पटना में भानुमती के कुनबे के एकजुट होने के आसार से विपक्षी खेमे में उत्साह का जो वातावरण बना था उस चौका पर महाराष्ट्र के खेल से भाजपा ने छक्का जड़ दिया है। लोकसभा चुनाव का समय जैसे जैसे नजदीक आता जायेगा भाजपा की रणनीति का इसी तरह का कमाल लगातार बढ़ता जायेगा। ऐसा लगता नहीं है कि भाजपा पर लगातार हावी बने रहने की विपक्ष के पास कोई कारगर योजना है। तात्कालिक सफलताएं उसका अति आत्मविश्वास बढ़ा देतीं हैं लेकिन निर्णायक मौके पर भाजपा उसे पीछा छोड़ने में सफल हो जाती है। राहुल गांधी की भारत यात्रा, हिमांचल प्रदेश व कर्नाटक में कांग्रेस की जीत और जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं उनमें भाजपा के पिछड़ने की आ रहीं सर्वे रिपोर्टो से विपक्ष के बाजार भाव में जो उछाल आ रहा था उस पर महाराष्ट्र के घटना क्रम ने पानी फेर दिया क्योंकि इसका असर केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे देश में राजनीति पर इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव होने का अनुमान है। विपक्ष के हौंसले 2019 के लोकसभा के चुनाव के समय भी बुलंद थे, भाजपा अपने मूल एजेंडे को पूरा करने की दिशा में भी एक इंच नहीं बढ़ी थी जिससे उसके समर्थक भी खिन्न हो गये थे पर पुलवामा कांड के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने किस तरह सारा मंजर पलट दिया यह सर्वविदित है। खरगोश कछुआ दौड़ में कछुआ की नियति का शिकार बन जाना विपक्ष का प्रारब्ध बन गया है। 2024 में भी इस इतिहास की पुनरावृत्ति करने के लिये ठोस कार्रवाई करने में भाजपा सफल होती नजर आ रही है।
महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार को बहुत बड़ा चाणक्य माना जाता है। ऐसा देखा गया है कि प्रधानमंत्री मोदी भी उनसे डरे रहते रहे हैं। उन्हें कोई गच्चा दे पायेगा यह मुश्किल लग रहा था पर भाजपा उनके अपनों को ही विभीषण बनाने में सफल हुयी। उसकी अपनी पार्टी में इतने बड़े पैमाने पर सेंधमारी का अंदाजा पवार को बिल्कुल नहीं रहा। हालांकि उनके भतीजे अजित पवार एकबार पहले भी भाजपा के साथ चले गये थे लेकिन तब शरद पवार उन्हें फिर अपने साथ खींच लाने में कामयाब रहे थे। तब कहा गया था कि अजित पवार को अपने चाचा की छाया बनकर काम करने की आदत है जिसके कारण वे उनके रहते उनकी मर्जी के खिलाफ कहीं नहीं जा सकते। पर अब यह धारणा खंडित हो गयी है। अजित पवार ने पूरी राष्ट्रवादी कांग्रेस पर दावा करने का इरादा भी जता दिया है जो शरद पवार को खुली चुनौती है। फिलहाल यह नजर आ रहा है कि शरद पवार का जादू अपनी पार्टी पर से खत्म हो गया है। उनकी पार्टी के ज्यादातर विधायक और सांसद अजित के साथ जाने को बेताब हैं। जिन बड़े राज्यों में लोकसभा चुनाव में भाजपा द्वारा अपनी हैसियत गवा देने का आकलन किया जा रहा था उनमें महाराष्ट्र की भी गिनती थी। इसलिये यह समूचे विपक्षी गठबंधन के लिये झटका बन गया है।
दरअसल राष्ट्रवादी कांग्रेस में शरद पवार के उत्तराधिकार को लेकर काफी समय से तनातनी पैदा हो गयी थी। इसके बीच शरद पवार ने अजित के दाव को विफल करने के लिये पहले अपने इस्तीफे का पैंतरा खेला तो उनकी पार्टी में कोहराम मच गया। सारी पार्टी एकजुट होकर उन्हें इस्तीफा वापिस लेने के लिये मनाने में जुट गयी जिससे उन्हें मुगालता हुआ कि अभी भी पार्टी पर उनका पूरा नियंत्रण है। इसके बाद उन्होंने इस्तीफा वापस ले लिया। कुछ दिनों बाद उन्होंने संगठन से अजित को एक किनारे करके पार्टी की बागडोर अपनी पुत्री सुप्रिया को सौंप डाला। इसकी प्रतिक्रिया में अजित का चाचा के खिलाफ बगावत का परचम लहरा देना स्वाभाविक है। पर अजित के पालाबदल के पीछे केवल पार्टीगत कारण नहीं है। वे अति महत्वाकांक्षी हैं जिसके लिये काफी समय से व्यग्र दिखाई देने लगे थे। अपने कैरियर में उन्हें किसी विचारधारा को रोडा बनाना मंजूर नहीं था इसलिये जब उन्होंने यह आकलन किया कि अभी देश में मोदी ही सर्वोपरि हैं जिनके सामने राहुल गांधी उनको बहुत नादान नजर आ रहे हैं और उनको यह विश्वास है कि लंबे समय तक अभी देश में भाजपा का ही जलवा रहेगा तो सत्ता से संघर्ष की खून छनकाने वाली राजनीति के फेर में रहने की बजाय वे उसकी छत्रछाया में पहुंचनेे के लिये तड़पने लगे। लेकिन चाचा का मोह उनके कदम रोक लेता था पर जब चाचा उनको सबक सिखाने के लिये तत्पर हो गये तो उनकी आन अजित के लिये जाती रही।
भारत जोड़ो यात्रा के बाद राहुल के बारे में जनमानस में निश्चित रूप से तस्वीर बदली है। अब उन्हें गंभीरता से लिया जाने लगा है। सर्वे रिपोर्ट भी उनकी लोकप्रियता का प्रतिशत बढ़ाती हुयी दिखाई दे रही हैं। मोदी सरनेम मामले में अदालत से सजा मिलने और इसे आधार बनाकर उनकी लोकसभा की सदस्यता छीनें जाने के मामले को उन्होंने जिस तरह निपटा उससे उनके प्रति सहानुभूति उमड़ना शुरू हो गयी थी। विश्वसनीयता बढ़ने से अडानी को लेकर उनके द्वारा किये गये हमलों ने लोगों के बीच प्रधानमंत्री की छवि को दरका डाला था। इस बीच यह भी प्रकट हुआ कि राहुल गांधी अपनी सजा टलवाने को लेकर फिलहाल कोई ज्यादा प्रयास करने के मूड में नहीं हैं ताकि यह आभास करा सकें कि अगले लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करें इसमें उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है और कांग्रेस पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिये मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम बढ़ाये जाने की चर्चायें शुरू हो गयीं थी जिन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद मजबूत नेता की छवि बनायी है। दलित होने के कारण उनके नाम की पेशकश कांग्रेस का ट्रंप कार्ड भी समझी जा रही थी ऐसे में माहौल बनाये रखने के लिये राहुल गांधी को सड़कों पर अपनी सक्रियता दिखाते रहना चाहिये था। पर अमेरिका यात्रा से लौटने के बाद वे इस मामले में अंर्तध्यान हो गये जबकि उन्हें अपने प्रतिद्वंदी के मोडस आॅपरेंडी को इतने दिनों में अच्छी तरह समझ जाना चाहिये था जो निर्णायक समय में विपक्ष को हतप्रभ करने वाले ताबड़तोड़ वारो में माहिर है। विपक्ष की अगली बैठक अब शिमला की बजाय बैंगलौर में प्रस्तावित हो गयी है। इसके बीच भाजपा की मारक कार्रवाईयां बढ़ती जा रहीं हैं। समान नागरिक सहायता का मुद्दा गर्माकर उसने एक बड़ा दाव पहले ही चल दिया था इसके बाद अब महाराष्ट्र का घटनाक्रम सामने आया है। विपक्ष में उसकी सेंधमारी भी पहले से तेज थी। एक ओर मायावती उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ गठबंधन में जुड़ने के संकेत दे रहीं हैं दूसरी ओर समान नागरिक संहिता पर उन्होंने सरकार का समर्थन कर दिया है। विपक्षी एकता के सूत्रधार बने हुये नीतिश कुमार भी समान नागरिक संहिता के प्रस्ताव के समर्थन के बहाने ढुलमुल होने का इशारा पहले ही दे चुके थे। हालांकि अरविंद केजरीवाल को कांग्रेस खुद ही भाव देने के मूड में नहीं थी लेकिन उन्होंने भी समान नागरिक संहिता का समर्थन करके विपक्ष की ताकत में पलीता लगा दिया है। महाराष्ट्र का घटनाक्रम तो एकदम तखता पलट की तरह है। उधर टाइम्स नाउ का 15 जून तक का सर्वे सामने आया है जिसमें फिर भाजपा की सरकार बनने की भविष्यवाणी निहित है। ऐसे में विपक्ष के वे नेता जिन्हें सत्ता से सतत संघर्ष की मुद्रा में अपनी बर्बादी का दुस्वप्न दिखाई देने लगा है वे भी समर्पण के लिये तत्पर होने लगे तो आश्चर्य न होगा।







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