उरई। डार्क जोन में आने वाले डकोर ब्लाॅक में भूगर्भ जल स्तर बढ़ाने के लिए 2007 के सूखे से अभी तक तालाब खुदाई के नाम पर करोड़ों रुपये सरकारी एजेंसियों व एनजीओ के माध्यम् से खर्च किये जा चुके हैं। लेकिन तालाबों का कहीं अतापता नही है। वैसे तो डकोर में 90 के दशक से ही यह खेल चलता रहा है। लघु सिचाई के बाजीगर अभियंताओं ने तालाब खुदाई के नाम पर उस समय भी बिना एक तालाब खोदे भारी-भरकम बजट हड़प लिया था। लेकिन उनका बालबांका नही हुआ था। माना उस समय जमाना हाईटैक नही था और लोग भी जागरूक नही थे। लेकिन अब डिजिटल और सैटलाइट युग में भी जनसूचना अधिकार अधिनियम जैसे हथियार हाथ में आ जाने के बावजूद लोग असहाय बने हुए हैं जो कि आश्चर्य और बिडंबना का विषय है।
इस वर्ष का सूखा बेहद प्रचंड है जिसमें बरसात आने तक मवेशियों को बचाने और भूगर्भ जलस्तर बरकरार रखने के लिए तालाब भरवाने की कवायद जोरों से चल रही है। लेकिन इसका सरकारी बैठकों और मीडिया में चाहे जितना हल्ला हो, जमीनी स्तर पर सारे दावे फर्जीवाड़ा नजर आ रहे हैं। करमेर ग्राम पंचायत के गोराखुर्द का तालाब इसकी गवाही देता है। इस गांव में नया तालाब तो केवल कागजों पर ही खुदा है लेकिन जो पुराना तालाब था उसका अस्तित्व बचाने की चिंता भी प्रशासन ने नही की। जिससे अतिक्रमण की भेंट चढ़कर यह तालाब काफी हद तक सिकुड़ गया है। उस पर तुर्रा यह है कि बचेखुचे तालाब को भरवाने की परवाह न तो ग्राम पंचायत को है और न ब्लाॅक को। तालाब सूखा होने से मवेशियों के लिए संकट पैदा हो गया। लोग औने-पौने में अपनी दुधारू भैसें बेंच रहे हैं। साथ ही हैंडपंपों के नीचे खिसकते जलस्तर को भी तालाब का कोई सहारा नही मिल पा रहा है। अगर जिला प्रशासन अपने निर्देशों के प्रति ईमानदार और गंभीर है तो उसे इस तालाब को भरवाने के लिए झूठे काॅलम भरने में माहिर बीडीओ साहब की तत्काल खटिया खड़ी करने में देर नही करनी चाहिए।







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