क्रांत‍िरथ पर सवार सुरेंद्र पांडेय ने थामी थी आजादी की पतवार*

कानपुर: भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का एक ऐसा सूरमा जिनके जन्म के 25 वर्ष पूरे होने पर जन्मदिवस पर ही उनके साथियों ने ब्रिटिश सरकार को हिलाकर रख दिया था। हम बात कर रहे हैं क्रांतिकारी दल के सुयोग्य संगठनकर्ता और विचारक क्रांतिकारी सुरेंद्र पांडेय की। सुरेंद्र पांडेय का जन्म 8 अप्रैल 1904 दिन शुक्रवार को कानपुर के सचेंडी ग्राम में हीरालाल पांडेय एवं शारदा पांडेय के पुत्र के रूप में हुआ था। पृथ्वीनाथ हाई स्कूल में अध्ययन के दौरान ही आपने शिव वर्मा, सुरेश चंद्र भट्टाचार्य, जयदेव कपूर, बटुकेश्वर दत्त, अजय घोष, विजय कुमार सिन्हा जैसे क्रांतिधर्मियों के साथ मिलकर ‘कानपुर जिमनास्टिक क्लब’ नामक युवाओं का संगठन स्थापित किया। शालिग्राम शुक्ल, रामदुलारे त्रिवेदी, जयदेव कपूर, जागेश्वर त्रिवेदी, गया प्रसाद कटिहार, रमेश चंद्रगुप्त और अपने छोटे भाई वीरेंद्र पांडेय और अन्य साथियों के साथ क्रांतिकारी गतिविधियों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने लगे। आपकी बहन सुशीला आजाद भी स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण जेल गईं। 

इसी दौरान आपका संपर्क चंद्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, भगवतीचरण बोहरा, जतिन दास, यशपाल आदि क्रांतिकारियों से हुआ। शस्त्र क्रांति के जरिये भारत को ब्रिटिश राज के चंगुल से आजाद कराकर समाजवादी गणराज्य की स्थापना करने के उद्देश्य से दिल्ली के फिरोजशाह कोटला के खंडहरों में शनिवार-रविवार छुट्टी के दिन 8-9 सितंबर 1928 को क्रांतिकारी साथियों का जमावड़ा हुआ। जिसमें संयुक्त प्रांत से सुरेन्द्र पांडेय, शिव वर्मा, जयदेव कपूर, विजय कुमार सिंहा, ब्रह्मदत्त मिश्र, बिहार से फरीन्द्रनाथ घोष और मनमोहन बनर्जी, रास्थान से कुंदनलाल, पंजाब से सरदार भगत सिंह और सुखदेव शामिल हुए थे। चंद्रशेखर आजाद दिल्ली की बैठक में शामिल नहीं हुए थे और उन्होंने कहा था साथियों का जो फैसला होगा उसे हम स्वीकार करेंगे। लिहाजा चंद्रशेखर आजाद की अनुपस्थिति में भगत सिंह और साथियों ने आजाद को ही हथियारबंद खुफिया संगठन ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ का कमांडर-इन-चीफ चुन लिया।

इसके पश्चात सुरेंद्र पांडेय ने सरदार भगत सिंह, राजगुरु इत्यादि क्रांतिकारियों के साथ बड़ौदा में रहकर गुजरात में क्रांतिकारी संगठन का विस्तार किया। 30 अक्टूबर 1928 को साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाहौर में पुलिस की लाठीचार्ज में पंजाब केसरी लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिसके कुछ हफ़्तों बाद उन्होंने दम तोड़ दिया। इस अपार दुख से क्रांतिकारियों में बेचैनी बढ़ गई। फिरोजपुर शहर के तूड़ी बाजार मोहल्ला शाहगंज की एक इमारत में क्रांतिकारी संगठन का कार्यालय डॉ. बीएस निगम के नाम से डॉ. गया प्रसाद दवाखाना चला रहे थे। यहीं मंसूबे बने। 17 दिसंबर 1928 की शाम पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट का वध करना तय हुआ लेकिन ब्रिटिश एएसपी जॉन सांडर्स मारा गया।

तत्कालीन वायसराय ने ऐलान किया था कि ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल और पब्लिक सेफ्टी बिल को अगर सेंट्रल असेंबली पास नहीं करेगी तो अपने विशेषाधिकार से आर्डिनेंस के रूप में इन्हे लागू करेंगे। ऐसे हालात में आगरा पार्टी कार्यालय से भगत सिंह और साथी मौत से खेलने दिल्ली आ गए और दिल्ली में सेंट्रल असेंबली में कई दिन रैकी की।  3 अप्रैल 1929 को दरियागंज में डिलाइट सिनेमा के पास श्यामलाल फोटोग्राफर से भगत सिंह और बीके दत्त ने फोटो खिंचवाई। 8 अप्रैल 1929 दिन सोमवार को जयदेव ने सेन्ट्रल असेंबली में जाने के पास का इंतजाम कर दिया और तीनों पास बाहर लाकर जला दिया। घड़ी और जूते पहले ही भगत सिंह ने जयदेव कपूर को सौंप दिये थे। जैसे ही असेंबली में ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल पर हुए मतदान के परिणाम की घोषणा होने से ठीक पहले बहरों के कान खोलने के लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जोरदार धमाकाकर ब्रिटिश सरकार को खुली चुनौती पेश की। सेंट्रल हाल धुएं से भर गया। तब तक गुलाबी पर्चों की बारिश होने लगी। इस अफरा-तफरी में दोनों का क्रांतिकारी चाहते तो भाग सकते थे लेकिन तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार इंकलाब…जिंदाबाद का नारा लगाते हुए दोनों ने गिरफ्तारी दी।

सुरेन्द्र पांडेय ने अपने सेनापति चंद्रशेखर आजाद के साथ मिलकर झांसी में क्रांतिकारी गतिविधियों को आगे बढ़ाया। उस समय चंद्रशेखर आजाद सभी महत्वपूर्ण विषयों पर सुरेंद्र पांडेय से सलाह लेने के साथ अत्यधिक विश्वास भी किया करते थे। झांसी से वापस कानपुर आते ही सुरेंद्र पांडेय को लाहौर षड्यंत्र केस में गिरफ्तार कर लिया गया और लाहौर की बोस्टर्न जेल में भगत सिंह और अन्य साथियों के साथ रखा गया। लाहौर षड्यंत्र केस के प्रसिद्ध मुकदमे में राजनीतिक बंदियों के अधिकारों के लिए चले 63 दिन के अनशन में यतीन्द्रनाथ दास शहीद हो चुके थे। 63 दिन के ऐतिहासिक अनशन में सुरेन्द्र पांडेय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसी दौरान अनशन की खबर सुनकर सुरेंद्र पांडेय की पत्नी ने भी अन्न जल त्याग दिया जिसके कारण उनकी अकाल मृत्यु हो गई।

7 अक्टूबर, 1930 को इस मुकदमे का फैसला भी सुना दिया गया जिसमें भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा हुई। विजयकुमार सिंहा, शिव वर्मा, जयदेव कपूर, महावीर सिंह, किशोरी लाल, डॉ. गया प्रसाद आदि दल के प्रमुख क्रांतिकारियों को लंबी सजा हो चुकी थी। इससे पूर्व सरदार भगत सिंह और साथियों को जेल से छुड़ाने के लिए बम परीक्षण के दौरान रावी तट पर 28 मई, 1930 को बापू भाई (भगवतीचरण वोहरा) बलिदान दे चुके थे।

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के ही कुछ और सदस्यों की गद्दारी से दल के सभी सदस्यों के नाम पते, खुफिया ठौर-ठिकाने पुलिस के पास पहुंच गए। इसी फूट की वजह से एचएसआरए के सेनापति चन्द्रशेखर आजाद ने 4 सितंबर, 1930 को दिल्ली के झंडेवालान में बैठक कर सेंट्रल कमेटी को भंग कर दिया।

लाहौर जेल से निकलने के पश्चात सुरेन्द्र पांडेय, यशपाल और विश्वनाथ वैशम्पायन को सशस्त्र क्रांति की गतिविधियों को धार देने के लिए चंद्रशेखर आजाद ने रूस भेजने का निर्णय किया। लेकिन विश्वनाथ वैशम्पायन 11 फरवरी, 1931 को कानपुर में गिरफ्तार हो चुके थे। इससे आजाद को बेहद तकलीफ हुई। ऐसे कठिन दौर में दल को नए और मजबूत तरीके से खड़ा करने की जिम्मेदारी आजाद को इलाहाबाद खींच लाई।

        यह 27 फरवरी, 1931 का सवेरा था। वातावरण में हल्की ठंडक थी। कटरा मुहल्ले के गुप्त ठिकाने से भवानी सिंह को जरूरी काम सौंपकर आजाद अल्फ्रेड पार्क की ओर निकल पड़े, जहां उनके साथी इंतजार कर रहे थे। तयशुदा कार्यक्रम के मुताबिक सुरेन्द्र पांडेय और यशपाल मिले। उसके बाद सुखदेव राज से बात करने के दैरान ब्रिटिश पुलिस से घिर गए और बीस मिनट तक अकेले लड़ते हुए वीरगति पाई।

चन्द्रशेखर आजाद की शहादत के बाद सुरेंद्र पांडेय ने पुनः दिल्ली में संपूर्ण भारत के क्रांतिकारियों की गुप्त बैठक आयोजित की और खुफिया संगठन को पुनः खड़ा करने का प्रयास किया। इसी दौरान आपको दिल्ली में वायसराय की गाड़ी पर बम फेंकने के प्रयास के षड्यंत्र में द्वितीय दिल्ली षड्यंत्र केस में पुनः गिरफ्तार कर लिया गया। इसके पश्चात अन्य विभिन्न मुकदमों में गिरफ्तार करके आपको कानपुर, फतेहगढ़, देवली आदि ब्रिटिश कारागारो में 14 वर्ष से अधिक समय बंद रखा गया। जेल से छूटने के बाद अपने दैनिक विश्वमित्र और टाइम्स आफ इंडिया आदि अखबारों में पत्रकारिता का भी कार्य किया। स्वतंत्र भारत में योग और वैदिक संस्कृत के अध्ययन और प्रसार में उल्लेखनीय योगदान दिया और विभिन्न यूरोपीय देशों में जाकर इसका प्रचार प्रसार किया। 13 जून 1992 को ब्रेन हेमरेज के कारण 88 वर्ष की आयु में मतलबपरस्ती की दुनिया को अलविदा कह दिया।

-डॉ. शाह आलम राना

(महान क्रांतिकारी शहीद जफर अली के वंशज)

संपर्कः महुआ डाबर संग्रहालय, मनोरमा तट, बहादुरपुर, बस्ती—272302, उत्तर प्रदेश

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