मायावती: धैर्य, संतुलन और सामाजिक परिवर्तन की परिपक्व राजनीति

भारतीय राजनीति में कुछ नेता ऐसे होते हैं जो शोर से नहीं, रणनीति से इतिहास गढ़ते हैं। बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती इसी श्रेणी में आती हैं। आज जब राजनीति में आक्रामकता, टकराव और ध्रुवीकरण को ही सफलता का पर्याय मान लिया गया है, ऐसे समय में मायावती का संतुलित, धैर्यपूर्ण और समावेशी रुख उन्हें एक बार फिर प्रासंगिक बना रहा है। सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया के लिए उन्होंने जिस रोडमैप को वर्षों पहले तैयार किया था, वह आज धीरे-धीरे अपने तार्किक मुकाम की ओर बढ़ता दिख रहा है।

सवाल यह है कि जब सामाजिक बदलाव स्वाभाविक गति से आगे बढ़ रहा है, जब वर्गीय और अंतरजातीय शादियों ने जाति व्यवस्था के किले की नींव हिला दी है, तब क्या आक्रामक टकराव की राजनीति की जरूरत है? मायावती का उत्तर स्पष्ट है—नहीं। परिवर्तन सहमति से होना चाहिए, संघर्ष से नहीं। उनका मानना रहा है कि समाज को तोड़कर नहीं, जोड़कर बदला जा सकता है।

मायावती की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि उन्होंने सामाजिक न्याय को कभी प्रतिशोध का माध्यम नहीं बनने दिया। उन्होंने दलित स्वाभिमान को उभारते हुए भी सवर्ण समाज को अलग-थलग नहीं किया। यही कारण है कि आज उनका नेतृत्व सवर्णों के एक बड़े वर्ग को भी स्वीकार्य होता जा रहा है। यह भारतीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण परिघटना है, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।

2007 में जब बसपा को पूर्ण बहुमत मिला, तब मायावती के पास चाहें तो कट्टर राजनीति करने का अवसर था। लेकिन उन्होंने सामंजस्य और सद्भाव का रास्ता चुना। उनके शासनकाल में गांव-गांव दलितों को सामाजिक प्रतिष्ठा मिली। आत्मसम्मान का भाव जगा। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कानून का दुरुपयोग नहीं होगा। दलित महिला के साथ अपराध के मामलों में भी उन्होंने निष्पक्ष जांच के बाद ही मुकदमा दर्ज करने के निर्देश दिए। यह निर्णय राजनीतिक दृष्टि से जोखिम भरा था, लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से ईमानदार।

उन्होंने ब्राह्मण समाज को कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि सरकार उनके खिलाफ है। “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” का नारा केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक व्यवहार में भी दिखाई दिया। इसी नीति की निरंतरता आज उनके बयानों और रुख में नजर आती है।

जब भाजपा ने ब्राह्मण विधायकों की बैठक को लेकर नोटिस जारी किया, तो मायावती ने उसका खुलकर विरोध किया। यह विरोध केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि ब्राह्मण अस्मिता से जुड़ा हुआ था। इससे ब्राह्मण समाज में यह संदेश गया कि मायावती केवल दलितों की नेता नहीं, बल्कि सभी वर्गों की आवाज हैं।

इसी तरह “रिश्वतखोर पंडित” फिल्म पर ब्राह्मण समाज की नाराजगी का समर्थन कर उन्होंने यह साबित किया कि वे किसी भी समुदाय के सम्मान के सवाल पर समझौता नहीं करतीं। नतीजतन, उनके प्रति सहानुभूति और विश्वास लगातार बढ़ रहा है।

आज लोग उनके कार्यकाल को याद कर रहे हैं। एक ऐसा दौर जब कानून व्यवस्था मज़बूत थी, प्रशासन अनुशासित था और सत्ता का दुरुपयोग सीमित था। मायावती की सबसे बड़ी ताकत यही रही कि उन्होंने अपने ही सांसदों और विधायकों को कानून से ऊपर नहीं रखा। गलत करने वालों को उन्होंने बिना भेदभाव के दंडित किया। सत्ता में रहकर भी अनुशासन बनाए रखना आसान नहीं होता, लेकिन उन्होंने यह कर दिखाया।

अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद प्रदेश की स्थिति अत्यंत संवेदनशील थी। उस समय मायावती ने जिस संतुलन का परिचय दिया, वह आज भी मिसाल है। न हिंदू उग्रवादियों को सिर उठाने दिया, न मुस्लिम कट्टरपंथियों को। न तुष्टिकरण, न संतुष्टीकरण—सिर्फ कानून का शासन। यही उनकी नीति रही।

आज की एकपक्षीय और चयनात्मक कानून व्यवस्था की तुलना में उनका शासन कहीं अधिक निष्पक्ष और भरोसेमंद लगता है। यही कारण है कि आम जनता, बुद्धिजीवी वर्ग और यहां तक कि उनके आलोचक भी उनकी प्रशासनिक क्षमता को स्वीकार करते हैं।

नौकरशाही पर उनकी पकड़ भी उल्लेखनीय रही। उन्होंने अधिकारियों को यह संदेश साफ दिया कि सत्ता का मतलब अहंकार नहीं, जिम्मेदारी है। अफसरशाही को बेलगाम होने की छूट नहीं मिली। रोजमर्रा के भ्रष्टाचार पर भी उन्होंने काफी हद तक लगाम लगाई। यही वजह थी कि शासन व्यवस्था अपेक्षाकृत पारदर्शी रही।

आज जब राजनीति केवल प्रचार, भ्रम और भावनात्मक उन्माद तक सीमित होती जा रही है, ऐसे समय में मायावती की शांत, ठोस और व्यावहारिक राजनीति फिर से आकर्षण का केंद्र बन रही है। धीरे-धीरे माहौल उनके पक्ष में बनता दिख रहा है।

जिस बसपा को कुछ समय पहले लुप्तप्राय मान लिया गया था, वही पार्टी आज फिर से सक्रिय होती दिखाई दे रही है। संगठन में हलचल है, समर्थकों में उम्मीद है और विरोधियों में बेचैनी। यह संकेत है कि बसपा राख के नीचे सुलगती आग की तरह थी, जो अब फीनिक्स पक्षी की तरह पुनर्जीवित हो रही है।

मायावती की राजनीति न तो जल्दबाजी की है, न उन्माद की। यह धैर्य, दूरदृष्टि और संतुलन की राजनीति है। वे जानती हैं कि सामाजिक परिवर्तन कोई तात्कालिक घटना नहीं, बल्कि एक लंबी प्रक्रिया है। इसे मजबूती से आगे बढ़ाने के लिए भावनाओं से नहीं, विवेक से काम लेना पड़ता है।

आज जब देश और प्रदेश की राजनीति फिर से विश्वसनीय नेतृत्व की तलाश में है, मायावती एक बार फिर एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर रही हैं। उनका अनुभव, प्रशासनिक क्षमता और सामाजिक संतुलन की समझ उन्हें विशिष्ट बनाती है।

संभव है कि आने वाले समय में बसपा फिर से सत्ता के केंद्र में पहुंचे। लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि मायावती की राजनीति एक बार फिर यह याद दिला रही है कि सत्ता का उद्देश्य समाज को बांटना नहीं, जोड़ना होना चाहिए।

यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है—और यही उनके पुनरुत्थान की असली वजह भी।

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