16orai03उरई। पिछले दिनों कलैक्ट्रेट में एसडीएम कार्यालय के गेट से चोरी बाइक का पता कोतवाली पुलिस आज तक नही चला सकी है।
इन दिनों पुलिस में कांटे-छुरी, डेला-पत्थर, कच्ची-पक्की शराब कुछ भी पकड़ने के गुडवर्क को लेकर खुद ही अपनी पीठ थपथपाने के लिए पत्रकार वार्ताओं पर पत्रकार वार्ताएं करने का फैशन सा चल पड़ा है। इसी बहाव में अगर किसी पुरानी वारदात का कुछ सामान हाथ लग जाये तो फिर पुलिस अफसरों की डीगों का कहना ही क्या। जितने की बरामदगी नही होती उससे ज्यादा पुलिस पत्रकारों की मेहमाननवाजी में खर्च कर देती है। लेकिन इससे किसी को यह गुमान नही होना चाहिए कि लोग अब अपने को पुलिस के भरोसे सुरक्षित समझ सकते हैं। अभी भी लोग भगवान के ही भरोसे हैं और इसके कई साक्षात उदाहरण छोटी से छोटी घटना का अनावरण करने में पुलिस की अक्षमता से मिल जाता है।
कुछ दिन पहले कलैक्ट्रेट से इंदिरा नगर निवासी श्याम सुंदर द्विवेदी की बाइक यूपी 92 आर 9495 किसी बदमाश ने उठा ली थी। जानबूझ कर यह बाइक एसडीएम कार्यालय के बाहर से उठाई गई थी तांकि पुलिस को महसूस हो सके कि उसे करारी चुनौती दी गई है। इसके बाद पुलिस कितनी तड़ दिखाती है यह बदमाश भांप लेना चाहता था। लेकिन पुलिस आजकल दुकानदारों से भी ज्यादा वीतराग हो गई है जिससे वह चाहे चिकोटी काटो या लातें मारो वह किसी चीज को चुनौती के रूप में नही लेती। स्थितिप्रज्ञता का उसका यह आलम है कि अपराध के नाम पर उसे कभी जोश नही आता। यही श्याम सुंदर की बाइक के मामले में हुआ। पुलिस ने उनसे बाइक चोरी की तहरीर तो ले ली लेकिन इसके बाद से उदासीन संप्रदाय के किसी साधु की तरह खाकी चुपचाप बैठी हुई है। यह सोचकर कि ईश्वरीय विधान होगा तो बदमाश को सुमित आ जायेगी और वह खुद श्याम सुंदर द्विवेदी के दरवाजे पर बाइक खड़ी कर जायेगा वरना ईश्वर की मर्जी। जय हो! पुलिस।

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