से वे लोकतांत्रिक व्यवस्था को छदम मानकर अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में जब योगी आदित्य नाथ मुख्यमंत्री बने तो उनके बारे में आम फहम था कि उन्हें कोई लालच नही हैं साथ ही वे निर्भीक और परिश्रमी भी हैं। जिसकी वजह से अराजकता में गर्क हो चुकी व्यवस्था को भ्रष्टाचार पर सख्ती से लगाम लगाकर वे पटरी पर लायेगें। उन्होंने जब सभी अधिकारियों के लिए अपनी आय और परिसंपत्तियों का ब्यौरा हर साल दाखिल करना अनिवार्य किया तो लगा कि नौकरशाही को सदबुद्धि प्रदान करने की शुरूआत हो गई है। लेकिन कुछ ही अधिकारियों ने उनके निर्देशों का पालन किया। जब बार-बार समय सीमा बढ़ाये जाने के बावजूद अधिकांश अधिकारियों ने इस ब्योरे को दाखिल करने की जहमत नही उठाई तो उन्होंने घुड़की भी दी कि जो अधिकारी इस मामले में हुक्मउदूली कर रहे हैं उन्हें गंभीर नतीजों का सामना करना पड़ेगा। पर शायद अधिकारी पहले ही बाबा जी का दम जानते थे इसलिए उन्होंने योगी की एक न सुनी अंत में यह हुआ कि योगी खुद ठंडे पड़ गये। दुष्यंत जिस तरह शकुंतला को भूल गये थे वैसे ही योगी हर अधिकारी से उसकी आय व संपत्ति का ब्यौरा लेकर ही रहेगें, की प्रतिज्ञा भूल गये।
इस बीच कानपुर और पूर्वांचल में कुछ परिवहन अधिकारी पकड़े गये। कानपुर में वाणिज्यकर विभाग के एक आयुक्त को जीएसटी घोटाले में पकड़ा गया। इन कार्रवाइयों से शुरू में यह प्रतीति की गई कि उत्तर प्रदेश में बदले निजाम में भ्रष्ट अधिकारियों की तबियत दुरुस्त की जाने वाली है। लेकिन बाद में यह एक भोला विश्वास साबित हुआ। बिल्ली के भाग्य से छीका टूटने की तर्ज पर भ्रष्टाचार के कुछ चूहे अनायास पिजड़ें में फंस गये थे न कि इसके पीछे कोई सुनियोजित अभियान था। सरकार का इस मामले में अनमनापन जैसे-जैसे सामने आता गया वैसे-वैसे नये मामले पकड़े जाने की बात तो दूर पकड़े गये मामलों को भी दफन किया जाने लगा। यादव सिंह के केस का आज जो यह हाल है यह उसकी बानगी है।

योगी का अध्यात्म प्राथमिक है जिसमें केवल भक्ति होती है। अध्यात्म उन्नत होता है तो भक्ति योग से ज्ञानयोग में प्रवेश होता है और इसके बाद ज्ञानयोग की सार्थक परिणति कर्मयोग में होती है। चूंकि योगी भक्तियोग की सबसे निचली पायदान पर ही अटक कर रह गये हैं इसलिए कर्मयोग उनसे अभी बहुत दूर है। इसका ही फल है कि योगी किसी भी चीज की शुरूआत करके उसको जारी रखकर अंजाम तक पहुंचाने के पहले ही मुकर जाते हैं। उन्होंने अधिकारियों से संपत्ति का ब्यौरा तलब करने के मामले में ही ऐसा नही किया। उनकी इस आदत के कई और उदाहरण हैं। उन्होंने एंटी रोमियों दल हर जिले में महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा के लिए गठित कराया था लेकिन अब यह दस्ते गायब हो चुके हैं जबकि प्रदेश में एक बार फिर महिलाओं के खिलाफ घिनौने अपराधों की बाढ़ आई हुई है। तो स्लाटर हाउस और खुले में मांस की बिक्री के खिलाफ छेड़े गये अभियान का भी हश्र कुछ इसी तरह हो चुका है। निजी स्कूलों की फीस को नियंत्रित करने का उनका मंसूबा भी कोई गुल खिलाये बिना ही ढेर हो गया। शिक्षा दान के पवित्र दायित्व को घनघोर मुनाफाखोरी का अडडा बना देने वालों का उल्टा इस सरकार में सबसे ज्यादा महिमा मंडन हो रहा है। हाल ही में बलिया में राज्यपाल सेंट जेवियर पब्लिक स्कूल में इस सोच को पुष्ट करने के लिए पहुंच गये। वैसे महामहिम इसाईयत के प्रचार के बहुत विरोधी है लेकिन सेंट जेवियर स्कूल में जाने में उनकी यह प्रतिबद्धता भी आड़े नही आई। जब राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष तामझाम वाले पब्लिक स्कूलों के तेज के सामने खुद नतमस्तक हो जाते हैं तो अन्य लोगों को कैसी प्रेरणा मिलती होगी इसका अनुमान लगाया जा सकता है। मुनाफाखोर स्कूल संचालकों के हौसले इस सिलसिले ने बुलंद कर दिये हैं। बलिया में इसी कारण सेंट जेवियर के प्रबंधन ने राज्यपाल के सामने कही भाजपा के सांसदों को प्रोटोकाल के अनुसार सम्मान न देने की जुर्रत कर डाली और राज्यपाल स्कूल प्रबंधन को इस पर आंखे दिखाने की बजाय उसी की भाषा में बोलने लगे।
बहरहाल भाजपा के कर्णधारों के पाखंड के उजागर होने से व्यवस्था का पूरा तंत्र जड़ता और दिशा हीनता का शिकार बन गया है। भ्रष्ट अफसर इतने शेर हो गये हैं कि उन्हें सीधे मुख्यमंत्री से शिकायत होने पर भी डर नही है। मनमानी के शासन में नीति और नियमों की धज्जियां उड़ा दी हैं। खुद भाजपा के कार्यकर्ता इस हालत से हतप्रभ हैं। उन बेचारों की मजबूरी है कि वे वर्षों की निष्ठा भी नही बदल सकते। लेकिन अपनी सरकार को सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार को संरक्षण देते देख उनकी हिम्मत दूसरों को मुंह दिखाने की नही हो रही है। उत्तर प्रदेश में विशेष निगरानी इकाई जैसा व्यापक तंत्र है जो भ्रष्टाचार को रोक सकता है पर इसमें शामिल भ्रष्टाचार निरोधक इकाई, आर्थिक अपराध अनसंधान संगठन और सतर्कता विभाग को डैड टिशू बना दिया गया है। इन विभागों की उपयोगिता से सरकार को कोई सरोकार नही रह गया। उसने इन विभागों की पहचान काला पानी के रूप में बना दी है जिनमें अधिकारी को पोस्टिंग उसकी सेवाओं और क्षमताओं का सार्थक लाभ लेने के लिए नही सजा देने के इरादे से की जाती है। राजनैतिक दलों का मुंह ताकने की बजाय इस तरह के मुददो पर लोगों को स्वयं आंदोलन की कमान संभालने के लिए तैयार होना पड़ेगा।






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