उरई । कभी कभी किसी के द्वारा किया गया छोटा सा प्रयास भी उसे साधारण से असाधारण की श्रेणी में खड़ा कर देता है । इस तरह जाने अनजाने में कोई व्यक्ति समाज में इंसानियत और मानवता की एक मिसाल पेश कर देता है जिसका प्रभाव कुछ जिंदगियों के लिए शब्दों में बयान न करने वाला होता है । उनके केवल आँखों के आँसू बाहार आते हैं , लब खामोश और जुबान मौन हो जाते हैं । ऐसे ही किरदार रीयल हीरो कहलाते हैं ।
ऐसे ही एक घटना हम आप को बताने वाला हूँ । साथ में दिख रही तस्वीर में दिख रहे पढ़े लिखने वाले युवक का नाम है अमरजीत कुमार जो जालौन जिले की माधौगढ़ तहसील के ग्राम अमखेड़ा स्थित सेंट्रल बैंक की शाखा में बतौर अधिकारी नियुक्त हैं , दूसरा युवक है कजरु ।
कजरु आज से 11 वर्ष पहले रोजगार की तलाश में घर से निकले थे , कानपुर रेल्वे स्टेशन पर उनकी मुलाक़ात जालौन के युवक से हुई । वह काम दिलाने के आश्वासन के साथ कजरु को जालौन जिले के एक गाँव में ले आता है और एक सामंत को बंधुआ के बतौर बेच देता है । इसके बाद कजरु के साथ रोंगटे खड़े करने वाला व्यवहार शुरू होता है , उसको जानवरों के बाड़े में कैद कर दिया जाता है और गाय, भैंसों का चारा, भूसा और गोबर कराने की ड्यूटी पर लगा दिया जाता है । खाने को कुत्तों के लिए बनाई जाने वाली मोती –मोती रोटियाँ , पहनने को टाट के कपड़े , ओढ़ने बिछाने को जूट के बोरे , दिन भर हाड तोड़ मेहनत और इसके बाद हर शाम लाठियों से पिटाई इस बर्बरता में कजरु सुध खो बैठता है और पागल हो जाता है । अब तो कजरु को पागल होने के कारण रस्सी से बांधा जाने लगा था । बस उतनी ही रस्सी ढीली की जाती जाती जितने में काम हो जाये । ऐसे ही 11 वर्ष गुजर गए कजरु ने बाड़े के बाहर की हवा नहीं देखी थी इतने दिनों में , फिर एक दिन चमत्कार होता है किसी तरह कजरु बाड़े से निकाल गाँव के बाहर रास्ते तक आ जाता है जहाँ उसे अमखेड़ा निवासी देवेन्द्र सिंह मिलते हैं । वे उसे अपने साथ उसे गाँव ले आते हैं । वे उसे अच्छा खाना , पहनने को ढंग के कपड़े देते हैं तो उसकी रंगत वापस लौट आती है । इस बीच अमरजीत की निगाह कजरु पर पड़ जाती है और बातचीत में माजरा उनकी कुछ कुछ समझ में आ जाता है । कजरु अपना पता भूल चुका था केवल पिपरहटी नाम ले पा रहा था । अमरजीत ने कद काठी से अंदाजा किया कि कजरु बिहारी होना चाहिये और उन्होने पिपरहटी को बिहार में गूगल पर सर्च किया । जल्द ही उन्हे सफलता मिल जाती है और बिहार के गया जिले में मोहनपुर थानान्तर्गत पिपरहटी गाँव की जानकारी मिलती है । अब वे वहाँ के विधायक , थाना प्रभारी आदि से कजरु के परिवार तक पहुँचने के लिए संपर्क करते हैं । थोड़ी से मेहनत के बाद वे कामयाब हो जाते हैं । अमरजीत यहीं नहीं थमते इसके बाद वे बैंक से छुट्टी ले कर अपने खर्चे पर कजरु को उसके गाँव ले जा कर पहुँच जाते हैं । इसके बाद जो दृश्य उभरता है उसमें शब्दों की कोई भूमिका नहीं थी केवल आँसू थे , एक माँ को बेटा , एक पिता को पुत्र , भाई बहिन को बिछुड़ा सहोदर 11 वर्ष बाद मिला था और ऐसे खुशी के क्षण उस परिवार में लाने वाले मसीहा थे अमरजीत कुमार । और हाँ आप जब भी जनपद की सीमा से गुजरे जरा सावधान ही रहें यहाँ कजरु बना लेने का रिवाज बड़ी संख्या में है , आज भी हजारों कजरु जिले में कई जगह बाड़ों में कैद पड़े हैं । बाबूजी जरा संभलना , बड़े धोखे हैं राह में ।






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