इतिहास के चौराहे पर एक अनकहा सच

भारतीय सामाजिक इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यह रही है कि वर्ण व्यवस्था और जातिवाद को हमेशा केवल ‘शूद्रों और वंचितों’ के दमन का हथियार माना गया। निश्चित रूप से, इस व्यवस्था ने समाज के एक बहुत बड़े हिस्से को अमानवीय यातनाओं, अशिक्षा और सामाजिक बहिष्कार के दलदल में धकेला, जिसके घाव आज भी पूरी तरह नहीं भरे हैं। लेकिन इस सामाजिक विमर्श का दूसरा पहलू, जो सदियों से कालीन के नीचे छिपाकर रखा गया है, वह यह है कि वर्ण व्यवस्था ने स्वयं ब्राह्मण समाज का भी उतना ही गंभीर और गहरा नुकसान किया है।

अद्वैत वेदांत के नाम पर संपूर्ण ब्रह्मांड को एक मानने वाले और “अहं ब्रह्मास्मि” का नारा देने वाले ब्राह्मण समाज ने व्यावहारिक धरातल पर जिस वर्ण व्यवस्था को अपनी सुरक्षा का कवच समझा, वही कवच आज उनके लिए एक बौद्धिक, मानसिक और नैतिक बेड़ी बन चुका है। इतिहास गवाह है कि जब आप किसी इंसान या समुदाय को बिना किसी मेहनत के, केवल जन्म के आधार पर ‘सर्वोच्च’ होने का तमगा दे देते हैं, तो आप अनजाने में उसकी वास्तविक क्षमताओं की हत्या कर देते हैं। यह लेख किसी राजनीतिक दुर्भावना या किसी जाति को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि ब्राह्मण समाज के भीतर छिपी उस प्रचंड, नवाचारी और न्यायप्रिय ऊर्जा को मुक्त करने के लिए एक झकझोरने वाला आत्म-मंथन है, जिसे वर्ण व्यवस्था के मोह ने सदियों से बंधक बना रखा है।

छुई-मुई’ रवैया और अकर्मण्यता का पिंजरा (अवसरों से वंचित होने की त्रासदी)

वर्ण व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ब्राह्मण समाज ने सदियों से जो एक ‘छुई-मुई’ (अति-संवेदनशील और शुद्धतावादी) रवैया अपना रखा है, उसने उन्हें दुनिया के वास्तविक और गतिशील अवसरों से काटकर एक बंद कमरे में कैद कर दिया है।

• अकर्मण्यता की अफीम: जन्मना श्रेष्ठता एक ऐसी अफीम है, जो इंसान को यह भ्रम देती है कि उसे खुद को साबित करने के लिए कुछ भी करने की जरूरत नहीं है। जब एक समुदाय को यह विश्वास दिला दिया जाता है कि वह सिर्फ पैदा होने से ही पूजनीय है, तो उसके भीतर की झुझारू प्रवृत्ति और कठोर श्रम करने की क्षमता धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। वर्ण व्यवस्था से प्राप्त इस कृत्रिम श्रेष्ठता ने ब्राह्मण मानस को ‘अकर्मण्य’ बना दिया है।

• प्रतिस्पर्धा का डर: आज का ब्राह्मण समाज एक ऐसे स्वभाव का बंधक बन चुका है, जो खुली प्रतिस्पर्धा से घबराता है। जब समाज योग्यता के आधार पर आगे बढ़ता है, तो वर्ण व्यवस्था के नियमों के अभ्यस्त लोग असहज हो जाते हैं। वे अपनी असफलताओं का दोष व्यवस्था, आरक्षण या आधुनिकता पर मढ़ने लगते हैं, जबकि असली समस्या उनके भीतर बैठी वह मानसिकता है जो मानती है कि उन्हें बिना किसी वैश्विक प्रतिस्पर्धा के विशेषाधिकार मिलने चाहिए।

• नवाचार का नुकसान: यदि ब्राह्मण समाज वर्ण व्यवस्था के इस झूठे मोह को त्याग दे, तो क्षमताओं में विशिष्ट होने के कारण, उनके भीतर का नवाचारी  और प्रतिस्पर्धी उत्साह दोबारा जाग सकता है। जब वे इस वैचारिक पिंजरे से बाहर निकलेंगे और दुनिया के मंच पर एक आम इंसान की तरह अपनी योग्यता के दम पर लड़ेंगे, तो न केवल वे व्यक्तिगत रूप से नई ऊंचाइयों को छुएंगे, बल्कि उनके इस नए उत्साह से पूरे भारतीय समाज को एक भारी और अभूतपूर्व लाभ मिलेगा।

आनुवंशिक मेधा और योग्यता का यथार्थ (बिना वर्ण व्यवस्था के भी आगे रहने का भरोसा)

यदि ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से देखा जाए, तो ब्राह्मण समुदाय को अपनी मेधा  और बौद्धिक क्षमताओं को बनाए रखने के लिए किसी बैसाखी या जातिगत आरक्षण की कोई आवश्यकता नहीं है।

• पीढ़ियों का बौद्धिक अभ्यास: सदियों से पढ़ना, पढ़ाना, चिंतन करना, भाषा पर नियंत्रण और बौद्धिक विमर्श करना इस समुदाय के आनुवंशिक और पारिवारिक संस्कारों का हिस्सा रहा है। आनुवंशिक और सांस्कृतिक तौर पर हर क्षेत्र में—चाहे वह विज्ञान हो, साहित्य हो, कला हो या प्रबंधन हो—गुणों के मामले में वे आज भी स्वाभाविक रूप से बहुत आगे हैं।

• झूठे डर से मुक्ति: ब्राह्मणों के भीतर यह डर पूरी तरह से निराधार है कि यदि वर्ण व्यवस्था या जातिगत पहचान खत्म हो गई, तो वे समाज में पीछे छूट जाएंगे। सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत है। यदि आज पूर्णतः जाति-मुक्त और शुद्ध योग्यता-आधारित समाज की स्थापना कर दी जाए, तो भी अपनी बौद्धिक पृष्ठभूमि के कारण ब्राह्मण समाज स्वाभाविक रूप से आगे ही रहेगा।

• साम्राज्य बिना मुकुट के: इतिहास गवाह है कि यहूदियों के पास कभी कोई वर्ण व्यवस्था या जातिगत विशेषाधिकार नहीं थे, बल्कि उन्हें सदियों तक प्रताड़ित किया गया। लेकिन अपने बौद्धिक अभ्यास के दम पर आज वे दुनिया के विज्ञान, अर्थशास्त्र और तकनीक पर राज कर रहे हैं। भारतीय ब्राह्मणों को भी यह समझना होगा कि उन्हें अपनी मेधा को जीवित रखने के लिए किसी शोषक सामाजिक व्यवस्था के ‘मुकुट’ की जरूरत नहीं है। वर्ण व्यवस्था के बिना उनकी सफलता ज्यादा चमकदार और प्रामाणिक होगी।

कुंद हुई न्याय भावना और अविष्कारों का सूखा (दर्शन और अध्यात्म का पतन)

शंकराचार्य का अद्वैत दर्शन कहता है कि सत्य की खोज के लिए चित्त की शुद्धि अनिवार्य है। लेकिन जब एक पूरी जाति एक अन्यायपूर्ण व्यवस्था के लिए ढाल  बनकर खडी हो जाती है, तो उसकी आंतरिक न्याय भावना  पूरी तरह कुंद हो जाती है।

• अन्याय के समर्थन की कीमत: जब आप दिन-रात इस बात को सही ठहराने में अपनी बुद्धि खर्च करते हैं कि एक इंसान का दूसरे इंसान को छूना पाप है, या किसी को उसके जन्म के कारण शिक्षा से वंचित किया जाना चाहिए, तो आपकी चेतना का पतन शुरू हो जाता है। जो बुद्धि ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने के लिए बनी थी, वह बुद्धि जातिगत श्रेष्ठता के कुतर्कों को गढ़ने में नष्ट होने लगती है।

• ऐतिहासिक साक्ष्य—’कवष ऐलूष’ का प्रसंग: इस मानसिक कुंठा और न्याय के पतन का एक गहरा उदाहरण ऋग्वेद के ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है। कवष ऐलूष नाम के एक दासी-पुत्र (शूद्र) जब ऋषियों के एक बड़े यज्ञ में पहुँचे, तो वहाँ मौजूद रूढ़िवादी ब्राह्मण ऋषियों ने उन्हें केवल उनकी जाति के कारण अपमानित किया, ‘जुआरी और अछूत’ कहकर यज्ञशाला से बाहर निकाल दिया और प्यासा मरने के लिए सरस्वती नदी के तट पर फैले निर्जन रेगिस्तान में छोड़ दिया। लेकिन कवष ऐलूष ने हार नहीं मानी; उन्होंने रेगिस्तान के एकांत में ईश्वर की आराधना में ऐसे दिव्य सूक्तों (मंत्रों) की रचना की कि स्वयं साक्षात् सरस्वती नदी अपना मार्ग बदलकर उनके चरणों में बहने लगीं। जब रूढ़िवादी ब्राह्मण ऋषियों ने प्रकृति का यह न्याय देखा, तो उनकी कुंद हो चुकी न्याय चेतना झकझोर उठी। उन्होंने तुरंत अपनी भूल स्वीकार की, जातिगत अहंकार को त्यागा, कवष ऐलूष को गले लगाकर उन्हें ‘ऋषि’ स्वीकार किया और उनके रचे मंत्रों को ऋग्वेद में स्थान दिया।

• अविष्कारों का सूखा: यह प्रसंग प्रमाणित करता है कि जब ब्राह्मण समाज ने अपनी कुंद बुद्धि और जाति के अहंकार को छोड़ा, तब जाकर अध्यात्म और ज्ञान की एक नई और कालजयी धारा फूट सकी। इसके विपरीत, जब-जब वे रूढ़ियों के रक्षक बने, तब-तब भारत में अविष्कारों का सूखा पड़ा। पिछले कई सौ वर्षों में हम केवल पुराने ग्रंथों की लकीर पीटते रहे। जब बुद्धि का काम सत्य की खोज के बजाय केवल शोषक व्यवस्था को बनाए रखना हो जाए, तो रचनात्मकता मर जाती है।

खुद्दारी पर कलंक और उपलब्धियों पर संदेह (एक स्वाभिमानी कौम की सबसे बड़ी त्रासदी)

एक स्वाभिमानी और खुद्दार व्यक्ति के लिए इससे बड़ा अपमान कुछ नहीं हो सकता कि उसकी दिन-रात की मेहनत और उसकी वास्तविक योग्यता को कोई ‘खैरात’ या ‘विशेषाधिकार’ का नतीजा बता दे। वर्ण व्यवस्था आज ब्राह्मणों की इसी खुद्दारी के लिए सबसे बड़ा कलंक बन चुकी है।

• उपलब्धियों पर संदेह की छाया: आज के आधुनिक युग में यदि कोई ब्राह्मण युवक अपनी प्रचंड मेहनत, रातों की नींद हराम करके और अपनी प्रतिभा के बल पर किसी क्षेत्र में कोई बड़ी उपलब्धि हासिल करता है—चाहे वह सिविल सर्विसेज हो, कॉर्पोरेट जगत हो या शिक्षा का क्षेत्र हो—तो यह समाज तुरंत उसकी पीठ नहीं थपथपाता। इसके बजाय, सामाजिक विमर्श में यह धारणा खड़ी कर दी जाती है कि उसे यह सफलता इसलिए मिली क्योंकि वह एक विशेषाधिकार प्राप्त जाति से आता है, या इंटरव्यू बोर्ड में उसकी जाति के लोग बैठे थे, या उसे बचपन से एक खास सामाजिक तरजीह मिली हुई थी।

• रामानुजाचार्य का अनुकरणीय कदम: इस जातिगत संकीर्णता और खुद्दारी पर लगे कलंक को 11वीं सदी के महान दार्शनिक और श्रीवैष्णव संप्रदाय के प्रवर्तक संत रामानुजाचार्य ने बहुत पहले समझ लिया था। एक कुलीन ब्राह्मण कुल में जन्मे रामानुजाचार्य को उनके गुरु ने एक अत्यंत गोपनीय अष्टाक्षर मंत्र (“ॐ नमो नारायणाय”) दिया और चेतावनी दी कि इसे किसी और को मत बताना, अन्यथा तुम अकेले नरक जाओगे। लेकिन रामानुजाचार्य की खुद्दारी और सार्वभौमिक न्याय भावना ने ज्ञान के इस जातिगत विशेषाधिकार  को स्वीकार नहीं किया। वे तुरंत तिरुकोट्टियुर मंदिर के ऊंचे गोपुरम (शिखर) पर चढ़ गए और पूरे गाँव के वंचितों, शूद्रों और आम लोगों को इकट्ठा करके चिल्ला-चिल्लाकर वह परम मंत्र सबको दान कर दिया। जब क्रोधित गुरु ने उनसे पूछा कि तुमने यह मर्यादा क्यों तोड़ी? तो रामानुजाचार्य ने पूरी खुद्दारी से जवाब दिया—”हे गुरुदेव! यदि मेरे अकेले के नरक जाने से इतने सारे निर्दोष लोगों को परम पद और मुक्ति मिलती है, तो मुझे ऐसा नरक सहर्ष स्वीकार है।”

• कलंक से मुक्ति का मार्ग: रामानुजाचार्य ने सिद्ध किया कि एक स्वाभिमानी ब्राह्मण विशेषाधिकारों की बैसाखी पर नहीं, बल्कि सार्वभौमिक सत्य और साहस के दम पर अमर होता है। आज के ब्राह्मणों को भी समझना होगा कि वर्ण व्यवस्था ने उनकी वास्तविक प्रतिभा का अवमूल्यन  कर दिया है। इस कलंक से बचने का एकमात्र रास्ता यह है कि ब्राह्मण स्वयं आगे बढ़कर इस वर्ण व्यवस्था को लात मार दें। जब वे इस व्यवस्था को नष्ट करने की वकालत करेंगे, तब जाकर उनकी सफलताओं पर लगा यह संदेह का दाग धुलेगा।

न्याय के आंदोलनों में भागीदारी और विश्वास की बहाली (इतिहास और भविष्य की पुकार)

यह एक ऐतिहासिक और अक्षम्य भूल होगी यदि यह मान लिया जाए कि सभी ब्राह्मण हमेशा से शोषक रहे हैं या उनमें विशेषाधिकारों के विरोध की भावना नहीं रही है। इतिहास इस बात का गवाह है कि सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय के हर क्रांतिकारी कदम में ब्राह्मणों ने अग्रिम पंक्ति में रहकर साथ दिया है।

• ऐतिहासिक प्रमाण और सामाजिक सुधार: आधुनिक भारत के पुनर्जागरण को देखें तो मंगल पांडे से लेकर बाल गंगाधर तिलक, चंद्रशेखर आजाद, और रामप्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। सामाजिक सुधारों में राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के खिलाफ, ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने विधवा पुनर्विवाह के लिए और गोपाल कृष्ण गोखले ने बुनियादी शिक्षा के लिए रूढ़िवादिता के खिलाफ जंग लड़ी।

• फुले के आंदोलन में ब्राह्मणों का साथ: जब महात्मा जोतीराव फुले और क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले ने शूद्रों और महिलाओं के लिए भारत का पहला स्कूल खोला, तो रूढ़िवादी समाज के भयानक दबाव में उनके स्वयं के पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया था। उस भीषण संकट के समय, सामाजिक बहिष्कार के डर को दरकिनार कर, पं. बालशास्त्री जांभेकर जैसे प्रगतिशील ब्राह्मण सुधारकों ने फुले दंपत्ति के समतावादी विचारों का खुलकर समर्थन किया था। इसके अलावा, आधुनिक युग में कम्युनिस्ट आंदोलनों और वामपंथी क्रांतियों में, जो पूंजीवाद और सामंतवाद के खिलाफ थीं, एस.ए. डांगे और ई.एम.एस. नंबूदिरीपाद जैसे ब्राह्मणों ने अपने सारे विशेषाधिकारों को त्यागकर वंचितों के हक की लड़ाई लड़ी। यहाँ तक कि दक्षिण भारत में ई.वी. रामास्वामी पेरियार के आत्मसम्मान आंदोलन में भी कई न्यायप्रिय ब्राह्मणों ने कंधे से कंधा मिलाकर जाति व्यवस्था के खिलाफ काम किया था।

• विश्वास में लेने की आवश्यकता: आज भी ब्राह्मण समाज के भीतर एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा है जो एक न्यायपूर्ण, समतावादी और प्रगतिशील भारत का निर्माण करना चाहता है। आवश्यकता इस बात की है कि उनको विश्वास में लेकर इस कार्य को किया जाए। न्याय की लड़ाई लड़ने के नाम पर पूरे ब्राह्मण समाज को एकमुश्त गाली देने या उन्हें नीचा दिखाने की राजनीति आत्मघाती है। जब आप किसी को केवल उसके जन्म के कारण खलनायक (Villain) घोषित कर देंगे, तो वह डरकर आत्मरक्षा में रूढ़िवादिता की ओर भागेगा। विमर्श से ‘नफरत’ को हटाकर ‘विश्वास और गरिमा’ को जोड़ना होगा, ताकि ब्राह्मण समाज न्यायपूर्ण व्यवस्था के आंदोलनों में सबसे बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी निभा सके।

एक नए ‘द्विजत्व’ का उदय

प्राचीन शास्त्रों में ‘द्विज’ का अर्थ बताया गया है—जिसका दूसरा जन्म हुआ हो। पहला जन्म शरीर का होता है जो माता के गर्भ से होता है, और दूसरा जन्म ज्ञान, न्याय और चेतना का होता है। आज समय आ गया है कि ब्राह्मण समाज अपने इस वास्तविक ‘द्विजत्व’ को पहचाने।

वर्ण व्यवस्था के सड़े-गले और शोषक ढांचे को ढोते रहना किसी भी बुद्धिमान समाज के लिए आत्मघाती है। यह व्यवस्था शूद्रों के लिए जितनी बड़ी जेल थी, ब्राह्मणों के लिए उतनी ही बड़ी बौद्धिक और नैतिक जंजीर बन चुकी है। इस जंजीर को तोड़ने में ही ब्राह्मणों का अपना सबसे बड़ा हित निहित है।

जब ब्राह्मण समाज वर्ण व्यवस्था के इस झूठे और अमानवीय मोह को पूरी तरह समाप्त कर देगा, तो वह एक नए, ऊर्जावान, स्वाभिमानी और न्यायप्रिय समाज के रूप में उभरेगा। वह समाज, जो किसी के सामने अपनी जाति की भीख नहीं मांगेगा, बल्कि अपनी मेधा, अपने नवाचार और अपनी खुद्दारी के दम पर पूरे विश्व का नेतृत्व करेगा। यही आदि शंकराचार्य के अद्वैत की व्यावहारिक जीत होगी, यही कबीर और रविदास के बेगमपुरा का सपना होगा, और यही बाबासाहेब अंबेडकर के समतावादी भारत की वास्तविक शुरुआत होगी। इतिहास पुकार रहा है, अब निर्णय ब्राह्मण समाज को करना है।

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