यूपी के बजट में झलके सियासी पैतरे

विकास के वादे, चुनावी रणनीति और जमीनी सच्चाई का द्वंद्व

✍️ संपादकीय

उत्तर प्रदेश का बजट केवल आय-व्यय का दस्तावेज़ नहीं होता, बल्कि वह सत्ता की सोच, राजनीतिक प्राथमिकताओं और भविष्य की रणनीति का आईना भी होता है। हालिया बजट में यह प्रवृत्ति और अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। इसमें एक ओर विकास, निवेश और कल्याण की बड़ी घोषणाएं हैं, तो दूसरी ओर चुनावी राजनीति की गहरी छाया भी नजर आती है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रस्तुत यह बजट सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की उपलब्धियों को रेखांकित करता है, लेकिन साथ ही कई सवाल भी खड़े करता है। यह बजट विकास और लोकप्रियता के बीच संतुलन साधने का प्रयास है, पर क्या यह संतुलन वास्तव में जमीन पर उतर पाएगा—यह सबसे बड़ा प्रश्न है।


■ विकास का दावा और जमीनी हकीकत

सरकार ने एक्सप्रेसवे, मेडिकल कॉलेज, एयरपोर्ट, औद्योगिक कॉरिडोर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़े निवेश का वादा किया है। इससे यह संदेश दिया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश तेजी से आधुनिक राज्य की ओर बढ़ रहा है।

निस्संदेह, बीते वर्षों में बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि इसका लाभ अब भी कुछ क्षेत्रों तक सीमित है। पूर्वांचल, बुंदेलखंड और दूरदराज के इलाकों में विकास की रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी बनी हुई है।

विकास तभी सार्थक होगा, जब वह राजधानी और महानगरों से निकलकर गांव-कस्बों तक पहुंचे।


■ महिला और युवा: उम्मीदें और सीमाएं

बजट में महिलाओं और युवाओं के लिए विशेष योजनाएं शामिल की गई हैं। छात्रवृत्ति, स्टार्टअप फंड, स्किल ट्रेनिंग और महिला सुरक्षा पर जोर दिया गया है।

यह सकारात्मक पहल है, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या इससे स्थायी रोजगार पैदा हो रहा है? प्रदेश में शिक्षित बेरोजगारी अब भी बड़ी समस्या बनी हुई है। कई योजनाएं कागजों पर बेहतर दिखती हैं, पर लाभ सीमित वर्ग तक सिमट जाता है।

युवा वर्ग केवल योजनाओं से नहीं, स्थिर भविष्य से संतुष्ट होता है।


■ किसान और ग्रामीण क्षेत्र: राहत या भ्रम?

कृषि, सिंचाई, पशुपालन और पंचायतों के लिए बजटीय प्रावधान सरकार की ग्रामीण नीति को दर्शाते हैं। यह सराहनीय है।

लेकिन किसान आज भी कर्ज, लागत और बाजार की समस्याओं से जूझ रहा है। एमएसपी, फसल बीमा और सिंचाई व्यवस्था पर ठोस समाधान अब भी अधूरे हैं।

जब तक किसानों की आय स्थिर नहीं होगी, तब तक ग्रामीण विकास अधूरा ही रहेगा।


■ सामाजिक संतुलन की राजनीति

बजट में अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और कमजोर वर्गों के लिए योजनाएं शामिल हैं। यह सामाजिक समावेशन का प्रयास है।

लेकिन योजनाओं का क्रियान्वयन कमजोर रहा है। सामाजिक न्याय केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि समान अवसरों से स्थापित होता है।


■ कानून-व्यवस्था: छवि और वास्तविकता

योगी सरकार की पहचान सख्त कानून-व्यवस्था से जुड़ी रही है। अपराध नियंत्रण में कुछ सुधार हुआ है, इसमें संदेह नहीं।

लेकिन मानवाधिकार, पुलिसिया कार्रवाई और निष्पक्षता को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। मजबूत प्रशासन जरूरी है, पर लोकतांत्रिक मूल्यों की कीमत पर नहीं।


■ विपक्ष की भूमिका और सियासी बहस

इस बजट पर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।
समाजवादी पार्टी,
बहुजन समाज पार्टी
और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
ने इसे “चुनावी बजट” बताया है।

हालांकि विपक्ष की आलोचना तभी प्रभावी होगी, जब वह ठोस वैकल्पिक नीति प्रस्तुत करे।


■ आर्थिक अनुशासन बनाम लोकलुभावनवाद

बजट में राजकोषीय अनुशासन की बात भी की गई है, लेकिन लोकलुभावन योजनाओं पर भारी खर्च भी दिखता है।

यह संतुलन साधना कठिन है। यदि लोकलुभावनवाद हावी हुआ, तो भविष्य में आर्थिक संकट बढ़ सकता है।


📌 विशेष बॉक्स | जब प्रशिक्षण बना औपचारिकता

भारतीय प्रबंध संस्थानों में मंत्रियों को दिलाया गया प्रशिक्षण क्यों रहा खोखला?

सरकार ने मंत्रियों को Indian Institute of Management Ahmedabad और Indian Institute of Management Lucknow जैसे संस्थानों में प्रशिक्षण दिलाया।

उद्देश्य था—सरकार में प्रोफेशनलिज्म लाना।

लेकिन—

  • प्रशिक्षण और व्यवहार में दूरी,
  • राजनीतिक दबाव,
  • जवाबदेही की कमी,
  • और फॉलो-अप का अभाव

के कारण यह पहल औपचारिकता बनकर रह गई।

परिणामस्वरूप प्रशासनिक दक्षता में अपेक्षित सुधार नहीं दिखा।


📌 विशेष बॉक्स | स्वायत्तता बनाम केंद्र का दबाव

योगी की राजनीति: सहयोग भी, स्वतंत्रता भी

योगी आदित्यनाथ लगातार कहते रहे हैं कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लक्ष्य में यूपी की भूमिका मजबूत करना चाहते हैं।

लेकिन वे सत्ता संचालन में स्वायत्तता भी चाहते हैं।

■ मंत्रिमंडल विस्तार

केंद्र से आई सूचियों पर आंख मूंदकर अमल करना उन्हें स्वीकार नहीं था। इसी कारण मंत्रिमंडल विस्तार लंबे समय तक टला।

■ डीजीपी विवाद

स्थायी डीजीपी को लेकर Supreme Court of India के निर्देशों के बावजूद सरकार ने Union Public Service Commission को सूची भेजने में देरी की।

आलोचकों के अनुसार यह मुख्यमंत्री की प्रशासनिक पकड़ बनाए रखने की रणनीति थी।

■ जोखिम

इस नीति से—

  • केंद्र से टकराव,
  • संवैधानिक विवाद,
  • और राजनीतिक अस्थिरता

का खतरा भी बना रहता है।


📌 विशेष बॉक्स | कानून-व्यवस्था का सपना और पुलिस सुधार की उपेक्षा

जब सुधार की पहल अधूरी रह गई

योगी सरकार की सबसे बड़ी पहचान मजबूत कानून-व्यवस्था रही है। लेकिन पुलिस सुधार इस एजेंडे का कमजोर पक्ष बना रहा।

रिटायर डीजीपी सुलखान सिंह की अध्यक्षता में गठित पुलिस सुधार आयोग से बड़ी उम्मीदें थीं।

उद्देश्य था—

✔ पुलिस को स्वतंत्र बनाना,
✔ जवाबदेही तय करना,
✔ जनोन्मुखी व्यवस्था विकसित करना।

लेकिन सरकार की रुचि कम होने से यह आयोग निष्क्रिय हो गया।

■ सख्ती बनाम सुधार

सरकार ने—

  • मुठभेड़ों,
  • तबादलों,
  • और अनुशासनात्मक कार्रवाइयों

पर अधिक भरोसा किया।

संस्थागत सुधार पीछे छूट गए।

■ जनता पर असर

इसका असर—

  • थानों की कार्यसंस्कृति,
  • शिकायत निवारण,
  • और भरोसे

पर पड़ा।

जब तक पुलिस को पेशेवर और जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा, तब तक कानून-व्यवस्था की मजबूती अधूरी रहेगी।


■ निष्कर्ष: अवसर भी, चुनौती भी

उत्तर प्रदेश का यह बजट न तो पूरी तरह प्रशंसनीय है, न ही पूरी तरह खारिज करने योग्य।

इसमें—

✔ विकास की दिशा,
✔ निवेश की सोच,
✔ सामाजिक कल्याण का प्रयास है,

लेकिन साथ ही—

✖ बेरोजगारी की अनदेखी,
✖ कमजोर क्रियान्वयन,
✖ संस्थागत सुधारों की कमी,
✖ और चुनावी राजनीति की छाया भी है।

यह बजट सरकार के लिए परीक्षा है और जनता के लिए चेतावनी।

लोकतंत्र में बजट का मूल्यांकन घोषणाओं से नहीं, परिणामों से होता है। आने वाला समय बताएगा कि यह बजट विकास का आधार बनता है या केवल चुनावी दस्तावेज़ बनकर रह जाता है।

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