शूद्रों को लेकर रामचरित मानस में लिखी चैपाइयों और दोहों के चलते तुलसीदास जी समाज के एक वर्ग में विवादों के घेरे में खड़े किये जाने लगे है। सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने तुलसीकृत रामचरित मानस की कतिपय पंक्तियों को लेकर उसमें संशोधन की मांग उठा डाली थी और पूर्व डी.जी.पी. सुलखान सिंह जैसे सवर्ण बुद्धिजीवी भी उनके पक्ष में खड़े हो गय थे। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी के पक्ष में ध्रुवीकरण की प्रत्याशा से स्वामी प्रसाद मौर्य की पीठ थप थपाकर दलितों और पिछड़ों में उद्वेलन पैदा करने की कोशिश की थी लेकिन राजनीति के भक्तिकाल में इस मामले में दाल न गल पाने से उन्हें अपने कदम वापिस खींचने पड़े। हालांकि अखिलेश की पार्टी में भी स्वामी प्रसाद मौर्य की टिप्पणी को लेकर विवाद था। यहा तक कि उनके चाचा शिवपाल ने भी स्वामी प्रसाद मौर्य से असहमति प्रकट करनेे में गुरेज नहीं किया था। दूसरी ओर भाजपा में भी धर्म संकट की स्थिति पैदा हो गयी थी जब संघ प्रमुख भी धर्म ग्रन्थों में समय के मुताबिक संशोधन की मांग के सुर में सुर मिला बैठे थे।
ऐसा नहीं है कि तुलसीदास को लेकर यह विवाद पहली बार सामने आया हो। प्रख्यात समाजवादी समालोचक डाॅ. रामविलास शर्मा ने जब तुलसीदास को प्रगतिशील जन कवि सिद्ध करने की कोशिश की तो उन्हीं के खेमें के लोग उन पर हमलावर हो गये थे। उनकी पीढ़ी के पहले के माक्र्सवादी चिंतक हंसराज रहबर भी तुलसीदास को जन कवि ठहराने के फेर में अपनों के कोपभाजन बन गये थे। महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ने भी तुलसीदास पर एक चर्चित काव्य ग्रन्थ लिखा। दिग्गज प्रगतिशील समालोचक हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी तुलसीदास जी की महिमा में लिख दिया था कि भारत में गौतम बुद्ध के बाद दूसरा महानायक तुलसीदास ही हुये है। यह बात घर घर में रामचरित मानस के पहुंचने से सत्य प्रतीत होती है लेकिन इसके बावजूद जाति भेद के आधार पर शोषित उत्पीड़क वर्ग के बौद्धिक समाज को रामचरित मानस को लेकर बे आज भी हजम नहीं है। तुलसी के राम को वर्ण व्यवस्था के नायक के रूप में एक वर्ग द्वारा देखा जाना विवाद की जड़ में है।
बहरहाल तुलसीदास ने ही राम को लेकर लिखा है जाके मन रही भावना जैसी तिन देखी प्रभु मूरत तैसी इस प्रसंग में बहुत मौजू है। तुलसी की तरह कबीर के भी आराध्य राम है लेकिन बे कहते है कि मेरे राम किसी दशरथ के पुत्र नहीं अजन्मा, अकाल राम है। संत रविदास भी कमोबेश निराकार राम के ही उपासक है। हाल में गुरूगोविंद सिंह के बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किया गया यह कथन कि उन्होंने गोविंद रामायण लिखकर भगवान राम की स्तुति की थी एस.जी.पी.सी. की आपत्ति और गुस्से का कारण बन गया था। एक और रचना विचित्र नाटक भी गुरू गोविंद सिंह जी के द्वारा लिखी गयी बतायी गयी थी जिसके बारे में दाबा है कि गुरू जी ने खुद को भी सूर्यवंशी क्षत्रिय और भगवान राम का वंशज बताया है। लेकिन सिख विद्वान इसका खण्डन करते है कि यह रचना गुरू गोविंद सिंह जी की है। जो भी हो लेकिन इतना अवश्य है कि सिखों के सबसे पूज्यनीय ग्रन्थ गुरू ग्रन्थ साहिब में कई बार राम के नाम का उल्लेख है लेकिन मजे की बात यह है कि गुरू ग्रन्थ साहिब में सिख गुरूओं के अलावा अन्य भक्तों में केवल कबीर, रविदास और बाबा फरीद के भजनों स्थान मिला है लेकिन तुलसीदास को नहीं। जाहिर है कि सिख मत भी राम को स्वीकार करता है लेकिन निराकार, निर्गुण राम के नाम को जो ईश्वर का बोध है। कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय संस्कृति में ईश्वर के बोध के रूप में राम ही सर्वत्र स्वीकार है इसलिये यह दावा करने वाले भी सही है कि राम का नाम ही इस देश की पहचान है भले ही कई लोगो को सगुण राम से नकार हो और सगुण धरातल पर भी राम को लेकर एक दूसरे से सर्वथा भिन्न तमाम कथायें प्रचलित हों।







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